
USA freedom day
हर्ष काबरा, वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक
आज अमरीका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है। 4 जुलाई 1776 को अमरीका की महाद्वीपीय कांग्रेस ने ‘स्वतंत्रता घोषणापत्र’ पारित किया था। उम्मीद के मुताबिक, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इस ऐतिहासिक अवसर को भी अपने महिमामंडन का मंच बना डाला है।
सैद्धांतिक तौर पर अमरीकी संविधान इतना मजबूत है कि वह किसी भी राष्ट्रपति पर अंकुश लगा सके। लेकिन दुर्भाग्य से संविधान के मूल तत्त्व जितने स्पष्ट हैं, उन्हें लागू करने का तंत्र उतना नहीं। यही वजह है कि आज सबकी निगाहें हर समय अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी होती हैं। संसद और जनता, जिन्हें संविधान का अंतिम संरक्षक होना चाहिए, लगभग मूक दर्शक बनी हुई हैं। अमरीकी स्वतंत्रता घोषणापत्र में न्यायिक प्रक्रिया में बाधा, नागरिकता देने में अड़चन, व्यापार में बेजा हस्तक्षेप, कार्यकारी आदेशों के सहारे शासन चलाने की सनक और नागरिक इलाकों में सशस्त्र बलों की तैनाती जैसी 27 शिकायतें दर्ज हैं। विडंबना यह है कि आज वही शिकायतें इतिहास कम, ट्रंप के अमरीका की वास्तविकता अधिक हैं।
देश की बागडोर एक ही व्यक्ति के हाथों में सिमटी
अमरीका के संस्थापकों ने शायद ट्रंप जैसे नेता की कल्पना ही नहीं की थी। उन्होंने अमरीकी संविधान को घड़ी की तरह चलने वाली एक ऐसी यांत्रिक संरचना के रूप में गढ़ा था, जिसकी हर कड़ी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। प्राचीन राजनीतिक दर्शन और आधुनिक शासन-विज्ञान के मेल से बनाई गई इस संवैधानिक मशीन को मरम्मत की आवश्यकता पड़ सकती है, इस विश्वास से उन्होंने संशोधन का प्रावधान तो रखा, मगर उसकी मूल बनावट ऐसी रखी कि शासन की कोई भी शाखा दूसरी पर हावी न हो सके।
आज अमरीका की स्थिति इसके ठीक उलट है। संसद लगभग पंगु है, सर्वोच्च न्यायालय अपनी मूल भूमिका से कहीं अधिक शक्तिशाली हो चुका है और कार्यपालिका के हाथों में सत्ता सिमटती जा रही है। यह वही परिस्थिति है, जिसे रोकने के लिए संविधान रचा गया था। संस्थापक जॉन एडम्स ने कहा था कि अमरीकी गणराज्य ‘व्यक्तियों का नहीं, कानून का शासन’ चाहता है। लेकिन आज देश की बागडोर एक ही व्यक्ति के हाथों में सिमट गई है।
आज तक केवल 27 संशोधन
हैरानी की बात है कि अमरीकी संविधान में आज तक केवल 27 संशोधन हुए हैं। मौजूदा दो-दलीय राजनीति और कठोर शर्तों के कारण संशोधन लगभग असंभव हो गया है। संविधान में संशोधन का उद्देश्य शांतिपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन का रास्ता खुला रखना होता है। जो देश संविधान बदलने की क्षमता खो देता है, वह अंतत: व्यवस्था-विरोधी राजनीतिक आंदोलनों को जन्म देता है। अमरीका में यही हो रहा है। पहले कार्यकाल में ट्रंप लोकतंत्र के लिए उतना बड़ा खतरा साबित नहीं हुए, जितनी आशंका जताई गई थी। सत्ता पर उनकी पकड़ कमजोर रही, उनके फैसले बार-बार अटकते रहे और सहयोगी बदलते रहे। लेकिन सत्ता से बाहर रहने के दौरान जब उन पर चार आपराधिक मुकदमे चले, तब उनका यह विश्वास पुख्ता हो गया कि राजनीतिक विरोधी उनका उत्पीडऩ कर रहे हैं और उन्होंने ठान लिया कि दोबारा सत्ता मिलने पर वे संवैधानिक सीमाओं की कतई परवाह नहीं करेंगे।
अनेक अमरीकियों ने बनाई स्वतंत्रता दिवस समारोहों से दूरी
जनवरी 2025 में सत्ता में लौटते ही उन्होंने वही पुराना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया, मगर इस बार संस्थागत नियंत्रणों की पूरी तरह अनदेखी करके। सामान्यत: किसी आदेश या कानून से पहले उसकी वैधानिकता और संवैधानिकता पर कानूनी राय ली जाती है। ट्रंप ऐसा नहीं करते। उन्हें पता है कि अदालतें सुस्त चाल चलती हैं, जिससे उन्हें हालात अपने पक्ष में बदलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। अब उनकी रणनीति है-पहले मनमाना कदम उठाओ, बाद का बाद में देखा जाएगा। शुरुआत में ट्रंप तानाशाही में दक्ष नहीं थे। अब वे यह हुनर सीख चुके हैं। ट्रंप की सबसे बड़ी चिंता अपनी विरासत को लेकर है। वह एक ऐसा देश और ऐसी दुनिया छोड़ जाना चाहते हैं, जिसे उनसे जोडकऱ ही याद किया जाए। लेकिन किसी व्यक्ति को इतिहास कैसे याद रखेगा, इसका फैसला वह स्वयं नहीं करता, फिर चाहे वह अपने कितने ही स्मारक क्यों न खड़े कर दे।
स्वतंत्रता घोषणापत्र और अमरीका की स्थापना आधुनिक इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में हैं। इस अवसर पर अमरीका के बुनियादी आदर्शों का उत्सव कहीं अधिक उचित होता, लेकिन ट्रंप ने इस पर्व को अपने इर्द-गिर्द समेट दिया है। यही वजह है कि अनेक अमरीकी स्वतंत्रता दिवस समारोहों से दूरी बनाए हुए हैं। हर पांच अमरीकियों में से एक इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस नहीं मना रहा है। गैलप के एक सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 31 प्रतिशत लोग ही स्वयं के अमरीकी होने पर गर्व महसूस करते हैं, जबकि 2015 में यह संख्या 78 प्रतिशत थी।
लिंकन ने अमरीका को धरती की अंतिम और सर्वोत्तम आशा बताया था
ऐसे ऐतिहासिक अवसरों का उद्देश्य ढोल पीटकर यह कहना नहीं होता कि देश महान है और उसमें कोई खोट नहीं, बल्कि इसका मूल्यांकन होता है कि वह अपने आदर्शों पर कितना खरा उतरा है। अनेक अमरीकी आज इसी चिंता में घुले जा रहे हैं कि क्या अमरीकी संविधान ट्रंप के सामने टिक पाएगा। भारत की तरह अमरीका में भी इतिहास राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार है। किंतु वहां वामपंथी इतिहासकारों का एक वर्ग अमरीकी इतिहास को अपराधों की अंतहीन श्रृंखला मानता है। दूसरी ओर, दक्षिणपंथी इतिहासकारों के लिए वही इतिहास स्वतंत्रता, प्रगति और समृद्धि की विजयगाथा है। दोनों दृष्टियों में कुछ सच्चाई है, लेकिन दोनों में से कोई भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाती।
अमरीका को अपने जघन्य अतीत का ईमानदारी से सामना करते हुए स्वयं को यह भी याद दिलाना होगा कि वह स्वतंत्रता का प्रकाशस्तंभ रहा है। अमरीकी विचार ने दुनिया को नई दिशा दी है और उसके लोकतांत्रिक प्रयोग ने वैश्विक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया है। इन दोनों आख्यानों के बीच सेतु बने बिना अमरीका स्वयं को नहीं समझ सकता।
अब्राहम लिंकन ने अमरीका को धरती की अंतिम और सर्वोत्तम आशा बताया था। आज इस आशा को स्वयं अमरीकी भी पूरे मन से नहीं जी पा रहे हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या अमरीका आज भी स्वतंत्रता, समानता और जवाबदेह शासन के अपने मूल आदर्शों पर खरा उतर रहा है? विश्व को लोकतंत्र और स्वतंत्रता की प्रेरणा देने वाला यह देश आज अपने ही आदर्शों की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। सशक्त लोकतंत्र अपनी उपलब्धियों और विफलताओं, दोनों को स्वीकारता है। अमरीका के मूल आदर्श आज अभूतपूर्व दबाव में हैं। उन्हें सुरक्षित रखना ही अमरीका के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
Published on:
03 Jul 2026 06:01 pm
