23 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

संपादकीय: स्वदेश में अवसर मिलने पर ही कारगर होगा वैश्विक अनुभव

विदेश से पढ़ाई पूरी कर भारत लौटने की बढ़ती इच्छा देश के लिए ब्रेन गेन का बड़ा अवसर बन सकती है। लेकिन प्रतिभाओं को वापस लाने से ज्यादा जरूरी है उन्हें ऐसा सक्षम और पारदर्शी इकोसिस्टम देना, जहां वे अपने ज्ञान और अनुभव का पूरा उपयोग कर सकें।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

जयपुर

•

image

Anil Karma

•

Updated: 12 Aug 2026, 5:23 PM IST

education

education

विदेशों से डिग्री लेने की योजना बना रहे भारतीय छात्र डिग्री लेने के बाद स्वदेश लौटने की चाहत रख रहे हैं तो इस बदलाव को स्वागत योग्य कहा जाना चाहिए। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के हालिया 'स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स' से जुड़े सर्वेक्षण में विदेश में पढ़ाई की योजना बना रहे 81 प्रतिशत भारतीय छात्रों ने कहा कि वे डिग्री पूरी करने के बाद भारत लौटना चाहते हैं। हालांकि यह युवाओं के इरादे का संकेत भर है। फिर भी सर्वे यह बताता है कि विदेशी डिग्री अब कई युवाओं के लिए स्थायी पलायन के बजाय वैश्विक अनुभव लेकर स्वदेश में अवसर तलाशने का माध्यम बनती दिख रही है।

विदेश में (खासतौर से अमरीका में) रहने के सख्त होते नियम, वैश्विक रोजगार बाजार की अनिश्चितता या भारत में उभरते अवसर, ये सब कारण मिलकर भारत के लिए उम्मीद जगाने वाले हैं। लेकिन यहीं बड़ा सवाल है, क्या भारत लौटते टैलेंट के लिए तैयार है? यह सवाल इसलिए भी क्योंकि विदेश से लौटने वाला युवा सिर्फ डिग्री लेकर ही नहीं आता, वह नई तकनीक, काम की नई संस्कृति, शोध का अनुभव, वैश्विक नेटवर्क और समस्याओं को देखने का नया नजरिया साथ लेकर आता है। सवाल यह है कि हमारी व्यवस्था इन क्षमताओं को जगह दे पाएगी? हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं लेकिन व्यवस्थागत खामियां, रोजगार की अनिश्चितता, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बडिय़ां, पेपर लीक, शोध में संसाधनों की कमी और अपना उद्यम शुरू करने में सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता की दीवारों से देश के भीतर की प्रतिभा भी टकराती रही है। जाहिर है, विदेश से लौटने वाला युवा तो इन सबसे घबरा ही जाएगा। अगर उसने दुनिया की अत्याधुनिक प्रयोगशाला में काम किया है और यहां शोध की मंजूरी में महीनों लग जाएं, अगर उसने वहां स्टार्टअप की सहजता देखी है और यहां कारोबार शुरू करने में दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, अगर उसने योग्यता आधारित व्यवस्था देखी है और यहां सिफारिश उसकी राह रोक दे तो डर इस बात का भी है कि कहीं उसे फिर से परदेस ही रास ना आने लगे।

यह समझना होगा कि 'ब्रेन ड्रेन' को हम महज देशभक्ति के नारों से 'ब्रेन गेनÓ में नहीं बदल पाएंगे। लौटते टैलेंट के लिए स्वागत संदेश नहीं, सक्षम इकोसिस्टम चाहिए। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को अधिक स्वायत्तता व स्टार्टअप और नवाचार के लिए आसान नियम चाहिए। सरकारी और निजी क्षेत्र में योग्यता, पारदर्शिता और पेशेवर स्वतंत्रता को प्राथमिकता देनी होगी। भारत के लिए यह केवल प्रतिभा वापस आने का अवसर नहीं, ज्ञान, तकनीक और वैश्विक अनुभव लाने का अवसर भी है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि प्रतिभा को देश में बुलाना आसान है, उसे यहां उडऩे की जगह देना असली परीक्षा है। कसौटी यही है कि पारंगत युवाओं को लौटने की वजह से ज्यादा, लौटकर टिकने की वजह चाहिए। क्या हम उन्हें यह दे पाएंगे?