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यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे। सृष्टि के नियम सदा एवं सर्वत्र समान होते हैं। देश-काल के भेद से भिन्न प्रतीत होते हैं। प्रत्येक प्राणी में अहंकृति सूर्य से, प्रकृति चन्द्रमा से तथा आकृति पृथ्वी-भूगोल-से प्राप्त होती है। एक ही योनि के प्राणी भिन्न-भिन्न भू-भाग पर भिन्न आकृति वाले होते हैं। आकृति बदली नहीं जा सकती है। प्रकृति बदली जा सकती है। उसी के साथ आकृति में बदलाव आता है।
प्रकृति चन्द्रमा की कलाओं से प्रभावित होती रहती है। चन्द्रमा अन्न का, मन का और हमारे जन्म का कारक है। प्रकृति जीवन का संचालन करती है। परा-प्रकृति त्रिगुणात्मक होने से कर्म के भेद पैदा करती है। मनुष्य योनि में गुणों के प्रभाव से अशुद्धता पैदा कर देती है। इसी से संसार-चक्र चलता है। गुणातीत होते ही व्यक्ति प्रकृति से मुक्त हो जाता है। त्रिगुणात्मक कर्म ही भिन्न-भिन्न योनियों में जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
यह सृष्टि अखण्ड रूपा है। सात लोक-चौदह भुवन की सभी 84 लाख योनियां एक ही सूत्र से बंधी हैं। अमृत-मृत्यु सृष्टि, स्थूल-सूक्ष्म सृष्टि भीतर सब एक है। यह निर्णय परा-प्रकृति के आकलन पर आधारित होता है।
गीता में कृष्ण कह रहे हैं—
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ (8/16)
सभी लोक पुनरावर्ती हैं। प्राणी आते हैं - जाते हैं। कृष्ण कहते हैं कि मुझको प्राप्त होकर पुनरावर्तन नहीं होता।
प्रकृति की भूमिका क्या है -
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् ॥ (7/13)
कृष्ण कहते हैं कि सत्व, रज और तम- प्रकृति के इन तीन गुणों के कारण यह सारा संसार भ्रमित-मोहित है। इसलिए वह मुझ अविनाशी- जो इन गुणों से परे- श्रेष्ठ है, को नहीं जानता।
सम्पूर्ण भूत-जड़ और चेतन—इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं। (7/6) इतना होने के बाद भी सिद्धान्त सर्वत्र समान रहते हैं। हरेक शरीर मानो एक-एक करके निर्मित किया जाता है। हर शरीर के घटक समान हैं, कार्यप्रणाली समान है। फिर भी भूगोल और भूमिका के अनुरूप आकृति होती है। प्रकृति अपना कार्य करती है।
सभी प्राणी प्रकृति के नियंत्रण एवं तंत्रानुरूप कार्य करते हैं। अत: भोग योनि कहे जाते हैं। मानव भी मूलत: तो भोग योनि ही है, किन्तु स्वतंत्र चिन्तन और कर्म-क्षमता के कारण वह सदा प्रकृति का उपहास ही करता रहा है। प्रकृति के विरुद्ध जीना चाहता है, भले ही प्रकृति की मार पड़ती रहे।
सृष्टि की एक स्वरूप व्यवस्था भी है। माया ही स्रष्टा है - भविष्य द्रष्टा है। स्वयं वृषा को तलाश लेती है। देव-शक्ति, असुर-संहार शक्ति है - कालातीत है - षोड़शी रूप है। यूं तो माया एक आवरण ही है, किन्तु माया स्वयं भी नौ आवरणों में रहती है। अत: पकड़ में नहीं आती। माया का पति परात्पर तत्व है और दोनों का पुत्र सूर्य है। इसका (प्रत्येक प्राणी का) जन्म अंधेरे से होता है। अंधकार असुरों का क्षेत्र है, देवता इन्हीं के मध्य पैदा होते हैं, किन्तु असुर प्राण सदा बलवान होते हैं। अत: माया सदा देवों की रक्षा करती है।
सृष्टि विस्तार के लिए मां चाहिए। निर्विशेष में मां नहीं होती। ऋताग्नि में मातरिश्वा वायु द्वारा ऋत सोम की आहुति से सत्याग्नि पैदा होता है। ऋत सोम सृष्टि बीज है। सत्याग्नि सृष्टि की मां बनी। यही स्वयंभू ब्रह्मा, ऋषि प्राण अथवा अव्यय पुरुष कहलाया। इसी का केन्द्र सृष्टि का मन बना। एक ही बीज, एक ही मां और एक ही मन। यही सम्पूर्ण सृष्टि की स्वरूप व्यवस्था है।
अहंकृति सूर्य है - जगत का पिता भी है - समान रूप से सभी प्राणियों में प्रतिष्ठित रहता है। इसी को समदर्शन कहा जा सकता है। चन्द्रमा की 16 कलाएं—सत्व, रज, तम ही विषम वर्तन का कारण हैं। आकृति भूगोल से जुड़ी है। मन के दर्शन-वर्तन का रूप कर्म में दिखाई पड़ता है। ब्रह्म के मन में कामना तो अनवरत पैदा होती रहती ही है। कुछ योनियों में ब्रह्म और माया एक ही आकृति में रहते हैं। अत: यहां निर्माण भी नित्य होता रहता है।
अद्र्धनारीश्वर रूप में स्त्री भी भीतर पुरुष है। वह भी नित्य सृष्टि का कारक बनती है। पुरुष के भीतर भी स्त्री है। दोनों मिलकर भी सृष्टि कर सकते हैं। हम देख सकते हैं कि अनेक योनियों में वंशवृद्धि के लिए नर और मादा के दो शरीर आवश्यक नहीं होते। एक शरीर ही नर-मादा की भूमिका निभा देता है। ऐसी सृष्टि मूल में जीवात्मा का विस्तार मात्र करती है। अल्पकाल की जीवन यात्रा होती है।
माया के बिना सृष्टि नहीं हो सकती। उसकी प्रथम भूमिका ब्रह्म के स्वरूप को ढक लेना है। जैसे बादल सूर्य को ढकता है। दूसरी भूमिका माया उस एक को अनेक रूपों में व्यक्त अथवा प्रक्षेपित करती है। यही नर-मादा, स्त्री-पुरुष के प्रजनन की इच्छा और आकर्षण तथा नई प्रजा (शरीर) रचना का आधार भी है। तीनों गुण- सत्व-रज-तम मिल कर सृष्टि संचालन करते हैं और इसमें मुख्य भूमिका रजोगुण की है। यही इच्छा और प्रवृत्ति का आधार है। यही जीवों में सन्तानोत्पत्ति की इच्छा जगाता है। माया की यह भूमिका-आकर्षण एवं प्रेरणा—न हो तो सृष्टि विस्तार ही बाधित हो जाएगा।
मुर्गी का उदाहरण सर्वश्रेष्ठ है। वह रोज अण्डा देती है - कामना में ठहराव नहीं है। सृष्टि में अरबों अण्डे प्रतिदिन पैदा होते हैं - मर जाते हैं। ये स्वत: स्फूर्त ही पैदा होते हैं। बिना मुर्गे से बीज प्राप्त किये। अत: इनसे मुर्गी की वंशवृद्धि नहीं होती। यही स्थिति मनुष्यों में भी है। स्त्री ही तय करती है मातृत्व के लिए। अत: हर बार सन्तान नहीं होती। पुरुष रेत का प्रसव करता तो है, किन्तु माया की प्रेरणा के अभाव में ब्रह्मांश च्युत नहीं होता।
ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पशु कंगारू माया की भूमिका का श्रेष्ठ उदाहरण है। कंगारू में भ्रूण-विराम की एक प्रक्रिया है। मादा कंगारू का माया रूप उस रेगिस्तान में अद्भुत ही है। एक शिशु थैली में दूध पी रहा होता है। उसी समय गर्भाशय में दूसरा भ्रूण पल रहा होता है। इस कारण तीसरा भ्रूण प्रारंभिक अवस्था में ही निष्क्रिय पड़ा रहता है।
शुष्क वातावरण में दो सन्तानों को पालना ऊर्जा की दृष्टि से कठिन होता है। अत: जब तक थैली वाला बड़ा न हो जाए, तब तक तीसरा भ्रूण शिथिल पड़ा रहता है। जब बड़ा शिशु दूध पीना कम कर देता है, तब रुका हुआ भ्रूण पुन: विकसित होने लग जाता है। गर्भावस्था आगे बढ़ जाती है। जैविक रूप में ''मां का शरीर परिस्थितियों के अनुसार निर्णय करता है।“
कंगारू माता एक ही समय में तीन अवस्थाओं की सन्तानों का पोषण करती है—(1) भ्रूण गर्भाशय में शिथिल पड़ा हुआ, (2) एक शिशु थैली में, तथा (3) एक शिशु थैली के बाहर। यह स्तनधारियों में अत्यन्त विशिष्ट प्रजनन अनुकूलन माना जाता है।
क्रमशः gulabkothari@epatrika.com
Published on:
20 Jun 2026 07:18 am
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