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हरियाली बढ़ाने के जतन मन से किए जाएं तो मेहनत का फल मिलता ही है। मध्य प्रदेश के दमोह जिले के गांवों में पच्चीस बरस पहले शुरू की गई पौधरोपण की छोटी सी मुहिम ने अब जिस तरह से विस्तार ले लिया है वह सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर पौधरोपण कार्यक्रमों के लिए नजीर कही जा सकती है। ये प्रयास बताते हैं कि पौधों को सिर्फ रोपना ही काफी नहीं बल्कि उन्हें बच्चे की तरह पालना भी पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह कि यहां हरियाली बढ़ाने के प्रयासों में जुटी संस्था ने अपना एक ही मकसद बनाया कि पौधे उतने ही लगाए जाएं जितनों की देखभाल हो सके। नतीजे सबके सामने हैं भी। पिछले तीन साल में ही इस क्षेत्र में लगाए गए तीन लाख पौधों में से नब्बे फीसदी सुरक्षित हैं।
हमारे पुरखे यूं ही नहीं कह गए कि 'हरियाली है तो जल है और जल है तो कल है'। यह बात भी सही है कि पिछले सालों में पर्यावरण को संरक्षित करने के प्रयासों में तेजी भी आई है। लेकिन ये प्रयास गैरसरकारी क्षेत्रों में ही ज्यादा नजर आते हैं। सरकारी स्तर पर कभी पर्यावरण दिवस के नाम पर तो कभी किसी जयंती व पर्व के नाम पर पौधे लगाने का उपक्रम तो होता है पर इनमें दिखावा ज्यादा होने लगा है। प्रत्येक वर्ष पर्यावरण दिवस पर सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं व आमजन भी बड़ी संख्या में पौधरोपण करते हैं लेकिन जो पौधे लगाए जा रहे हैं वे सुरक्षित रहें इसकी फिक्र कम ही होती है। राजस्थान में तो पिछले दिनों यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया था कि ७२ सरकारी महकमों ने साल भर में ११.५७ करोड़ पौधे लगाने और उनकी जियो टैगिंग का दावा किया लेकिन सिर्फ १.६९ करोड़ पौधों का ही सत्यापन किया गया। हैरत की बात यह भी कि सत्यापित किए गए इन पौधों में से भी महज १.३६ करोड़ पौधे ही जीवित पाए गए। पौधरोपण और रखरखाव के नाम पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद नतीजों की तो यह बानगी है। देश भर में कमोबेश एक जैसे हालात नजर आएंगे। पौधरोपण के नाम पर सरकारें करोड़ों रुपए का बजट प्रावधान करती तो हैं लेकिन पानी की चिंता करने वाली हरियाली के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। जाहिर है दिखावे के लिए पौधरोपण करना एक बात है और इन्हें पेड़ बनाना दूसरी बात। मध्य प्रदेश के दमोह जिले के छोटे से गांव से शुरू हुई मुहिम आज जिले के १६० गांवों तक पहुंची है तो उसकी वजह भी यही है कि पौधे वहीं लगाए गए जहां पानी और उनकी सुरक्षा का इंतजाम था।
भ्रष्टाचार की 'पौध' से कागजों मेंं हरियाली बताने से काम नहीं चलने वाला। ऐसी संस्थाओं व व्यक्तियों को भी प्रोत्साहन देने की जरूरत है जो पर्यावरण संरक्षण अभियानों में सदैव आगे रहते हैं। वस्तुत: पौधरोपण के नाम पर अभियान चलाने भर से काम नहीं चलने वाला। सरकारी महकमों को पुख्ता तंत्र भी विकसित करना होगा जो पौधों के पेड़ बनने तक निगरानी रखे।
Updated on:
11 Aug 2026 07:24 pm
Published on:
11 Aug 2026 07:24 pm
