
जयपुर की डॉ. गायत्री शर्मा दो दशकों से संगीत शिक्षण और प्रशिक्षण में सक्रिय, डागर घराने के उस्तादों से मिली सीख ने संवारी पहचान। सामाजिक बंदिशों के बीच पढ़ाई पूरी की, ध्रुवपद को बनाया साधना का रास्ता। सपना भारतीय और पश्चिमी संगीत को एक ही परिसर में सिखाने वाली म्यूजिक यूनिवर्सिटी शुरू करने का।भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्राचीन गायन शैलियों में शामिल ध्रुवपद अपनी गंभीरता, राग की शुद्धता, विस्तृत आलाप और आध्यात्मिक अनुभूति के लिए जाना जाता है। इसकी साधना में स्वर के साथ धैर्य, एकाग्रता और अनुशासन भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। जयपुर की डॉ. गायत्री शर्मा पिछले दो दशकों से संगीत शिक्षण और प्रशिक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं। डागर घराने की परंपरा से जुड़ी गायत्री गायन के साथ अध्यापन के जरिए भी ध्रुवपद को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। उनके लिए संगीत केवल मंच पर प्रस्तुति देने या अपनी कला का प्रदर्शन करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, निरंतर सीखने और जीवन को समझने का रास्ता है।सुजानगढ़ के एक पारंपरिक राजस्थानी परिवार से निकलकर ध्रुवपद की साधिका बनने तक का उनका सफर सामाजिक बंदिशों, पढ़ाई के लिए संघर्ष, गुरु से मिली कठिन सीख और निरंतर अभ्यास से होकर गुजरा है। आज वह संगीत के साथ शिक्षण, शोध और लेखन में भी सक्रिय हैं। उनका मानना है कि कला की यात्रा में मंजिल से अधिक महत्त्वपूर्ण रोज आगे बढऩे की कोशिश है।
सुजानगढ़ में शुरू हुआ संघर्ष, पढ़ाई के लिए भी करनी पड़ी जद्दोजहद
गायत्री मूल रूप से सुजानगढ़ की रहने वाली हैं। वह ऐसे राजस्थानी परिवार में पली-बढ़ीं, जहां परंपराओं का गहरा प्रभाव था और लड़कियों की पढ़ाई को लेकर कई सीमाएं थीं। दसवीं कक्षा पूरी करते ही उनकी शादी की बात होने लगी, लेकिन गायत्री आगे पढऩा चाहती थीं। उस समय उनकी मां ने उनका साथ दिया और कहा कि कम से कम बारहवीं तक तो पढ़ाई पूरी करनी ही चाहिए। बारहवीं के बाद कॉलेज में प्रवेश लेना भी आसान नहीं रहा। परिवार में इसे लेकर विरोध हुआ। उनकी नानी कई दिनों तक उनसे बात नहीं करती थीं, क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि गायत्री कॉलेज जाएं। धीरे-धीरे परिस्थितियां सामान्य हुईं और उन्हें आगे पढऩे का अवसर मिला।गायत्री बताती हैं कि बचपन में उनका सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन सहशिक्षा में पढऩे की अनुमति नहीं थी। जिस परिवार और माहौल में बारहवीं के बाद शादी का दबाव हो, वहां मेडिकल की पढ़ाई के बारे में सोचना भी मुश्किल था। ऐसे में उन्होंने संगीत की राह चुनी। ग्रेजुएशन पूरा होते ही उनकी शादी हो गई। इसके बाद उन्होंने 2003 में बीएड किया और 2006 में संगीत में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की। शादी के बाद जयपुर में बसने के साथ उनकी शिक्षा और संगीत साधना को आगे बढऩे का अवसर मिला।वह कहती हैं कि जीवन में हर रास्ता परिस्थितियों के अनुसार नहीं चुना जाता, लेकिन जिस रास्ते पर चलना शुरू करें, उसमें पूरी मेहनत करना जरूरी है। संगीत उनके लिए ऐसा ही रास्ता बना, जिसने आगे चलकर उनकी पहचान और जीवन का उद्देश्य दोनों तय किए।
पीएचडी के दौरान डागर घराने से जुड़ाव
वह बताती हैं कि उनकी ध्रुवपद यात्रा की शुरुआत इमामुद्दीन डागर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पीएचडी के लिए शोध करते समय हुई। शोध के दौरान उन्हें डागर घराने के उस्तादों से मिलने और उनकी गायकी को करीब से समझने का अवसर मिला। संगीत की जिस परंपरा का वह अध्ययन कर रही थीं, उसी को सीखने की इच्छा ने उन्हें ध्रुवपद की नियमित साधना की ओर बढ़ाया। विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान सात स्वरों को समझने और गाने की जानकारी मिली, लेकिन डागर घराने में जाकर सीखना शुरू किया तो संगीत को देखने का नजरिया बदल गया। वहां राग की बारीकियों, स्वर के विस्तार और आलाप की साधना को बहुत गहराई से समझने का अवसर मिला। गायत्री के मुताबिक गुरु-शिष्य परंपरा में सीखना उनके लिए केवल तकनीक सीखने तक सीमित नहीं रहा। इसमें गुरु के निर्देशों को समझना, अपनी कमियों को पहचानना और बार-बार अभ्यास के जरिए उन्हें दूर करना भी शामिल था।
गुरु की एक बात ने बदल दिया नजरिया
गायत्री की संगीत यात्रा का एक अनुभव उनके लिए आज भी खास महत्व रखता है। डागर घराने में सीखने के दौरान एक दिन उस्तादजी ने उन्हें राग मुल्तानी गाने को कहा। वह लगातार कोशिश करती रहीं, लेकिन करीब तीन महीने बीतने के बाद भी उनकी गायकी गुरुजी की अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पाई। गायत्री बताती हैं, ‘एक दिन उस्तादजी ने कह दिया कि राग बदल लो, तुम इस राग में नहीं गा सकोगी। यह बात मुझे बहुत बुरी लगी। उस समय मैं दिल्ली में थी। मैं संस्थान परिसर के बगीचे में जाकर बैठ गई और लगातार रियाज करने लगी।’ उन्होंने मुल्तानी, तोड़ी और मधुवंती के स्वरों तथा उनके आपसी अंतर को समझने की कोशिश की। कई घंटे अभ्यास करते हुए बीत गए। इसी दौरान गुरुजी बाहर आए और उन्होंने देखा कि गायत्री लगातार रियाज कर रही हैं। उन्होंने उन्हें एक बार फिर राग मुल्तानी गाने को कहा। गायत्री के अनुसार, इस बार गायकी सुनने के बाद गुरुजी ने कहा कि अब से मुल्तानी तुम्हारा सबसे अच्छा राग होगा। जिस राग को छोड़ देने की सलाह मिली थी, वही उनकी विशेष पहचान बनने की दिशा में आगे बढ़ा। यह अनुभव उनके लिए केवल किसी एक राग पर पकड़ बनाने की कहानी नहीं है। इसमें उन्हें यह समझ आया कि कठिनाई आने पर अभ्यास छोडऩे के बजाय उसके कारण को समझना चाहिए। संगीत में कई बार तकनीकी ज्ञान के साथ धैर्य और आत्मविश्वास की भी परीक्षा होती है।
ध्रुवपद में राग की शुद्धता और आलाप का महत्त्व
ध्रुवपद को लंबे समय तक मर्दाना गायकी कहा जाता रहा है, लेकिन अब महिलाएं भी इस विधा में अपनी जगह बना रही हैं। गायत्री का मानना है कि संगीत की किसी शैली को स्त्री या पुरुष के दायरे में बांधने के बजाय उसकी साधना और विशेषताओं को समझना चाहिए। वह बताती हैं कि ध्रुपद में राग की शुद्धता बनाए रखना बेहद महत्त्वपूर्ण है। इसमें आलापचारी के जरिए राग का विस्तार किया जाता है। स्वर को ठहराव के साथ विकसित करना और राग के स्वभाव को बनाए रखना इस गायकी की खासियत है। ध्रुवपद और ख्याल की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, इसलिए दोनों के अंतर को समझे बिना ध्रुवपद की प्रकृति को पूरी तरह समझना मुश्किल है। गायत्री के अनुसार, ध्रुवपद केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि साधना और आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़ी गायकी है। संगीत सम्राट तानसेन भी ध्रुवपद परंपरा से जुड़े थे। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए केवल बंदिशें याद कर लेना पर्याप्त नहीं है। स्वर, राग, आलाप और गायकी के अनुशासन को समझना जरूरी है। वह अपनी कंपोजिशन भी स्वयं तैयार करती हैं। उनके लिए रचना करना संगीत के प्रति अपनी समझ और अनुभूति को व्यक्त करने का एक अलग माध्यम है। वह मानती हैं कि कलाकार को परंपरा का सम्मान करते हुए सीखते रहना चाहिए और अपनी अभिव्यक्ति के लिए भी जगह बनानी चाहिए।
रियाज से खुलती है आवाज, अभ्यास से विकसित होती है सोच
गायत्री के अनुसार, नियमित रियाज संगीत का आधार है। अभ्यास से केवल आवाज पर नियंत्रण ही नहीं आता, बल्कि राग को समझने और स्वर के बारे में सोचने की क्षमता भी विकसित होती है। ध्रुवपद में सांस, स्वर और शारीरिक समन्वय पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। उनके लिए रियाज एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कलाकार धीरे-धीरे अपनी सीमाओं को पहचानता है और उन्हें बेहतर करने की कोशिश करता है।
संगीत और मानव शरीर के संबंध में भी उनकी रुचि रही है। उन्होंने संगीत के प्रभाव और मानव शरीर के विभिन्न चक्रों से उसके संबंध पर शोध किया है। वह संगीत को एकाग्रता, अनुभूति और आंतरिक संतुलन के संदर्भ में समझने का प्रयास करती हैं। इस तरह के विषयों पर चर्चा करते हुए वह संगीत के अनुभव और उसके संभावित प्रभावों को वैज्ञानिक प्रमाणों से अलग करके देखने की जरूरत भी रेखांकित करती हैं। उनका मानना है कि संगीत का अनुभव हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। किसी के लिए यह भावनाओं की अभिव्यक्ति है, किसी के लिए साधना और किसी के लिए सीखने का माध्यम। कलाकार के लिए जरूरी है कि वह अभ्यास के जरिए संगीत की गहराई को समझे और श्रोताओं तक उसकी अनुभूति पहुंचा सके।
मंदिरों से संगीत समारोहों तक सुरों की यात्रा
डॉ. गायत्री शर्मा ने जयपुर और देश के अन्य हिस्सों में विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में प्रस्तुतियां दी हैं। इनमें गालव आश्रम, गलता पीठ का रामनवमी उत्सव, श्री गोविंद देवजी मंदिर का फागोत्सव, कलानेरी आर्ट गैलरी, रवींद्र मंच, जयपुर ध्रुवपद महोत्सव और राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर जैसे मंच शामिल हैं। उनकी संगीत यात्रा बनारस के घाट संध्या जैसे आयोजन तक भी पहुंची है। इन मंचों का परिवेश भले ही अलग रहा हो, लेकिन ध्रुवपद की गंभीरता और साधनापरक प्रकृति उनकी प्रस्तुतियों का मूल आधार रही है। मंदिरों के आध्यात्मिक वातावरण से लेकर सांस्कृतिक समारोहों तक, ऐसे आयोजन श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत से जुडऩे का अवसर देते हैं।
गायत्री के लिए मंच पर प्रस्तुति देना अपनी साधना को श्रोताओं के सामने रखने के साथ-साथ संगीत की परंपरा को व्यापक लोगों तक पहुंचाने का माध्यम भी है। उनका मानना है कि शास्त्रीय संगीत को केवल विशेषज्ञों या नियमित श्रोताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। नई पीढ़ी को इससे जोडऩे के लिए संगीत को सरल ढंग से समझाना और सुनने की रुचि विकसित करना जरूरी है।
कलाकार होने का लाभ विद्यार्थियों को भी
गायत्री गायिका होने के साथ शिक्षाविद् भी हैं। उनके अनुसार, कलाकार के रूप में मंच पर काम करने का अनुभव विद्यार्थियों को सिखाने में मदद करता है। हर विद्यार्थी को मंच पर प्रस्तुति देने का अवसर नहीं मिल पाता, लेकिन शिक्षक अपने प्रयासों से उनके लिए ऐसे अवसर बना सकते हैं। इससे विद्यार्थियों को अपनी कला प्रस्तुत करने, आत्मविश्वास विकसित करने और व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का मौका मिलता है। वह कहती हैं कि जब बच्चे पूछते हैं कि उन्हें संगीत क्यों सुनना चाहिए या इसे क्यों सीखना चाहिए, तो उन्हें संगीत की भूमिका समझाने की जरूरत होती है। संगीत केवल परीक्षा पास करने या डिग्री हासिल करने का विषय नहीं है। यह सुनने की क्षमता, संवेदनशीलता और रचनात्मक अभिव्यक्ति को विकसित करने का माध्यम भी है। गायत्री शिक्षा व्यवस्था में संगीत को विषय के रूप में शामिल करने के तरीके में सुधार की जरूरत महसूस करती हैं। उनके अनुसार, डिग्री और व्यावहारिक दक्षता के बीच अंतर दिखाई देता है। कुछ लोग औपचारिक डिग्री के बिना भी बहुत अच्छा गाते हैं, जबकि डिग्री हासिल करने वाले हर विद्यार्थी को पर्याप्त गायकी का अभ्यास या मंच का अनुभव नहीं मिल पाता। इसलिए संगीत शिक्षा में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ नियमित रियाज, गुरु का मार्गदर्शन और प्रस्तुति के अवसर भी होने चाहिए। ध्रुवपद सीखने के इच्छुक लोगों को वह सलाह देती हैं कि शुरुआत बुनियादी बातों से करें। जिस तरह किसी भाषा को सीखने के लिए पहले वर्णमाला समझनी पड़ती है, उसी तरह संगीत में भी स्वर और राग की बुनियाद मजबूत करना जरूरी है। इसके बाद सही गुरु का चयन महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार, गुरु के मार्गदर्शन के बिना संगीत की बारीकियों और उसकी परंपरा को गहराई से समझना कठिन है।
घूंघट की परंपरा वाले परिवार से विदेश में प्रस्तुति तक
गायत्री की व्यक्तिगत यात्रा में परिवार और सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रही है। वह ऐसे परिवार से आती हैं, जहां घूंघट की परंपरा थी। उनके अनुसार, समय के साथ परिवार में यह परंपरा बदली और उन्हें आगे बढऩे के लिए ससुराल का पूरा सहयोग मिला। वह बताती हैं, जब मैंने संगीत साधना शुरू की तो कुछ लोगों ने ताने दिए। गायकी को लेकर ऐसी बातें भी कही गईं, जिनसे मुझे दुख हुआ। लेकिन समय के साथ वही लोग मेरी तारीफ करने लगे। इससे यह समझ आया कि अगर आप अपने काम के प्रति ईमानदार हैं और लगातार मेहनत करते हैं, तो लोगों की सोच भी बदल सकती है। परिवार का सहयोग उनके लिए विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण रहा, जब उन्हें विदेश में प्रस्तुति देने का अवसर मिला। वह अफ्रीका के घाना में कार्यक्रम के लिए जा रही थीं। कुछ लोगों ने उन्हें वहां जाने से मना किया, लेकिन उनके पति ने उनका हौसला बढ़ाया और कहा कि उन्हें जाना चाहिए। गायत्री मानती हैं कि महिलाओं में कई तरह की क्षमताएं होती हैं। जरूरत इस बात की है कि वे अपनी प्रतिभा को पहचानें और उसे आगे बढ़ाने का अवसर पाएं। परिवार का सहयोग और समाज का सकारात्मक नजरिया इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
सम्मान से बढ़ा उत्साह, लेकिन साधना ही प्राथमिकता
संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए डॉ. गायत्री शर्मा को विभिन्न संस्थाओं से सम्मान मिले हैं। इनमें ध्रुवपद अकादमी पुरस्कार (2019), नारी शक्ति सम्मान (2018), ऋषि स्कूल का श्रेष्ठ संगीत गुरु सम्मान (2018), गुड थॉट्स इंटरनेशनल का महिला सशक्तीकरण सम्मान (2020), सवरंग संस्था का श्री गोपाल पुरोहित कला सम्मान (2021), कलानेरी का शास्त्रीय संगीत संरक्षण सम्मान (2022), विधान फाउंडेशन पुरस्कार (2022) और प्रथम एसएमएसएआइ पुरस्कार (2025) शामिल हैं। इन सम्मानों को वह अपने काम के प्रति प्रोत्साहन के रूप में देखती हैं। उनके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि संगीत का अभ्यास और अध्यापन निरंतर जारी रहे। सम्मान किसी कलाकार की यात्रा में उत्साह बढ़ा सकते हैं, लेकिन साधना की जगह नहीं ले सकते। गायत्री के लिए ध्रुवपद की परंपरा को सीखना, सिखाना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही उनके काम का मूल उद्देश्य है।
सपना है भारतीय और पश्चिमी संगीत की साझा यूनिवर्सिटी
गायत्री का सपना अपनी म्यूजिक यूनिवर्सिटी शुरू करने का है, जहां भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पश्चिमी संगीत भी एक ही परिसर में सिखाया जा सके। वह चाहती हैं कि विद्यार्थियों को संगीत की विभिन्न परंपराओं को समझने, सीखने और उनके बीच संवाद विकसित करने का अवसर मिले। उनके अनुसार, संगीत शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें परंपरा की गहराई और नए प्रयोगों की संभावनाएं साथ चल सकें। संगीत के अलावा खाना बनाना उनका पैशन है और लेखन शौक। इन दिनों वह कविता लेखन कर रही हैं और उनकी किताब भी जल्द प्रकाशित होने की उम्मीद है। संगीत, शिक्षण और लेखन उनके जीवन के ऐसे पक्ष हैं, जिनके जरिए वह अपनी रचनात्मकता को अलग-अलग रूपों में व्यक्त करती हैं।
हर रोज एक कदम आगे बढऩा ही जीवन का मंत्र
डॉ. गायत्री शर्मा के जीवन का मूलमंत्र है, हर रोज एक कदम आगे बढ़ाना। वह कहती हैं,, मुझे खरगोश की तरह तेज दौडऩा नहीं है। मैं कछुए की तरह लगातार आगे बढऩा पसंद करती हूं। उनके लिए सफलता का अर्थ तेजी से मंजिल तक पहुंच जाना नहीं, बल्कि अपनी दिशा में निरंतर प्रयास करते रहना है। सुजानगढ़ में पढ़ाई के लिए संघर्ष से लेकर डागर घराने में ध्रुवपद की कठिन साधना तक, उनके सफर में यही सोच दिखाई देती है। जिस राग को सीखने में तीन महीने तक कठिनाई हुई, उसी में बेहतर बनने के लिए उन्होंने अभ्यास जारी रखा। जिस समाज में लड़कियों की पढ़ाई को लेकर सीमाएं थीं, वहां से निकलकर उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की और संगीत को जीवन का आधार बनाया। आज उनकी कोशिश है कि ध्रुवपद की गंभीर और प्राचीन परंपरा विद्यार्थियों तक पहुंचे, संगीत शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित न रहे और नई पीढ़ी संगीत को सुनने, समझने तथा सीखने की जरूरत महसूस करे। उनके लिए ध्रुवपद की साधना अंतत: सुरों से आगे बढकऱ आत्मचिंतन और जीवन को समझने का संवाद है।