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तंबाकू नियंत्रण से मुक्ति तक: हम सबकी साझा जिम्मेदारी

हमारे यहां विश्व स्वास्थ्य संगठन की एमपावर रणनीति का भी अनुसरण किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत तंबाकू उपयोग की निगरानी, लोगों को धूम्रपान से सुरक्षा, तंबाकू छोडऩे में सहायता, तंबाकू के खतरों के प्रति चेतावनी, विज्ञापनों पर प्रतिबंध और तंबाकू पर कर वृद्धि जैसे कदम शामिल हैं।
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Sep 03, 2026
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(वरिष्ठ चिकित्सक)

तंबाकू का बढ़ता प्रचलन आज हमारे समक्ष न केवल स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अपितु एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती के रूप में भी दस्तक दे रहा है। आज के परिदृश्य में तंबाकू उत्पादों जैसे कि बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, खैनी, जर्दा और पान मसाला इत्यादि की पहुंच गांवों से लेकर महानगरों तक है और यह आम जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। यह भी एक चिंता का विषय है कि इनका प्रभाव अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं, बल्कि युवाओं और किशोरों तक में तेजी से फैल रहा है।

ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (2016-17) के अनुसार भारत में 15 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 26.7 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। यानी देश का लगभग हर तीसरा वयस्क तंबाकू का उपयोग करता है। पुरुषों में तंबाकू सेवन की दर 42.4 प्रतिशत जबकि महिलाओं में 14.2 प्रतिशत है। वहीं एनएफएचएस(2019) के अनुसार पुरुषों में ये 38 से 40 तथा महिलाओं में 4 से 8 प्रतिशत है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक देश होने के साथ-साथ सबसे बड़े उपभोक्ता देशों की श्रेणी में भी सम्मिलित है। सोचने का विषय यह भी है कि जहां एक और भारत में धूम्रपान की तुलना में बिना धुएं वाले तंबाकू जैसे खैनी, गुटखा, जर्दा और तंबाकू युक्त पान मसाला का उपयोग अधिक प्रचलित है, वही दूसरी और युवाओं में बढ़ती तंबाकू की लत और भी चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। भारत में हर वर्ष लगभग 13.5 लाख लोगों की मृत्यु तंबाकू सेवन के कारण होती है। इसके अतिरिक्त लाखों लोग लंबे समय तक बीमारी, विकलांगता और मानसिक-आर्थिक पीड़ा झेलते हैं। अगर हम गहराई से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि तंबाकू का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डालता है। इलाज, कार्यक्षमता में कमी और समयपूर्व मृत्यु के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान करोड़ों रुपए में आंका जा सकता है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार द्वारा तंबाकू नियंत्रण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। वर्ष 2003 में सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम लागू किया गया, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों और कार्यस्थलों पर धूम्रपान प्रतिबंधित किया गया। तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजन पर रोक लगाई गई तथा पैकेटों पर चित्रात्मक स्वास्थ्य चेतावनी अनिवार्य की गई। भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के 'फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल' को स्वीकार करने वाले शुरुआती देशों में भी शामिल रहा। 2007-08 में राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, तंबाकू सेवन कम करना, कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन तथा तंबाकू छोडऩे की सेवाओं को मजबूत करना था। इसके अंतर्गत स्कूल जागरूकता कार्यक्रम, सूचना-शिक्षा-संचार अभियान, स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण, तंबाकू मुक्ति केंद्र और जिला तंबाकू नियंत्रण इकाइयों जैसी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। हमारे यहां विश्व स्वास्थ्य संगठन की एमपावर रणनीति का भी अनुसरण किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत तंबाकू उपयोग की निगरानी, लोगों को धूम्रपान से सुरक्षा, तंबाकू छोडऩे में सहायता, तंबाकू के खतरों के प्रति चेतावनी, विज्ञापनों पर प्रतिबंध और तंबाकू पर कर वृद्धि जैसे कदम शामिल हैं।
सरकारी प्रयासों और बढ़ती जागरूकता के परिणामस्वरूप पिछले कुछ वर्षों में तंबाकू सेवन में कमी भी दर्ज की गई है, लेकिन चुनौती अब भी बहुत बड़ी है। आवश्यकता इस बात की है कि तंबाकू उत्पादों पर और अधिक कर लगाया जाए, सिंगल सिगरेट और खुले गुटखे की बिक्री पूरी तरह बंद हो, स्कूलों और कॉलेजों के आसपास सख्त निगरानी रखी जाए तथा युवाओं को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाएं। ई-सिगरेट पर प्रतिबंध होने के बावजूद किशोरों तक इसकी पहुंच को रोके जाने के और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। स्वास्थ्य केंद्रों को तंबाकू मुक्ति कार्यक्रमों से और अधिक जोड़ा जाना चाहिए।

बिना धुएं वाले तंबाकू को भी उतनी ही गंभीरता से लेने की आवश्यकता है जितनी सिगरेट और बीड़ी को। मुख कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रम, तंबाकू मुक्ति क्लिनिकों, काउंसलिंग सेवाओं और चिकित्सकीय निगरानी मे निकोटिन रिप्लेसमेंट एवं अन्य प्रभावशाली थेरेपी की पहुंच बढ़ाना समय की मांग है। तंबाकू से मुक्ति की शुरुआत व्यक्ति स्वयं भी कर सकता है। इसके लिए इच्छा शक्ति सुदृढ़ करते हुए सबसे पहले तंबाकू छोडऩे की एक निश्चित तारीख तय करनी चाहिए और धीरे-धीरे कम करने के बजाय पूरी तरह छोडऩे का प्रयास करना चाहिए। तंबाकू सेवन की इच्छा पैदा करने वाली परिस्थितियों जैसे तनाव, चाय, दोस्तों की संगति या खाली समय की पहचान कर उनसे बचने की योजना बनानी चाहिए। आज आवश्यकता केवल सरकारी प्रयासों की नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाने की भी है। स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए तंबाकू मुक्त जीवनशैली को अपनाना और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

Updated on:
03 Sept 2026 05:03 pm
Published on:
03 Sept 2026 05:03 pm