
हाल ही नेपाल में हुई विकट त्रासदी के फलस्वरूप हजारों लोगों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा तो अनगिनत लोगों को उनके परिजन और शुभचिंतक बस ढूंढते रह जाएंगे। कुछ ऐसा ही केदारनाथ में हुआ था, जब प्रकृति ने अपने दोहन पर रौद्ररूप प्रकट करते हुए विभीषिका का रूप लिया था। हर बार इन त्रासदियों के बाद आंसू बहाने की रस्म अदायगी के तहत भविष्य में पुनरावृत्ति न होने देने के लिए मंथन और बचाव एवं नए प्रयोग के लिए संसाधनों की बारिश होने लगती है। त्रासदी के बाद तो समस्त हितधारक चिंता और बचाव कार्य में लग जाते हैं लेकिन काश यही गंभीरता मूल कारणों का निदान कर इलाज करने में भी दिख पाती। यह सिर्फ नेपाल या केदारनाथ की कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया के हर कोने में यदा-कदा घटती ही रहती है। सियोल के हैलोवीन उत्सव और मीना में हज के दौरान मची भगदड़ भी इसी श्रेणी में रखी जा सकती है। समय के साथ दुर्घटना और त्रासदी की आवृत्ति निरंतर बढ़ती जा रही है।
इंसानी धैर्य के विलोपित होने अथवा अति उत्साह के परिणामस्वरूप घटित होने वाली घटनाओं में एक सामान्य कारक सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव के साथ दिखावे की संस्कृति की अनियंत्रित अभिवृद्धि भी है। इंसान के भ्रमण का मूल उद्देश्य भटककर अपनी उपस्थिति को अधिकतम समूह तक पहुंचाना होता है। इस आवेश में वह प्रकृति और व्यवहार के समस्त नियमों को दरकिनार कर मात्र प्रसारण में संलिप्त हो जाता है।
अनुत्तरित अहम प्रश्न है कि क्या किसी भी सेक्टर, स्थल या सेवा को प्रोत्साहित करने के लिए उसे पर्यटन के रूप में परिभाषित करना आवश्यक है। लक्षित उद्देश्य को उसके मूल रूप में ही प्रोत्साहित क्यों नहीं किया जा सकता। यदि पर्यटन की परिभाषा को देखें तो उसका अर्थ होता है कि अपने मूल स्थल, वातावरण या निवास से अन्यत्र अपने निजी उद्देश्य के लिए लगातार वर्षों से कम अवधि के लिए यात्रा और प्रवास। सैद्धांतिक रूप से यह आराम या व्यापार के लिए अंजाम दी जाने वाली गतिविधि हुआ करती थी। लेकिन कालांतर में इसने अपना स्वरूप बदल इतना आकर्षक कर लिया कि अब हर क्षेत्र, स्थल या सेवा के उन्नयन के लिए उसे पर्यटन के रूप में वर्गीकृत करने की गैर तार्किक दौड़ लगी है, मानो वहां पर्यटन ही प्रोत्साहन हो। इस संदर्भ में मेडिकल, धार्मिक, वन्यजीव, औद्योगिक, शिक्षा आदि का विशेष उल्लेख करना उचित होगा, जिनके प्रोत्साहन को पर्यटन के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए जनता विशेषरूप से अप्रवासियों को आकर्षित करने की कवायद की जाती है।
इस संदर्भ में सिंगापुर के संस्थापक प्रधानमंत्री ली कुआन युव का कथन उद्धृत करना उचित होगा। उनके अनुसार गैर स्थानीय का क्षणिक प्रवास एक किरायेदार जैसा होता है क्योंकि उसकी आत्मा उस देश या जगह से नहीं जुड़ी होती, फलस्वरूप उसे वहां के सौंदर्य, स्थायित्व और सुदृढ़ता से कोई सरोकार नहीं होता। इसी कारण पर्यटन के साथ साथ उन्होंने नागरिकों के मध्य भू स्वामित्व प्रोत्साहन के लिए ठोस कदम उठाए। अर्थात् पर्यटन से पहले स्थानीय पर विशेष ध्यान देना अधिक आवश्यक है । इसे भारतीय संदर्भ में यूं कहा जा सकता है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के चक्कर में घर का जोगी जोगना आण गांव का सिद्ध बन स्थानीय संसाधनों का न सिर्फ दुरुपयोग किया जाता है बल्कि स्थानीय जनता में तिरस्कार एवं उपेक्षा का भाव भी उत्पन्न कर देता है। आशय यह है कि पर्यटन को प्रोत्साहित करते हुए निश्चित संतुलन के साथ स्थानीय जनधन या प्राकृतिक संसाधन उपेक्षित नहीं होने चाहिए।
त्रासदी के दौर में विशेष तौर पर धार्मिक और मेडिकल क्षेत्र को पर्यटन के रूप में विकसित करने की होड़ का खामियाजा स्थानीय प्रकृति और मानव मात्र ने उठाया है। इन क्षेत्रों को पर्यटन के रूप परिभाषित करने के कारण पर्यटक के बोझ तले स्थानीय दब जाता है। इस होड़ में मेडिकल टूरिज्म के लिए अप्रवासियों एवं बाहरी व्यक्तियों को आकर्षित करने के लिए लक्षित भौगोलिक क्षेत्रों से अपेक्षाकृत कम लागत में इलाज मुहैया कराने के लिए अनुदान इत्यादि के माध्यम से आकर्षक योजनाएं लागू की जाती हैं। उनके तहत इलाज और चिकित्सा संस्थान स्थापना दोनों पर जोर दिया जाता है। विडंबना यह है कि इस पर्यटन के लिए ढांचागत सुविधाओं के निर्माण के लिए स्थानीय की अपेक्षा बाहरी को अधिक लचीली, त्वरित एवं सुगम प्रक्रिया के तहत सुविधाएं, अनुदान एवं ऋण कम लागत पर सुलभ करवा दी जाती है। परिणामस्वरूप स्थानीय व्यक्ति उचित इलाज और समर्थन से वंचित होने के कारण कुंठित हो जाते हैं।इसी प्रकार धार्मिक यात्रा के पर्यटन में तब्दील होने से सम्पूर्ण व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। पूर्व में धार्मिक यात्रा का एकमात्र उद्देश्य आस्था से जुड़ा होता था, बाकी प्राकृतिक सौंदर्य, एडवेंचर इत्यादि उसके बायप्रोडक्ट के जैसे प्राप्त होते थे।
उद्देश्य किसी विश लिस्ट की पूर्ति नहीं होकर जीवन में अपने आराध्य या ईष्ट को नयनों में बसाना होता था। यही हाल पवित्र नदी, सरोवर आदि स्थलों तक की जाने वाली यात्रा का होता था। सनातन के अनुसार तय परंपराओं एवं पद्धतियों के निर्वहन हेतु इन स्थलों का भ्रमण निर्धारित था ताकि व्यक्ति उक्त स्थलों का अहसास कर सके। इनका तनिक भी उद्देश्य प्रकृति का दोहन या आहत करने का होता था। यह यात्राएं दिखावटी न होकर उद्देश्य, कार्य या संस्कारपूर्ति के लिए होता था। यात्रा के पर्यटन में परिवर्तन के साथ ही मानसिकता पूर्णतया बदल गई है और उसके परिणाम आए दिन होने वाली त्रासदियों के रूप में जाग जाहिर हैं। चाहे मेडिकल हो या धार्मिक, पर्यटन नामकरण के साथ ही बेलगाम भीड़ ने निहित उद्देश्यों को नेपथ्य में धकेल दिया है। भीड़ मानसिकता और उससे उत्पन्न ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन से वैश्विक तापमान का प्रभावित होना अवश्यम्भावी है। वर्तमान में तो यह अर्थव्यवस्था के उन्नयन के लिए सुगम पथ के जैसे दिख रही है किंतु इस यात्रा से जुड़े खतरे अंधेमोड़ की तरह प्रतीक्षारत हैं। दुर्भाग्यवश हमने हादसों से सीख लेने की जगह स्वयं को प्रतिस्पर्धा की अंधीदौड़ में जोत दिया है। धार्मिक या मेडिकल को पर्यटन के स्थान पर उनके मूल शब्दावली यात्रा और सेवा के जैसे ही विकसित किया जाना भावनात्मक विकारता को रोकने में मददगार सिद्ध होगा। इसके लिए सरकार के स्तर पर नीति के अतिरिक्त व्यक्तिगत अनुशासन की भी महती आवश्यकता है।प्रोत्साहन और पर्यटन कहीं से भी पर्यायवाची न होकर एक दूसरे के पूरक हैं और उनके मूलरूप में ही जिए जाने चाहिए। यदि हर प्रोत्साहन के लिए पर्यटन के रूप में ही विकसित किया जाता रहा तो त्रासदियों का क्रम निरंतर बढ़ता ही जाएगा।