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ब्रह्म एक-दूसरा कोई नहीं। ब्रह्म की प्रकृति (स्वभाव) ही उसका मन-उसकी कामना। तब ब्रह्म और प्रकृति दो संस्थाएं कहां है? व्यवहार में अव्यय पुरुष ही जगत का ब्रह्म है। कृष्ण ही अव्यय है-'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः रूप में वही 84 लाख योनियों में विस्तार पा रहा है। विस्तार का आधार है उनके मन की कामना-प्रकृति-हृदय-परा रूप शक्ति। सारा क्रम प्राण शरीर का कार्य है।
ब्रह्म में जब बल जाग्रत होता है तभी ब्रहंण होता है। इसी बल को माया बल कहते हैं। कामना ही बल की जाग्रति का हेतु है। ब्रह्म में मन नहीं है, परात्पर में भी मन नहीं होता। मन का निर्माण होता है अव्यय पुरुष में। गीता में कृष्ण स्वयं को अव्यय पुरुष बताते हैं। वे परमेष्ठी के अधिष्ठाता विष्णु के अवतार हैं। सृष्टि के आरम्भ में एकमात्र अव्यय पुरुष की व्याप्ति सर्वत्र थी। उसी का सत्-चित्-आनन्द रूप था। उसी की पांच कलाएं बनीं-आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक्। आगे की सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण इसी अव्यय मन से होता है। 'एकोऽहं बहुस्याम्' इसी मन की इच्छा कहलाती है। पुरुष का मन भाग हृदय में प्रतिष्ठित है-हत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु ।। (यजु. 34.6)। मन की गति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है। ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी सृष्टि है उसके भीतर भी यही मन है। इसलिए यह भी कहा जाता है कि जो प्राप्त नहीं है वह मन से प्राप्त कर लिया जाता है। (तै. सं 2.5.11.4)। यही मन प्रजापति कहलाता है। सम्पूर्ण सृष्टि का आलम्बन है। यह इन्द्रिय मन नहीं हो सकता। इन्द्रिय मन सूक्ष्म में प्रवेश नहीं कर सकता। प्रजापति मन-रूप होकर ही ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और सब कुछ जान लेता है-मनो भूत्वा (प्रजापतिः) सर्वममनुत। (जै. 1.314)।
तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार चन्द्रमा प्रजापति के मन में प्रतिष्ठित है-चन्द्रमा मे मनसि स्थितिः (तै. ब्रा. 3.10.85)। यही मन रूप चन्द्रमा सभी प्राणियों में विद्यमान है। कामना का उत्स मन है। कामना के साथ सृष्टि का विस्तार शुरू होता है। कामना का भी अपना शास्त्र है। कामना सौम्य मन में ही उठती है। सोम ही अग्नि में आहुत होना चाहता है। ऋत होने से उसको आश्रय चाहिए।
अग्नि तापधर्मा है, प्रसारधर्मा है, प्रकाशधर्मा है। विशकलन अर्थात् खण्ड-खण्ड करना इसका स्वभाव है, अतः यह भोक्ता है। अग्नि में सदा सोम गर्भित रहता है। वस्तुतः दोनों में दोनों रहते हैं। अविनाभाव हैं। सोम संकोचधर्मा, स्नेहधर्मा तथा अंधकार का प्रतीक है। पदार्थों को बांधने का काम करता है। अग्नि और सोम दोनों के सहयोग से ही सृष्टि आगे बढ़ती है।
स्त्री देह से सौम्य है, पुरुष भीतर में सौम्य है। कहा जाता है कि स्त्री बल और साहस पर मुग्ध होती है। उसी की होती है जिस पर उसका मन मुग्ध हो जाता है। इसका अर्थ है कि अग्नि की प्रचण्डता इतनी तो हो जिसमें स्त्री का सोम समा सके। अग्नि मन्द हुई तो सोम पूर्ण रूप से आहुत नहीं होगा। यज्ञ पूर्ण नहीं होगा। यहां बल और साहस का अर्थ पहलवान से नहीं है। अग्नि सत्य है। उसका तेजोमय होना अनिवार्य है। तभी सोम सुरक्षित भी रहेगा। दाहकता तो भस्म कर देगी। निर्माण कैसे होगा।
पुरुष का सोम दुर्बल होता है। तेज अग्नि में स्वयं भस्म हो जाता है। निर्माण कैसे हो? आज यह बड़ी समस्या होती जा रही है। स्त्रैण संकल्प की दाहकता सहज नहीं होती। तब ब्रह्मचर्य-संयम जैसे विषयों का महत्व दिखाई पड़ता है। स्त्री भी पुरुष की नकल में अपना दैहिक स्त्रैण खो रही है। वहां भी चेहरे पर पौरुषेय आग्नेयता बढ़ती जा रही है। आकर्षण शक्ति क्षीण होती जा रही है। शीघ्र विच्छेद होने शुरू हो जाते हैं। बौद्धिक उष्णता सौम्यता की शत्रु है।
सोम ही अग्नि की शक्ति है। सोम के अभाव में अग्नि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। मन खण्डित रह जाता है। तब अव्यय मन का क्या होगा? सृष्टि-चक्र का क्या होगा? यूं तो स्त्री भी आत्मा से पुरुष ही है। निर्माण के लिए इसकी पुष्टि आवश्यक है। तभी सोम इस पर मुग्ध होगा। वरना तो स्त्री मन में कामना भी नहीं उठेगी।
व्यवहार दृष्टि से शास्त्रों में कई प्रकार के विधान भी किए गये हैं। माया को सृष्टि करनी है। ईश्वर ने उसे इसीलिए भेजा है। तब उसके समक्ष यक्ष प्रश्न रहता है कि यदि उसके पुरुष की अग्नि मन्द है तब क्या करे? एक मार्ग तो है, वह स्वयं अपनी अग्नि को शान्त रखे और प्रारब्ध मानकर जी ले। वह अपने पुरुष का निर्माण भी कर सकती है, जिसके लिए विवाह करके उसके साथ रहने आई है।
स्त्री के मनभावन पुरुष के भी पांच लक्षण बताए हैं-स्नेह, सम्मान, सुरक्षा, संस्कार और समझ। उसके बल को पुष्ट करने वाले गुण हैं। दाम्पत्य रति से इनकी पुष्टि होती है। श्रद्धा-स्नेह-वात्सल्य-प्रेम-काम ये पांच स्त्री के राजमार्ग हैं-लक्ष्य तक पहुंचने के लिए। पुरुष की भीतरी सौम्यता पुष्ट की जाती है। साथ ही यदि अन्न सात्विक है तो प्रेम का प्रवाह माधुर्ययुक्त होगा। जीवन रस (ब्रह्म) और बल के संतुलन से आगे बढ़ेगा।
प्रकृति ने किसी उद्देश्य से हमें पैदा किया है तो वह तो अपना कार्य करेगी ही। हम स्वयं को प्रकृति से स्वतंत्र इकाई मानकर चलते हैं, प्रकृति के विरुद्ध चलना चाहते हैं। किन्तु प्रकृति से जीत नहीं सकते हैं। प्रश्न यही है कि सारी शुरुआत स्त्री कामना से ही होती है। आज एक नई जीवन शैली विकसित होने लगी है। देर से विवाह, लिव-इन, निःसन्तान और लव जिहाद। मन स्वच्छन्द चंचल। विवाह की प्रतीक्षा किसको ? आकर्षण भी किस विषय का। भूख से पहले भोजन सामने होता है। माया को ब्रह्म की कामना पूर्त करनी है, किंतु वह अपनी स्वयं की कामनाओं का संसार खड़ा करना चाहती है। तब निश्चित ही उसे ब्रह्म से भी संघर्ष करना पड़ेगा। जो भी साधन-सुविधाएं ब्रह्म ने उपलब्ध कराई हैं, उनको पुनः छीन भी सकता है और सजा भी दे सकता है। वह माया है, मालकिन नहीं बन सकती। वह तो 'मालिक' बनना चाहती है। भले वह भी भीतर से दुर्बल हो जाए। वहां अग्नि दुर्बल हो गई तो सोम का क्या होगा?
जैसे ही स्त्री ने पुरुष रूप को अंगीकार किया, स्त्री-स्वरूप को एक ओर सरकाया, माया ने उसी के साथ उसके सारे अधिकार छीन लिए। शरीर से तो नारी ही रही, किंतु स्त्रैण से शून्य हो गई। संवेदना का स्थान अहंकार और आक्रामकता ने ले लिया। उसका शरीर भी आग्नेय होने लगा। सोमाहुति की भाषा बदल गई। भीतर अग्नि बाहर अग्नि, सोम चाहिए। शादी दूर होती जा रही। पुरुषों से सहचर भाव बढ़ता जा रहा है। जहां संयम छूटा, आहुत होती गई। स्त्रैण संकुचन तो बहुत पीछे छूट गया। भविष्य की कोई कल्पना नहीं, घर-वर का सपना कैरियर ने लील लिया। बाकी - मैं और मेरा शरीर। आप कौन पूछने वाले राय देने वाले।
जब तक माली थी, सृष्टि का पालन करती थी, संवारती थी, सुरक्षा करती थी। भगवती रूप थी। भगवान की सेवा में थी भगवती। यही तो भग की दिव्यता है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश, श्री सब कुछ भगवती के हाथ में रहा है। स्त्री ने भूमिका जब से अपने हाथ में ले ली, ये सारी भव्यता खो गई। शेष बचा क्लेश-अकेलापन, सन्तानहीनता, रोग, कैन्सर से स्त्रैण अंगों का भंग होना जैसे उपद्रव जिसकी भूमिका उसने स्वयं ने बनाई।
स्त्री का माया भाव ही जननी रूपा है। माया देह नहीं है। माया मर्यादा है, संचालिका है। अपराधी को भले ही समाज माफ कर दे, न प्रकृति क्षमा करती है, न ही पुरुष। स्वयं भग भी पवित्रता खो बैठती है। अब वहां से भगवान का अवतरण नहीं होगा। अव्यय से सम्पर्क कट जायेगा। मानव देह में पशु समाज प्रतिष्ठित होगा।
क्रमशः gulabkothari@epatrika.com
Published on:
04 Jul 2026 09:41 am
