2 नवंबर 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

आईना: सिस्टम का अंतिम सत्य… सिर्फ चालान

राजस्थान की सड़कों पर आजकल मौत की पटकथा लिखी जा रही है। नियम टूटते हैं। चालान कटते हैं। फाइलें बनती हैं। जिम्मेदार आंखें फेर लेते हैं। कानून जुर्माने की रसीद बनकर रह जाता है और वही वाहन सड़क पर मौत बनकर लौट आता है।
3 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

जयपुर

•

image

Veejay Chaudhary

•

Updated: 9 Jul 2026, 2:53 PM IST

jaipur accident

फोटो पत्रिका

विजय चौधरी

राजस्थान की सड़कों पर आजकल मौत की पटकथा लिखी जा रही है। नियम टूटते हैं। चालान कटते हैं। फाइलें बनती हैं। जिम्मेदार आंखें फेर लेते हैं। कानून जुर्माने की रसीद बनकर रह जाता है और वही वाहन सड़क पर मौत बनकर लौट आता है। फिर किसी बस स्टॉप पर, किसी मोड़ पर, किसी स्कूल के सामने या किसी हाईवे पर… एक पूरा परिवार खत्म हो जाता है। जयपुर के अजमेर रोड पर भी यही हुआ।

बस का इंतजार कर रहे चंद्रप्रकाश बागरी और उनके तीन मासूम बच्चे कुछ ही क्षणों में हमेशा के लिए बिछड़ गए। पत्नी कैलाशी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हैं। एक पल में एक घर उजड़ गया। लेकिन यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह उस व्यवस्था के खिलाफ आरोप-पत्र है, जिसने खतरे को पहचाना तो लिया, लेकिन उसे रोकने की कभी जरूरत ही नहीं समझी।

यहीं से शुरू होते हैं प्रश्न। क्या सड़क पर मौत केवल तेज रफ्तार से दौड़ रही है, या उसे व्यवस्था का संरक्षण भी मिला हुआ है? जिस ट्रोले ने चार जिंदगियां निगल लीं, उसके खिलाफ पहले भी कई चालान दर्ज थे, लेकिन उसे सड़क से नहीं हटाया गया। दूसरी ओर परिवहन विभाग के अपने रिकॉर्ड बताते हैं कि राजस्थान में 296 ऐसे वाहन हैं, जिन पर सौ से अधिक ओवरलोड चालान दर्ज हैं। एक वाहन पर 1214 चालान, दूसरे पर 896, तीसरे पर 803 और चौथे पर 718। ये आंकड़े केवल नियम तोडऩे वालों की सूची नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा हैं, जिसने अपराध को गिनना तो सीखा, रोकना नहीं।

सोचिए, यदि कोई वाहन 1214 बार पकड़ा जा सकता है, तो इसका अर्थ यह भी है कि 1214 बार वह कानून के सामने आया और 1214 बार फिर सडक़ पर लौट गया। आखिर किसकी पनाह में? किसकी चुप्पी के सहारे? कानून का उद्देश्य अपराध का हिसाब रखना नहीं, उसे रोकना होता है। लेकिन यहां तो व्यवस्था का अंतिम सत्य सिर्फ चालान है। हर नया चालान मानो अगले हादसे की गारंटी हो गया है।

सवाल केवल परिवहन विभाग से नहीं है। सवाल उस पूरे तंत्र से है, जो सडक़ पर उतरने वाले हर भारी वाहन की वैधता तय करता है। जिस वाहन का फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी हुआ, क्या उसकी वास्तविक जांच हुई थी? जिस चालक के हाथ में स्टीयरिंग था, उसका लाइसेंस किस प्रक्रिया से बना? क्या उसकी मेडिकल फिटनेस की नियमित जांच होती है? क्या यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह नशे में नहीं था, लगातार कई घंटों की ड्राइविंग से थका नहीं था? क्या अलग-अलग जिलों में दर्ज चालानों का कोई साझा डिजिटल तंत्र है, जो आदतन नियम तोड़ने वाले वाहनों को तत्काल चिह्नित कर सड़क से हटा सके? यदि नहीं, तो यह तकनीक की नहीं, व्यवस्था की… प्राथमिकताओं की विफलता है।

चिंताजनक तथ्य यह भी है कि सौ से अधिक ओवरलोड चालान वाले अधिकांश वाहन खनन परिवहन से जुड़े हैं। क्या यह महज संयोग है? या फिर यह उस बिखरे हुए प्रशासनिक प्रबंधन का परिणाम है, जहां एक विभाग चालान काटता है, दूसरा आंखें मूंद लेता है और तीसरा मान लेता है कि यह उसकी जिम्मेदारी ही नहीं है? यदि एक वाहन बार-बार ओवरलोड पकड़ा जा रहा है, तो हर बार उसे आगे बढ़ने देने का निर्णय भी किसी न किसी स्तर पर लिया जा रहा है। यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, जवाबदेही के लगातार क्षरण की कहानी है। और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?

पिछले छह महीनों में राजस्थान की सडक़ों पर 6020 लोगों ने जान गंवाई। यानी हर 44 मिनट में एक मौत। हर दिन 33 परिवार उजड़ रहे हैं। ये केवल आंकड़े नहीं हैं। हर संख्या के पीछे एक अधूरा बचपन, उजड़ा सुहाग, बूढ़े मां-बाप की टूटी उम्मीदें और हमेशा के लिए बदल चुकी एक जिंदगी है। जब मौतें सरकारी आंकड़ों का हिस्सा बन जाएं, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था ने खतरे के साथ समझौता कर लिया है।

अब आदेश जारी हो रहे हैं। लाइसेंस निलंबित होंगे। जवाबदेही तय होगी। सख्ती बरती जाएगी। लेकिन ये आदेश उन चार लोगों की जिंदगी वापस नहीं ला सकते, जो व्यवस्था की सुस्ती की कीमत बन गए। सवाल यह नहीं कि अब क्या होगा। सवाल यह है कि अब तक क्या होता रहा? 1214 चालानों तक कानून सोता क्यों रहा? अगर व्यवस्था को जागना ही था, तो क्या हर बार उसे शवों का इंतजार रहता है?

हर सडक़ हादसे के बाद चालक गिरफ्तार हो जाता है। लेकिन कभी यह नहीं पूछा जाता है कि उसे लाइसेंस किसने दिया, वाहन को फिट किसने घोषित किया और सैकड़ों बार नियम तोडऩे के बाद भी उसे सड़क पर किसने बने रहने दिया।

जब तक जवाबदेही स्टीयरिंग से आगे बढक़र सरकारी मेजों तक नहीं पहुंचेगी, तब तक हर नया चालान अगली मौत की चेतावनी बना रहेगा। सवाल केवल यह नहीं कि ट्रक कौन चला रहा था… सवाल यह है कि मौत को सड़क पर दौड़ने की इजाजत किसने दी?