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अमर्यादित भाषा: सामाजिक संवेदनशीलता पर चोट

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच, संवेदनशीलता और संस्कारों का आईना है।अभद्रता को निर्भीकता मानने के बजाय हमें ऐसी भाषा चुननी होगी, जो असहमति के साथ भी सम्मान और गरिमा बनाए रखे।
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जयपुर

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Opinion Desk

Aug 11, 2026

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डॉ. ऋतु सारस्वत,(समाजशास्त्री एवं स्तंभकार)

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन ने ऐसी चर्चा को सामने लाकर खड़ा कर दिया, जिस पर शायद बहुत पहले बात हो जानी चाहिए थी। बात 'भाषा' की है। आंदोलन में कई बार भाषा का नियंत्रण टूटता हुआ नजर आया। बीते कुछ वर्षों में विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर भी अमर्यादित भाषा का प्रयोग लगातार बढ़ा है। इस 'असामान्य प्रवृत्ति' को हमने सामान्य मान लिया है। चिंता का विषय यह है कि अभद्र, अश्लील और अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को निर्भीक, प्रभावशाली और प्रभुत्वशाली समझा जाने लगा है। किंतु मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी विचार की शक्ति उसकी भाषा में प्रयुक्तअभद्रता और अश्लीलता से तय होती है, या उसके तर्क की दृढ़ता से?
पिछले कुछ दशकों में हमारे संवाद का स्वरूप तेजी से बदला है। स्टैंड-अप कॉमेडी, सोशल मीडिया रील्स, डिजिटल मंचों, सामाजिक विमर्श और राजनीतिक मंचों पर अभद्र, आपत्तिजनक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग लगातार बढ़ा है। यह अब कई मंचों पर लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम बन गया है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों और मानसिकता का प्रतिबिंब होती है। जब अमर्यादित भाषा सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनने लगे, तो यह समाज के बदलते मानदंडों और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का संकेत भी देती है। किसी व्यक्ति की भाषा उसके व्यक्तित्व, उसकी सोच और उसके सामाजिक व्यवहार का परिचय देती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में अभद्र, अश्लील और आक्रामक भाषा को लंबे समय तक पुरुषत्व और पुरुष वर्चस्व के साथ जोड़कर देखा जाता रहा। समय के साथ यह मिथक भी स्थापित होता गया कि अभद्र और आक्रामक भाषा किसी व्यक्ति को अधिक प्रभुत्वशाली बना देती है। इस मिथक के बीच एक और तथ्य है जो विचार करने योग्य है और वह यह हर समाज अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं के अनुरूप व्यक्ति के अंतरंग जीवन और उसकी गरिमा से जुड़े विषयों तथा शब्दों को अपनी सार्वजनिक शब्दावली से अलग रखता है परंतु बीते दशकों में यही विषय और उनसे जुड़े शब्द सामान्य बोलचाल का अभिन्न हिस्सा गए।

चिंतन का विषय यह है कि अभद्र और अश्लील भाषा का एक बड़ा हिस्सा अंतत: स्त्री की देह और अंतरंग संबंधों पर ही जाकर केंद्रित हो जाता है। निश्चित रूप से विश्व की लगभग सभी भाषाओं में प्रचलित बड़ी संख्या में अभद्र और अश्लील गालियां अंतत: स्त्री की देह, उसकी यौनिकता अथवा उससे जुड़े संबंधों पर जाकर केंद्रित हो जाती हैं। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि अनेक अवसरों पर इस प्रकार की भाषा का प्रयोग वे लोग भी करते दिखाई देते हैं, जो सार्वजनिक रूप से लैंगिक समानता और स्त्री गरिमा की पुरजोर वकालत करते हैं। परिणामस्वरूप भाषा की मर्यादा बनाए रखने वाला व्यक्ति अनेक बार अनावश्यक रूप से कम प्रभावी समझ लिया जाता है। यह स्थिति इसलिए और भी चिंताजनक है क्योंकि छद्म लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकृति के बदलते पैमाने का सबसे अधिक प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। क्षणिक आकर्षण को वास्तविक लोकप्रियता समझ लेने की यह प्रवृत्ति स्वस्थ सामाजिक व्यवहार के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। जिस प्रकार सम्मानजनक भाषा सामाजिक विश्वास को मजबूत करती है, उसी प्रकार उपहास, अपमान और अभद्र भाषा धीरे-धीरे सामाजिक संवेदनशीलता को भी क्षीण करती है। ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपने निबंध 'पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज' में चेताया था कि जिस प्रकार दूषित विचार भाषा को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूषित भाषा भी हमारी सोच को प्रभावित करने लगती है।

भाषा केवल हमारे विचारों को व्यक्त नहीं करती, बल्कि उन्हें गढ़ती भी है। हम जिस भाषा का निरंतर प्रयोग करते हैं, वही हमारी संवेदनाओं, सामाजिक व्यवहार और दूसरों के प्रति दृष्टिकोण को भी प्रभावित करने लगती है। यदि अश्लील और अपमानजनक भाषा को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार किया जाए तो उसका प्रभाव केवल संवाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक चेतना और आने वाली पीढिय़ों की सोच पर भी पड़ता है। यक्ष प्रश्न यह है कि जब विश्वभर में संवेदनशील वर्ग इस बात पर बल दे रहा है कि स्त्री-समानता का प्रथम अध्याय उसकी गरिमा और उसकी देह के प्रति सम्मान से प्रारंभ होता है, तब दूसरी ओर एक ऐसी प्रवृत्ति भी विकसित होती दिखाई दे रही है, जिसमें अभद्र और अश्लील भाषा को निर्भीकता, स्पष्टवादिता और प्रभाव का प्रतीक मान लिया गया है। इसका प्रभाव यह हुआ है कि कुछ महिलाएं भी यह मानने लगी हैं कि इसी भाषा का प्रयोग उन्हें पुरुषों के समान प्रभुत्व स्थापित करने में सहायक होगा। किंतु क्या समानता का अर्थ उसी भाषाई संरचना को स्वीकार कर लेना है, जिसने सदियों से स्त्री की देह को अपमान का माध्यम बनाया है?

भाषा किसी भी सभ्यता की आत्मा होती है। वह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि उस समाज की संवेदनशीलता, उसकी संस्कृति और उसके भविष्य की दिशा भी निर्धारित करती है। अभद्र, अश्लील और अमर्यादित भाषा को सामान्य व्यवहार, लोकप्रियता अथवा निर्भीकता का प्रतीक मान लेना किसी भी स्वस्थ समाज के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकता। मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, परंतु भाषा की मर्यादा किसी भी सभ्य समाज की पहचान होती है। यदि आने वाली पीढिय़ों को हम सम्मान, संवेदनशीलता और सार्थक संवाद की संस्कृति देना चाहते हैं, तो हमें अपनी सार्वजनिक भाषा पर पुनर्विचार करना ही होगा। प्रश्न केवल शब्दों का नहीं है। शब्द विचारों को जन्म देते हैं, विचार व्यवहार को दिशा देते हैं और वही व्यवहार किसी भी समाज के चरित्र का निर्माण करता है।