
loan problems
सतीश सिंह,(बैंकिंग एवं आर्थिक विषयों के जानकार)
भारतीय परिवारों की वित्तीय स्थिति इन दिनों एक गहरे विरोधाभास से गुजर रही है। शेयर और म्यूचुअल फंड जैसे साधनों में निवेश घटा है, जबकि नकदी, बैंक जमा, छोटी बचत और भविष्य निधि की ओर झुकाव बढ़ा है। लेकिन इसी अवधि में कर्ज लेने की रफ्तार बचत से कहीं अधिक तेज रही। नतीजा यह है कि परिवार जोखिम तो कम कर रहे हैं, पर उनकी वित्तीय सुरक्षा मजबूत नहीं हो रही। रिजर्व बैंक से संबद्ध उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में वित्तीय निवेश 12.9 फीसदी बढ़कर 42.89 लाख करोड़ रुपए हुआ, लेकिन देनदारियां 36.3 फीसदी बढ़कर 21.45 लाख करोड़ रुपए पहुंच गईं, कर्ज में 36.3 फीसदी की वृद्धि ने सकल वित्तीय निवेश की बढ़त को लगभग सोख लिया। जिससे वित्तीय सुरक्षा पर दबाव बढ़ा है। कोरोना महामारी के बाद घरेलू निवेशकों ने तेजी से पूंजी बाजार का रुख किया था। म्यूचुअल फंड और शेयरों में परिवारों का निवेश 2021-22 के 2.28 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 6.84 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। लेकिन 2025-26 में यह घटकर 5.68 लाख करोड़ रुपए रह गया। एक वर्ष में करीब 17 फीसदी की गिरावट जोखिम लेने की इच्छा में आई नरमी को रेखांकित करती है।
फिर भी इसे बाजार से पूर्ण मोहभंग या निवेशकों के पलायन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। पहला कारण यह है कि 2024-25 का आधार असाधारण रूप से ऊंचा था। दूसरा, 5.68 लाख करोड़ रुपए का बाजार-आधारित निवेश 2021-22 के 2.28 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले अब भी ढाई गुने के आसपास है। सबसे उल्लेखनीय बदलाव नकदी में आया है। परिवारों के पास रखी नकदी 2024-25 के 2.09 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 4.15 लाख करोड़ रुपए हो गई। बैंक जमा 12.55 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 15.32 लाख करोड़ रुपए, छोटी बचत 2.33 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 3.45 लाख करोड़ रुपए और पेंशन तथा भविष्य निधि में निवेश 7.88 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 8.69 लाख करोड़ रुपए हो गया। इसके उलट जीवन बीमा में निवेश 6.30 लाख करोड़ रुपए से घटकर 5.62 लाख करोड़ रुपए रह गया।
नकदी और बैंक जमा की ओर वापसी के कई संभावित कारण बाजार में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, भविष्य की आय को लेकर आशंका और आपात जरूरतों के लिए अधिक तरलता रखने की इच्छा हो सकते हैं। लेकिन नकदी बढऩा हमेशा मजबूत वित्तीय स्थिति का प्रमाण नहीं होता। यह सावधानी का संकेत हो सकता है, तो खर्च और आय को लेकर असुरक्षा का भी। वित्त वर्ष 2025-26 में परिवारों की नई वित्तीय देनदारियां 21.45 लाख करोड़ रुपए के रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। यह राशि संबंधित वर्ष के दौरान जुड़ी वित्तीय देनदारियों का प्रवाह है। बैंकों और एनबीएफसी से उधारी में सबसे अधिक वृद्धि हुई। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कर्ज किस उद्देश्य से लिया गया, लेकिन इसकी तेज रफ्तार घरेलू वित्तीय दबाव बढऩे का संकेत देती है। सकल वित्तीय निवेश में से नई वित्तीय देनदारियां घटाने पर परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत का अनुमान मिलता है। 2024-25 में यह अंतर करीब 22.25 लाख करोड़ रुपए था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 21.44 लाख करोड़ रुपए रह गया। इस तरह लगातार दो वर्षों की बढ़त के बाद शुद्ध वित्तीय बचत में करीब 3.6 फीसदी की कमी आई।
इसका अर्थ यह नहीं है कि परिवारों ने बचत करना छोड़ दिया, बल्कि यह है कि उनकी उधारी, बचत से तेज गति से बढ़ी। यह रुझान मध्यमवर्गीय और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों की वित्तीय कठिनाई को भी सामने लाता है। कुल वित्तीय निवेश बढ़ा है, लेकिन उसकी संरचना बदली है, अपने-आप में यह बदलाव न तो अच्छा है, न बुरा, इसका मूल्यांकन परिवार की आय, उम्र, लक्ष्य, आपात निधि और जोखिम उठाने की क्षमता के संदर्भ में होना चाहिए। असली चिंता यह है कि कर्ज की वृद्धि वित्तीय निवेश की बढ़त से कहीं तेज रही और शुद्ध वित्तीय बचत घट गई। यदि महंगा कर्ज रोजमर्रा की जरूरतों का स्थायी सहारा बनता गया, तो सुरक्षित निवेश साधनों की ओर बढ़ा झुकाव भी परिवारों को वास्तविक सुरक्षा नहीं दे पाएगा। इसलिए समाधान बाजार में अधिक जोखिम लेने या पूरी तरह सुरक्षित साधनों में सिमट जाने में नहीं, बल्कि आय, बचत, बीमा, निवेश और कर्ज के बीच संतुलन में है।
Updated on:
08 Aug 2026 07:08 pm
Published on:
08 Aug 2026 07:07 pm
