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डॉ.अनुभा जैन, वरिष्ठ पत्रकार
पीढिय़ों से भारतीय कृषि का आधार नियमित और अनुमानित मानसून रहा है। लेकिन आज किसानों को बढ़ते तापमान, लू, अनियमित वर्षा, बाढ़, लंबे सूखे और घटते भूजल स्तर जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ये परिस्थितियां फसल उत्पादन, किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में कृषि का लक्ष्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीली, अनुकूलनशील और टिकाऊ प्रणाली विकसित करना है।
इसी परिप्रेक्ष्य में एआइ, सेटेलाइट फोटो, ड्रोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और डिजिटल सलाहकारी प्लेटफॉर्म कृषि में बदलाव की नई दिशा तय कर रहे हैं। कृषि अब प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पूर्वानुमान आधारित बन रही है। हालांकि, तकनीक का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब किसान उसे प्रभावी ढंग से अपनाने और उपयोग करने में सक्षम होंगे।
खेत तक पहुंचे डेटा का लाभ
आधुनिक कृषि में प्रतिदिन भारी मात्रा में डेटा उत्पन्न हो रहा है। चुनौती यह है कि उपग्रहों, सेंसर्स और जलवायु मॉडलों से प्राप्त जटिल जानकारी को किसानों के लिए सरल और उपयोगी सलाह में कैसे बदला जाए। भारतीय विज्ञान संस्थान के एआइ एवं रोबोटिक्स प्रौद्योगिकी पार्क में विकसित एआइ आधारित हीट-स्ट्रेस पूर्वानुमान प्रणाली, किसानों को पहले से चेतावनी देकर फसलों को अत्यधिक गर्मी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकती है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट और एग्रीकल्चरल डवलपमेंट ट्रस्ट, बारामती जैसी पहल तथा खेतीबडी जैसे एग्रीटेक प्लेटफॉर्म किसानों को डिजिटल फार्म रिकॉर्ड, उपग्रह आधारित विश्लेषण और एआइ संचालित कृषि सलाह उपलब्ध करा रहे हंै।
ड्रोन, रिमोट सेंसिंग और आइओटी सेंसर फसलों, मिट्टी की नमी, जल उपलब्धता, पोषक तत्वों की कमी और कीट प्रकोप की वास्तविक समय में निगरानी कर रहे हैं। एआइ विश्लेषण के साथ इन तकनीकों का संयोजन पानी, उर्वरक और अन्य संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकता है, जिससे लागत घटेगी और उत्पादकता बढ़ेगी। यह कहा जा सकता है कि भारतीय कृषि को सशक्त बनाने के लिए नवाचार, जलवायु-लचीलापन, बाजार सुधारों और किसान-केंद्रित नीतियों के समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया है और अब भारत की कृषि विस्तार प्रणाली, विशेष रूप से कृषि विज्ञान केंद्रों को डिजिटल कृषि की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा।
नाबार्ड के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डॉ. सुधांशु केके मिश्रा ने जानकारी देते हुए बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विज्ञान केंद्रों को जलवायु पूर्वानुमान, उपग्रह डेटा और डिजिटल सलाह को किसानों तक व्यावहारिक रूप में पहुंचाने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सहभागी शिक्षण अभियान को मजबूत करना आवश्यक है।
जलवायु अनुकूलन खेत तक पहुंचे
जलवायु-सहिष्णु फसल किस्में, उन्नत रोपण सामग्री और अनुकूल कृषि पद्धतियां किसानों को बदलते मौसम के अनुरूप ढलने में मदद कर सकती हैं। इन समाधानों को कृषि विस्तार सेवाओं और डिजिटल सलाहकारी प्लेटफॉर्मों के माध्यम से शीघ्रता से किसानों तक पहुंचाना आवश्यक है। डॉ. मिश्रा ने कहा कि भारतीय नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट और नेशनल इनोवेशंस ऑन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर जैसे कार्यक्रमों से प्राप्त आंकड़ों को एआइ और वास्तविक समय की जलवायु सूचनाओं के साथ जोडकऱ क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।
पानी बचाने वाली खेती की ओर बढऩा होगा
भारतीय कृषि की एक बड़ी समस्या यह है कि जल-संकट वाले क्षेत्रों में भी धान और गन्ने जैसी अत्यधिक पानी मांगने वाली फसलों पर निर्भरता बनी हुई है। बदलते जलवायु परिदृश्य में यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि बागवानी, दलहन, तिलहन, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों की ओर विविधीकरण किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ जल संसाधनों पर दबाव भी कम कर सकता है। महाराष्ट्र में अंगूर, अनार और खट्टे फलों की सफलता तथा हिमाचल प्रदेश में सेब आधारित अर्थव्यवस्था इसके उदाहरण हैं। हालांकि उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी के कारण देश में बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद नष्ट हो जाते हैं। कोल्ड-चेन नेटवर्क, आधुनिक गोदाम और मूल्य संवर्धन अवसंरचना का विस्तार समय की आवश्यकता है।
तकनीक के साथ सर्कुलर कृषि की आवश्यकता
हाइड्रोपोनिक्स और सर्कुलर एग्रीकल्चर जैसे मॉडल भी भविष्य कृषि का हिस्सा बन सकते हैं। ये तकनीकें कम पानी, उपलब्धता, किसान जागरूकता और संस्थागत सहयोग पर निर्भर करेगी। बेंगलूरु स्थित एग्रीटेक ‘स्टार्टअप हैप्पीग्रीन’ के संस्थापक राजेंद्र सत्यनारायणा और भारती अथिनारायणन का मानना है कि जलवायु विज्ञान, एआइ, सरकारी एवं किसान संस्थानों और किफायती नवाचारों के बीच बेहतर तालमेल कृषि के भविष्य को मजबूत बना सकता है।
उत्पादन से परे: नुकसान में कमी और बाजारों की मजबूती
कृषि की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अनेक किसान आज भी अपनी उत्पादन लागत के अनुरूप मूल्य प्राप्त नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में केवल तकनीक अपनाने से कृषि का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। नीतिगत सुधारों में उन बटाईदारों और पट्टेदार किसानों को भी शामिल करना होगा जो आज भी औपचारिक ऋण, बीमा और सरकारी खरीद व्यवस्था से बाहर हैं। किसान उत्पादक संगठन किसानों की बाजार पहुंच और सौदेबाजी क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी पहलें यदि एआइ आधारित जोखिम विश्लेषण से जुड़ें तो संभावित नुकसान की पहले पहचान कर किसानों को समय रहते सहायता प्रदान की जा सकती है। डिजिटल कृषि के विस्तार के साथ डेटा स्वामित्व, गोपनीयता और किसानों की सहमति सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। नाबार्ड और कृषि अवसंरचना कोष डिजिटल अवसंरचना, ग्रामीण ड्रोन सेवाओं तथा जलवाय-अनुकूल कृषि निवेश को गति दे सकते हैं।
जमीनी आवाजें
डॉ.सुधांशु मिश्रा के अनुसार, छोटी जोतें, वर्षा आधारित खेती पर निर्भरता, जल-गहन फसलें, कमजोर कृषि विस्तार सेवाएं और अपर्याप्त बाजार अवसंरचना भारतीय कृषि की प्रमुख चुनौतियां हैं। उनका मानना है कि वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों की उत्पादकता और जलवायु लचीलापन बढ़ाना खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक है। उन्होंने फसल विविधीकरण, वाटरशेड विकास, कृषि वानिकी, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय मूल्य संवर्धन को कृषि की जलवायु-सहिष्णुता बढ़ाने के महत्वपूर्ण उपाय बताया। उनके अनुसार, पारिस्थितिकी तंत्र पुनस्र्थापन, जल संरक्षण और जलवायु-अनुकूल पौधरोपण पर्यावरणीय स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को मजबूत कर सकते हैं।
फार्मर साइंटिस्ट फैमिली के संस्थापक डॉ.महेंद्र मधुप का मानना है कि केवल तकनीक से कृषि परिवर्तन संभव नहीं है। मजबूत अवसंरचना, किसान प्रशिक्षण, मूल्य संवर्धन और बाजार सुधार समान रूप से आवश्यक हैं। उनके अनुसार, एआइ उत्पादकता और जलवायु लचीलापन बढ़ा सकता है, लेकिन किसानों की आय में स्थायी वृद्धि खाद्य प्रसंस्करण, स्थानीय मूल्य संवर्धन, सुलभ ऋण और मजबूत बाजार संपर्कों पर निर्भर करेगी। वे कहते हैं कि किसान केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर प्रसंस्करण, उद्यमिता और मूल्य संवर्धित कृषि में भी भागीदारी करें। कृषि का भविष्य किसान-चालित कृषि उद्योग में निहित है।
पद्मश्री सम्मानित किसान सुंदरम वर्मा ने पारंपरिक कृषि ज्ञान और आधुनिक नवाचार के समन्वय पर जोर देते हुए कम पानी वाली खेती, जैव विविधता आधारित कृषि, देशी फसल किस्मों, बहुफसली प्रणाली और पौधरोपण को जलवायु अनुकूलन के प्रभावी उपाय बताया। उन्होंने टिकाऊ कृषि अपनाने वाले किसानों के लिए दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन की आवश्यकता पर बल दिया।
दुनिया के लिए उदाहरण बन सकता है भारत
मुझे लगता है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती वैश्विक है, लेकिन भारत के पास इसका सामना करने के लिए वैज्ञानिक क्षमता, तकनीकी नवाचार और समृद्ध कृषि अनुभव मौजूद है। आवश्यकता इन संसाधनों को प्रभावी विस्तार तंत्र, वित्तीय समर्थन, निष्पक्ष बाजार और किसान-केंद्रित नीतियों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाने की है। भारत के खेतों का भविष्य केवल एआइ या ड्रोन पर नहीं, बल्कि तकनीक, नीति और किसानों के अनुभवजन्य ज्ञान के प्रभावी समन्वय पर निर्भर करेगा। यदि यह समन्वय सफल रहा, तो भारत न केवल अपनी खाद्य सुरक्षा सुदृढ़ करेगा, बल्कि जलवायु-स्मार्ट कृषि का वैश्विक मॉडल भी बन सकता है।
Updated on:
12 Aug 2026 05:46 pm
Published on:
12 Aug 2026 05:46 pm
