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एक ही ब्रांड, एक ही उत्पाद, लेकिन देश बदलते ही मानक बदल जाते हैं। भारत में जिस सामग्री के साथ कोई उत्पाद बिक सकता है, उस पर दूसरे देश में रोक या कड़ी पाबंदी है। भारत में जिस पेय को केमिकल से चटक नारंगी रंग का बनाया जाता है, यूरोप में वही पेय असली नारंगी से बना पीले रंग का मिलता है, क्योंकि वहां केमिकल मिलाने की इजाजत नहीं है। हर देश के अपने वैज्ञानिक और नियामकीय मानक हैं, लेकिन सवाल गंभीर है कि क्या भारतीय उपभोक्ता को सुरक्षा का वही स्तर मिल रहा है, जो दुनिया के बेहतर नियमन वाले बाजारों में मिलता है?
मुद्दा सिर्फ खाने की थाली का नहीं है। यही सवाल मोबाइल स्क्रीन पर भी खड़ा है। सोशल मीडिया के करोड़ों भारतीय उपयोगकर्ता अपना डेटा, व्यवहार और कंटेंट वैश्विक कंपनियों को सौंपते हैं। 2024 में वॉट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने मेटा पर 213 करोड़ रुपए से अधिक का जुर्माना लगाया। यानी यह मान लेना गलत होगा कि भारत में कंपनियां मनमानी करती रहेंगी और कोई पूछने वाला नहीं होगा। लेकिन सवाल यह है कि पूछने वाला कितनी देर में पूछता है और कितनी मजबूती से पूछता है? यहीं समस्या की जड़ है। कंपनियां अक्सर वही करती हैं, जिसकी 'गुंजाइश' बाजार और नियमन देते हैं। जहां नियम स्पष्ट हों, निगरानी लगातार हो और उल्लंघन पर कार्रवाई निश्चित हो, वहां अनुपालन कारोबारी संस्कृति बन जाता है। जहां कार्रवाई धीमी या अनिश्चित हो, वहां नियम सिर्फ जोखिम की कीमत बनकर रह जाते हैं। दुनिया के कई देशों ने इस फर्क को समझा है। ऑस्ट्रेलिया में आयातित और स्थानीय खाद्य पदार्थों के लिए समान खाद्य मानक हैं। अमरीका में खाद्य सुरक्षा के लिए मजबूत नियामकीय निगरानी है। यूरोप ने डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिए पारदर्शिता, जोखिम आकलन और जवाबदेही को अनिवार्य किया है। वहां के बाजार के अनुसार नियामक की पकड़ भी बड़ी है। भारत में कानूनों की कमी नहीं है। खाद्य सुरक्षा के नियम हैं, डेटा संरक्षण कानून है, डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिए नियम लगातार सख्त हो रहे हैं, लेकिन कमी है तो कानून और उसके अमल के बीच की दूरी में।
भारत को दुनिया की कंपनियां चाहिए, निवेश चाहिए, तकनीक चाहिए, रोजगार चाहिए, लेकिन इसके लिए भारतीय उपभोक्ता को कमजोर मानक देने की कोई मजबूरी समझ में नहीं आती। विदेशी कंपनी हो या घरेलू, नियम सबके लिए एक होने चाहिए। क्योंकि मजबूत नियमन विकास का विरोधी नहीं, भरोसेमंद बाजार की बुनियाद है। खाने से लेकर डेटा तक, सोशल मीडिया से लेकर एआइ तक, एक बात तय होनी चाहिए, भारतीय होने के कारण किसी नागरिक की सुरक्षा, निजता या उपभोक्ता अधिकारों का पैमाना छोटा नहीं हो सकता। भारत को अब आसान बाजार बने रहने की जरूरत नहीं। सबको स्पष्ट होना चाहिए- भारत बाजार है, प्रयोगशाला नहीं।
Updated on:
11 Aug 2026 04:00 pm
Published on:
11 Aug 2026 04:00 pm
