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भाजपा के लिए समय रहते संभलने की चेतावनी

बांकीपुर और दतिया उपचुनावों के नतीजों ने भाजपा को स्पष्ट संकेत दिया है कि स्थानीय असंतोष और युवा नाराजगी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
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जयपुर

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Opinion Desk

Aug 07, 2026

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राजकुमार सिंह,(वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)

उप चुनाव पहले भी चौंकाने वाले परिणाम देते रहे हैं, पर बांकीपुर और दतिया ने भाजपा को ऐसे समय झटका दिया है, जब वह जेन-जी आंदोलन से डगमगाए आत्मविश्वास को संभालने की चुनौती से रूबरू थी। पुष्कर सिंह धामी तो मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हारने के बावजूद पुन: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनाए गए थे। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा खाली की गई गोरखपुर लोकसभा सीट से भी पहले प्रयास में भाजपा उम्मीदवार हार ही गए थे। रवनीत सिंह बिट्टू भी लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद केंद्र में मंत्री बना ही दिए गए थे, राजस्थान में तो 2024 में सुरेंद्र पाल सिंह मंत्री बना दिए जाने के बावजूद विधानसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत सीट नए राजनीतिक खिलाड़ी से हार जाना बड़ा झटका है, वह भी उस बिहार में जहां पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने के जश्न की खुमारी में भाजपा अभी तक थी। वैसे नामांकन के बाद उम्मीदवार बदले जाने से भी, पिछले साल विधानसभा चुनाव में खाता तक न खोल पाने वाली जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर के उप चुनाव में उतरने से भाजपा की असहजता का ही संकेत गया।

मुख्य विपक्षी दल राजद के तीसरे स्थान पर खिसक जाने को बिहार की राजनीति में नई करवट का संकेत मानना शायद जल्दबाजी हो, पर यह उसके लिए खतरे की घंटी तो है ही। झटका दतिया में हार का भी कम नहीं आंका जा सकता। बेशक वहां से पिछली बार भी कांग्रेस ही जीती थी, जिसके विधायक को अयोग्य घोषित कर दिए जाने के बाद उप चुनाव हुआ, लेकिन वह मध्य प्रदेश भाजपा के दिग्गजों में शुमार नरोत्तम मिश्रा की सीट है। इस बार जिस तरह आशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया, उसके विरोध में समर्थकों ने बवाल भी किया, उससे यह उप चुनाव भाजपा और मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था लेकिन चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी ने जोरदार उपस्थिति दर्ज करा कर सबको चौंका दिया। तीन उप चुनावों में से गुजरात की मांजलपुर सीट ही भाजपा के लिए सांत्वना पुरस्कार की तरह रही, पर वहां भी जीत का अंतर घट गया।

भाजपा का राजनीतिक चरित्र सांत्वना पुरस्कार से संतुष्ट हो जाने वाला है नहीं, पर इस सच से मुंह नहीं चुराया जा सकता कि सप्ताह भर में ही भाजपा को दूसरा जोरदार झटका लगा। एनडीए सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होने संबंधी राजनाथ सिंह के पुराने चर्चित बयान को नजरअंदाज कर दें, तो भी नरेंद्र मोदी सरकार की छवि ही कुछ ऐसी बन गई कि उनसे झुकने की उम्मीद बेमानी रही। हालांकि पीछे हटना पड़ता रहा है। कभी साल से भी ज्यादा चले किसान आंदोलन के चलते तीन कृषि कानून वापस लेकर तो कभी शीर्ष नौकरशाही में 'लैटरल एंट्रीÓ टाल कर। इसी साल अप्रेल में मोदी सरकार का परिसीमन विधेयक भी 54 वोटों के अंतर से संसद में गिर गया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की तरह 12 साल में विधेयक गिरने का भी पहला ही मौका था। नीट-यूजी पेपर लीक के विरुद्ध ऑनलाइन नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन ने जो दबाव बनाया वह विपक्ष मिलकर भी 12 साल में नहीं बना पाया। स्वाभाविक ही यह उस विपक्ष के लिए बिना टिकट खरीदे ही लॉटरी खुल जाने जैसा है, जो संसद के बजट सत्र में परिसीमन विधेयक पर सरकार को हराने के बावजूद विधानसभा चुनावों में तो पस्त हो ही गया, अपने दल बचाने के भी लाले पड़ गए।

पश्चिम बंगाल में अप्रत्याशित जीत के बाद पहले तृणमूल कांग्रेस और फिर उद्धव ठाकरे की शिवसेना तोड़ कर राजग ने विपक्ष का मनोबल ही ध्वस्त कर दिया था। माना जा रहा था कि परिसीमन समेत कुछ संविधान संशोधन विधेयक पारित करवाने के लिए मोदी सरकार ने दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ भी कर लिया है, लेकिन मानसून सत्र के पहले ही दिन सीजेपी के संसद मार्च में हुई हिंसा और पुलिस बल प्रयोग ने उन्हें रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट कर प्रधानमंत्री ने जेन-जी से संवाद के जरिये डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश भी की, पर उनकी पार्टी में वैसी कवायद नजर नहीं आई। परिणाम तो समय ही बताएगा, लेकिन ऐसे डैमेज को कंट्रोल कर पाना आसान नहीं होता। इसी बीच तीन उप चुनाव में से दो हार जाना, वह भी अपने शासित राज्यों में, भाजपा को हिला गया है। बेशक चुनावी हार-जीत का पोस्टमार्टम इतना आसान नहीं होता कि तुरंत उसके कारण-समीकरण बता दिए जाएं, लेकिन कुछ बातें तो नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। मसलन, परिवर्तन की कवायद में पुराने नेताओं और परंपरागत सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज किया जा रहा है। राज्यों में नए नेताओं को आगे बढ़ाना और परंपरागत सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज करना भी इन उप चुनावी झटकों का कारण हो सकता है, पर यह किसी भी भविष्योन्मुख राजनीतिक दल की मजबूरी भी है। समय रहते पीढ़ीगत परिवर्तन न करना भी कांग्रेस के पराभव का बड़ा कारण रहा।

बेशक उप चुनाव में स्थानीय कारक निर्णायक बन जाते हैं, पर प्रतिकूल परिणाम आने पर उन नेताओं पर भी सवालिया निशान लगेगा ही, जो जीत का श्रेय लेने को लालायित रहते हैं। फिर सीजेपी आंदोलन और प्रधान के इस्तीफे के तुरंत बाद हुए उप चुनाव में छात्र-युवा नाराजगी के प्रभाव से भी कौन इनकार कर सकता है? जाहिर है, इस चुनाव परिणाम के कारण कई हो सकते हैं। इसीलिए झटका होते हुए भी ये उप चुनाव नतीजे भाजपा के लिए समय रहते संभलने की सामयिक चेतावनी साबित हो सकते हैं, बशर्ते वह आत्मविश्लेषण करे।