
DigitalSovereignty
मानस गर्ग, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट
जयपुर में एक युवा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का छात्रों से माफी मांगता डीपफेक वीडियो बनाया और वायरल कर दिया। जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के समय केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और धर्मेंद्र प्रधान के डीपफेक वीडियो बनाए गए। यह तो चंद ताजा उदाहरण है। डीपफेक द्वारा डिजिटल लिंचिंग की सूची बहुत लंबी है। उचित कानून और डिजिटल एजुकेशन के अभाव में डीपफेक वीडियो को अधिकांश लोग सत्य मान लेते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि एआइ जिस तेजी से आम जिंदगी में शामिल हो रहे हैं, उसके दुष्प्रभावों के खिलाफ कोई ठोस कानून भारत में नहीं है, जबकि यह बीमारी संक्रमण का रूप ले चुकी है।
दरअसल, वर्तमान समय में एआइ और मशीन लर्निंग की तकनीकों ने सिस्टम की नींव हिला दी है। आज हम ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं, जहां किसी इंसान की उपस्थिति के बिना, केवल उसकी कुछ पुरानी तस्वीरों और चंद सेकेंड की आवाज के संपल के आधार पर उसका एक ऐसा वीडियो तैयार किया जा सकता है, जो शत-प्रतिशत वास्तविक प्रतीत होता है। डीपफेक केवल एक नया टेक्निकल इंटरटेनमेंट या फोटो एडिटिंग का आधुनिक रूप नहीं है, बल्कि यह ‘सत्यता के संकट’ की शुरुआत है। जब यह भेद करना असंभव हो जाए कि कौन सी आवाज सच है? कौन सा वीडियो फर्जी? तब न केवल व्यक्तिगत जीवन प्रभावित होता है, बल्कि लोकतंत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की अखंडता पर भी गहरा संकट मंडराने लगता है। भारत जैसे विशाल, विविध और तीव्र गति से डिजिटलीकरण की ओर बढ़ते देश के लिए यह चुनौती और भी अधिक भयावह और नीतिगत रूप से जटिल है। विडंबना यह है कि डीपफेक वीडियो या ऑडियो को देखकर आम आदमी तो दूर, साइबर एक्सपट्र्स के लिए भी तात्कालिक रूप से असलियत का पता लगाना अत्यंत कठिन हो जाता है। एआइ टूल्स अब इतने सरल और सुलभ हो चुके हैं कि साधारण स्मार्टफोन उपयोगकर्ता भी कुछ मिनटों में किसी का फर्जी वीडियो निर्मित कर सकता है।
डीपफेक का भयानक रूप महिलाओं के खिलाफ
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल आबादी वाले देशों में से एक है। भारत में करोड़ों लोग रोजाना सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स, जैसे वाट्सएप, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स पर निर्भर हैं। ऐसे में भारत के लिए डीपफेक केवल एक साइबर अपराध नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले सकता है। चुनाव, युद्ध, आर्थिक सुरक्षा को लेकर डीपफेक बेहद घातक साबित हो सकता है। डीपफेक का सबसे शर्मनाक और भयानक रूप महिलाओं के खिलाफ देखने को मिला है, जिसमें इंटरनेट पर उपलब्ध किसी महिला या युवती की सामान्य तस्वीर का इस्तेमाल करके एआई द्वारा अश्लील वीडियो बनाए जा रहे हैं। इसका उपयोग ब्लैकमेलिंग, चरित्र हनन और मानसिक उत्पीडऩ के लिए किया जा रहा है। डीपफेक का मुद्दा केवल इसके निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तेजी से फैलने से जुड़ा है। यहीं से ‘डिजिटल संप्रभुता’ का मूल प्रश्न खड़ा होता है।
सूचनाओं के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले प्लेटफॉर्म विदेशी कंपनियों के स्वामित्व में
डिजिटल संप्रभुता का अर्थ है कि किसी भी स्वतंत्र और संप्रभु देश का अपने डिजिटल क्षेत्र, अपने नागरिकों के डाटा, सूचना प्रवाह और डिजिटल इफ्रास्ट्रक्चर पर पूर्ण कानूनी और नियामकीय नियंत्रण होना चाहिए। वर्तमान में भारत में सूचनाओं के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले प्रमुख प्लेटफॉम्र्स (मेटा, गूगल, एक्स आदि) विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वामित्व में हैं। इन कंपनियों के ‘एल्गोरिद्म’ यह तय करते हैं कि कौन सी सामग्री उपयोगकर्ता की स्क्रीन पर सबसे ऊपर दिखेगी और कौन सी सामग्री दबा दी जाएगी। अभी हमने देखा कि मेटा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो ही देश में प्रतिबंधित कर दिया, जबकि जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़ा कंटेंट तेजी से वायरल हो रहा था। दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स के एल्गोरिद्म इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि वे सनसनीखेज, भडक़ाऊ और विवादित सामग्री को अधिक ‘एंगेजमेंट’ देते हैं, क्योंकि इससे उनका विज्ञापन राजस्व बढ़ता है। डीपफेक वीडियो जब वायरल होते हैं तो वे इन्हीं एल्गोरिद्म के दम पर कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाते हैं। जब तक भारतीय एजेंसियां या पीडि़त व्यक्ति उस प्लेटफॉर्म से संपर्क करके वीडियो हटाने की मांग करता है, तब तक जो नुकसान होना होता है, वह हो चुका होता है।
डीपफेक रोकने में लापरवाही डिजिटल संप्रभुता पर सीधा प्रहार
बड़ा सवाल यह है कि क्या एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत यह स्वीकार कर सकता है कि उसके नागरिकों का सामाजिक-राजनीतिक चिंतन, उनका मत और देश की शांति किसी विदेशी निजी कंपनी के गोपनीय और गैर-पारदर्शी एल्गोरिद्म द्वारा संचालित हो? यदि कोई विदेशी कंपनी भारत के कानूनों, अदालती आदेशों या राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की अनदेखी करती है या डीपफेक रोकने में लापरवाही बरतती है, तो यह भारत की डिजिटल संप्रभुता पर सीधा प्रहार है। विडंबना यह है कि देश में डीपफेक से सीधे तौर पर निपटने के लिए कोई समर्पित ‘एआइ कानून’ नहीं है। वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी एक्ट, 2000), धारा 66 डी (कंप्यूटर संसाधन का उपयोग करके धोखा देने पर सजा), धारा 66ई व 67 (गोपनीयता का उल्लंघन और अश्लील सामग्री के प्रकाशन पर प्रतिबंध), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) (जालसाजी, मानहानि, पहचान चुराने और धोखाधड़ी से संबंधित धाराएं), आइटी नियम 2021, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स को ‘मध्यस्थ’ माना गया है। नियम 3(1)(बी) के तहत प्लेटफॉम्र्स की यह जिम्मेदारी है कि वे गैर-कानूनी या फर्जी सामग्री को सूचना मिलने के 36 घंटे के भीतर हटाएं। ये कानून मुख्य रूप से पारंपरिक साइबर अपराधों के लिए बने थे। फिर, सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर यह तर्क देकर बच निकलती हैं कि वे केवल एक ‘प्लेटफॉर्म’ हैं और उपयोगकर्ता द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए वे सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं हैं।
अपनानी होगी आक्रामक रणनीति
समय आ गया है कि डीपफेक और डिजिटल संप्रभुता के संकट से निपटने के लिए केवल पुराने कानूनों में पैचवर्क करने से काम नहीं चलेगा। भारत को एक समग्र, आधुनिक और आक्रामक रणनीति अपनानी होगी। डीपफेक और डिजिटल सुरक्षा की लिए नई रणनीति बनानी होगी। भारत सरकार को बिना किसी विलंब के एक नया और स्पष्ट ‘एआइ विनियमन कानून’ लाना चाहिए। बिना सहमति के किसी व्यक्ति का डीपफेक बनाना, वॉयस क्लोनिंग करना या फैलाना संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए। चुनाव अवधि, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक मामलों में त्वरित सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक साइबर अदालतों का गठन हो।
साथ ही, प्रौद्योगिकी का मुकाबला केवल प्रौद्योगिकी से ही किया जा सकता है। सरकार को एआइ टूल विकसित करने वाली सभी कंपनियों (जैसे ओपनएआइ, गूगल, मिडजर्नी आदि) के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य करना चाहिए कि एआइ द्वारा जनित हर फोटो, वीडियो और ऑडियो में एक अदृश्य डिजिटल वॉटरमार्क अनिवार्य रूप से शामिल हो। इससे यह तुरंत पता चल सकेगा कि कोई वीडियो कैमरे से रिकॉर्ड हुआ है या एआइ द्वारा बनाया गया है। जो प्लेटफॉम्र्स डीपफेक को समय पर हटाने में विफल रहते हैं, उनसे ‘सेफ हार्बर’ (कानूनी सुरक्षा कवच) वापस ले लिया जाना चाहिए। संवेदनशील मामलों (जैसे चुनाव या राष्ट्रीय सुरक्षा) में डीपफेक की शिकायत मिलने पर प्लेटफॉम्र्स के लिए उसे 2 से 6 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य किया जाए।
कानून का प्रहार केवल धोखाधड़ी पर, रचनात्मक अभिव्यक्ति पर नहीं
डिजिटल संप्रभुता का अर्थ केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर होना भी है। भारत को विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहने के बजाय भारत की विविध भाषाओं और लहजों को समझने वाले स्वदेशी एआइ डीपफेक डिटेक्टर्स विकसित करने होंगे। देश के हर राज्य में अत्याधुनिक एआइ फोरेंसिक प्रयोगशालाएं स्थापित की जानी चाहिए, ताकि पुलिस और जांच एजेंसियां तुरंत साक्ष्यों की जांच कर सकें। कानून और तकनीक कितनी भी मजबूत क्यों न हो, जब तक नागरिक जागरूक नहीं होंगे, यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। नागरिकों में यह आदत डालनी होगी कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर सनसनीखेज सामग्री पर तुरंत भरोसा न करें। स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में ‘डिजिटल लिटरेसी’ और ‘मीडिया साक्षरता’ को शामिल किया जाए, ताकि युवा पीढ़ी फर्जी खबरों और डीपफेक को पहचानने में सक्षम बन सके। चूंकि, भारत एक जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) अपने नागरिकों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का मौलिक अधिकार देता है। लोकतंत्र में राजनीतिक कार्टून, पैरोडी, कॉमेडी, व्यंग्य और सरकार की नीतियों की आलोचना का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। एआइ का उपयोग कलात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिए भी किया जा रहा है। इसलिए, डीपफेक विरोधी कानूनों का दायरा इतना स्पष्ट होना चाहिए कि उसका गलत इस्तेमाल पत्रकारों, कलाकारों, राजनीतिक विरोधियों या आम नागरिकों की आवाज दबाने के लिए न किया जा सके।
कानून का प्रहार केवल धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, आपराधिक दुष्प्रचार, अश्लीलता और राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाले दुर्भावनापूर्ण डीपफेक पर होना चाहिए, न कि रचनात्मक अभिव्यक्ति पर। जब सरकार, न्यायपालिका, तकनीकी कंपनियां, मीडिया और नागरिक, ये सभी मिलकर एक रक्षा कवच का निर्माण करेंगे, तभी भारत अपनी डिजिटल सीमाओं, अपने लोकतंत्र और अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में सफल हो सकेगा। यही 21वीं सदी के ‘विकसित और सुरक्षित भारत’ का मार्ग है।
Updated on:
09 Aug 2026 06:58 pm
Published on:
09 Aug 2026 06:58 pm
