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ब्रह्म ज्ञान है, माया विज्ञान

'शरीर ही ब्रह्माण्ड' शृंखला में पढ़ें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख - ब्रह्म ज्ञान है, माया विज्ञान
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शरीर ही ब्रह्माण्ड : ब्रह्म ज्ञान है, माया विज्ञान
शरीर ही ब्रह्माण्ड : ब्रह्म ज्ञान है, माया विज्ञान

Gulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand : भारत में नारी को देवी कहा जाता हैं। बचपन से ही उसे प्रकृति का पवित्र रूप मानकर पूजा जाता है। वह ब्रह्म की रचनाकार है, भग की धारक है। भग शब्द जीवन के छह आधारभूत तत्त्वों से बना है-धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, श्री एवं यश। ये छहों गुण ईश्वर के आभूषण हैं। अत: स्त्री को भगवान की रचयिता माना जाता है। गीता के अनुसार ईश्वर सभी में रहता है। ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। कर्मचक्र के कारण एक स्त्री अपने पति की मृत्यु पर विधवा भी हो सकती है। पति के साथ रहने पर उसे सुहागिन के रूप में श्रेष्ठ माना जाता है। वह पति के रहते ही अपनी मृत्यु को श्रेयस्कर मानती है। सन्तानहीनता की स्थिति में वंश रुक जाता है। परिवार (वंश) की निरन्तरता और सम्पति को साझा करने के लिए पति अपने निकट परिजनों के लड़के को गोद ले सकता है।


पत्नी के प्राण, पति के प्राण के साथ (कन्यादान के परिणामस्वरूप) रहते हैं। पति की जब मृत्यु हो जाती है तो उसके प्राणों के साथ ही अपने प्राण भी खो देती है। उसका आत्मा अल्पक्रिया हो जाता है। वह यदि पुन: विवाह भी कर ले तो उसके प्राणों का नए पुरुष के साथ आदान-प्रदान नहीं हो पाता।

इस सम्बन्ध में आत्मीयता नहीं रहेगी। क्योंकि कामनाओं की पूर्ति केवल प्राणों के माध्यम से होती है। जब सूक्ष्म प्राण अनुपलब्ध हों तब केवल भौतिक अथवा स्थूल प्राण कार्य करते हैं। 'नारीÓ सोम है। किन्तु 'स्त्री' (पत्नी रूप) अग्नि है। स्त्री और पुरुष दोनों के आत्मीय सूत्र के अभाव में तो सामान्यत: जन्म लेने वाला केवल जैविक शिशु ही होगा।

कर्म के सिद्धान्त के अनुसार पिछले जन्मों में विभिन्न आत्माओं से सम्बन्ध हो सकते हैं। अत: हो सकता है कि अपवाद स्वरूप एक स्थायी नया विवाह अथवा बन्धन बन जाए। एक स्त्री के अस्तित्व को उसके पुरुष से जोड़कर ही परिभाषित किया जाता है। ऋत होने के कारण उसे अपनी पहचान के लिए सदैव एक सहयोगी अथवा आधार की तलाश रहती है।

स्त्री भीतर से पुरुष की भांति दृढ़ होती है। पुरुष जब उसके आगे समर्पण करता है तो हृदय के स्तर पर उसका विकास वैसा ही होता है जैसे भक्ति में समर्पित स्त्री होती है। स्त्री अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृत संकल्पित होती है। उसके सारे प्रयास समाज सेवा, प्रेममय हृदय विकसित करने, पशु-पक्षियों-पेड़ों आदि से प्रेम करने से जुड़े होते हैं।

ताकि सभी के साथ एकत्व की अनुभूति कर सके। वह उस (पुरुष) में आहूत होती है, भीतर से उसे एक वृक्ष की भांति विकसित करती है, सभी प्राणियों तक उसका विस्तार करती है ताकि वह उन सब के साथ जुड़ सके। तब विश्व एक वृहद् कुटुम्ब बन जाता है-उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्। वह अपने जीवनसाथी के साथ कामनाओं के रूप में जुड़कर जीवन की एक महान यात्रा करती है और अन्त में वही उसे कामना रहित बना देती है।


क्या कोई स्वर-व्यंजन-शब्दों के बगैर किसी भाषा के बारे में सोच सकता है। स्वर पुरुष हैं। जबकि व्यंजन योनि हैं। इन्हीं के संयोग से सम्पूर्ण साहित्य-संसार की रचना होती है। संस्कृत भाषा में स्वर के सहयोग के बिना किसी भी व्यंजन का उच्चारण संभव नहीं है। स्वर को बीज कहते हैं। स्वर एवं व्यंजन दोनों मिलकर एक भाषा बनाते हैं। ध्वनि का वाचिक स्वरूप ही नाद ब्रह्म कहलाता है।

मानव शरीर के चार घटक हैं-शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा। इसी तरह ध्वनि के भी क्रमश: चार स्तर हैं-वैखरी, पश्यन्ति, मध्यमा एवं परा। हमारे शरीर की कार्यप्रणाली भी ध्वनि की भांति होती है। स्त्री शरीर सोम होने से चारों स्तरों पर पुरुष द्वारा ग्रहण की जाती है। प्रत्येक अगला स्तर सूक्ष्मतर होता है। उपासना अथवा भक्ति में ध्वनि के माध्यम से आत्मा तक यात्रा होती है।

यह सब ब्रह्म और माया की परिभाषा में ही निहित है। प्रारम्भ में सम्पूर्ण सृष्टि जलमग्न थी, प्रकाश नहीं था, सर्वत्र अंधकार था। अग्नि प्राण मन्द अथवा लगभग निष्क्रिय थे। यह अवस्था 'ब्रह्म की रात्रि' कही जाती है। ब्रह्म के हृदय के स्पन्दन समाप्त नहीं होते। हृदय की यह अग्नि (ब्रह्मा-विष्ण-इंद्र इन तीन प्राणों से प्रत्येक प्राणी का हृदय बनता है) समुद्र के सोम से अपना अन्न (सोम) ग्रहण करके अपना अस्तित्व बनाए हुए था।

ब्रह्म को पर्याप्त ऊर्जा-अग्नि उपलब्ध हुई तब ब्रह्म ने अपने पूर्व स्वरूप में आने की कामना की। यही 'ब्रह्म का दिन' कहलाता है-'एकोऽहं बहुस्याम्'। मैं अनेक हो जाऊं। ब्रह्म ही ज्ञान का प्रकाश है। प्रत्येक प्राणी का निर्माण ब्रह्म से होता है और ब्रह्म प्रत्येक में निवास करता है। वह सृष्टि की रचना करता है और उसी में प्रविष्ट हो जाता है।

'तत् स्रष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्।'

हम यह तथ्य समझने लगें कि प्रत्येक हृदय में ब्रह्म निवास करता है तो यह दृष्टि ही ज्ञान है। ब्रह्म और ज्ञान पर्याय ही हैं-'एको ज्ञानं ज्ञानम्।' ब्रह्म एक ही अविभक्त, निराकार, अकर्ता, निर्मल है और सर्वोच्च पिता है।

अपनी 'बहुस्याम्' कामना की पूर्ति के लिए वह माया की सर्जना करता है। माया के भीतर ऊर्जा (भीतर ब्रह्म) है। अब ये दो हुए-ब्रह्म और माया, ऊर्जा और पदार्थ। ब्रह्म का यहीं से विभिन्न आकारों में विवर्त शुरू होता है जो सारे तत्त्व रूप में होते हैं, दिखाई नहीं देते।

ब्रह्म की नीचे की ओर गति शुरू होती है और वह स्थूल से स्थूलतर होता हुआ विभिन्न रूप, आकार, विरल से तरल, घन रूप धारण करता है। उसका यह 'बहुस्यामÓ होना ही माया की शक्ति है, इसी के लिए माया बनी है। एक से बहुत हो जाना ही 'विज्ञान' है। किन्तु यह परिभाषा आधुनिक विज्ञान से नितान्त भिन्न है। दोनों की अपनी स्वतंत्र शब्दावली, धारणाएं और सिद्धान्त हैं। निश्चित ही अन्तत: दोनों समान बिन्दु पर ही मिलेंगे। क्योंकि सत्य के दो स्वरूप नहीं हो सकते। सत्य सदैव एक ही होता है।

वैदिक विज्ञान का सिद्धान्त है कि ब्रह्माण्ड में जो भी तत्त्व हैं वे सभी में उपस्थित हैं। अनुपात भिन्न हो सकता है। दूसरा सिद्धान्त यह है कि सबकी कार्यप्रणाली भी समान होती है-'यथाण्डे तथा पिण्डे।' जब हम कहते हैं कि सृष्टि अग्नि-सोम से ही बनी है-'अग्निषोमात्मकं जगत्', तब स्पष्ट है कि मानव सहित सभी अग्नि और सोम से ही सृजित हुए हैं। सूर्य-चन्द्रमा-तारागण सहित प्राणिमात्र के शरीर समान सिद्धान्तों के आधार पर समान घटकों से निर्मित होते हैं। जैसे आकाश में सात लोक हैं, वैसे ही प्रत्येक वस्तु के भी सात स्तर होते हैं। सृष्टि का सारा निर्माण अग्नि-सोम के यज्ञ से होता है।


यज्ञ का अर्थ है अग्नि में सोम की आहुति। इससे अग्नि के नए स्वरूप की उत्पत्ति होती है। यह सोम ही भीतर प्रवाहित होकर एक सोम विश्व की रचना करता है और सोम-बीज में परिवर्तित हो जाता है। बीज सभी सोम रूप होते हैं जो अग्नि से युक्त होकर निर्माण करते हैं। प्रत्येक सोम भीतर से अग्नि है। काष्ठ के टुकड़े की भांति। सोम के भीतर अग्नि पैदा किया जाता है।

सौम्या के भीतर यह अग्नि 'स्त्री' है। माया अथवा नारी-मादा ही विज्ञान अथवा वैदिक ज्ञान का स्त्रोत है-यही 'एकÓ से 'अनेक' का निर्माण करती है। अन्तत: यही (माया ही) पुन: 'अनेक से एक में' समाहित भी करती है। पदार्थ और ऊर्जा का क्षरण नहीं होता अपितु एक-दूसरे में बदलते हैं। यही विवर्त कहलाता है। हम इसी भांति रूप-आकार बदलते रहते हैं और चौरासी लाख योनियों में भटकते रहते हैं। हम कह सकते हैं कि ब्रह्म ज्ञान है और माया विज्ञान है।

क्रमशः


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