प्रो. हिमांशु राय के अनुसार, सच्चा नेतृत्व विनम्रता, आत्मचिंतन और उद्देश्यपरक सोच में निहित है। विनम्र लीडर अहंकार से दूर रहकर सीखने की प्रवृत्ति बनाए रखता है, प्रशंसा में संयम और आलोचना में आत्ममंथन करता है। सेवा-भाव से किया गया नेतृत्व ही स्थायी विश्वास और सफलता का आधार बनता है।
प्रो. हिमांशु राय - निदेशक (आइआइएम, इंदौर),
आज जब संसार प्राय: ऊंची आवाज में बात करने, आक्रामक आत्मप्रदर्शन करने और प्रभुत्व को नेतृत्व का पर्याय मान लेता है, ऐसे में विनम्रता एक शांत किंतु परिवर्तनकारी गुण के रूप में सामने आती है। नेतृत्व में विनम्रता का अर्थ स्वयं को छोटा समझना नहीं है, बल्कि स्वयं को केंद्र में रखने की प्रवृत्ति से ऊपर उठना और उद्देश्य के प्रति स्थिर रहना है।
विनम्रता स्थिरता है, संकोच नहीं: विनम्र लीडर न तो दुर्बल होता है, न आत्मविलुप्त। वह अपने अस्तित्व और मूल्यों में दृढ़ रूप से स्थित होता है। उसे न तो स्वयं की प्रशंसा करनी होती है, न दूसरों पर प्रभुत्व जमाने की आवश्यकता होती है, क्योंकि उसके कर्म स्वयं सब कुछ स्पष्ट करते हैं। ऐसा लीडर एक वटवृक्ष के समान होता है, जो बिना अपनी विशालता की घोषणा किए सबको छाया देता है।
जानने से अधिक सीखने का भाव: विनम्रता ही लीडर को निरंतर सीखते रहने के लिए प्रेरित करती है। एक विनम्र लीडर अपने अधीनस्थों और आलोचकों से यहां तक कि अपनी विफलताओं से भी सीखने को तत्पर रहता है।
अहंकार नहीं, उद्देश्य पर दें ध्यान: विनम्र लीडर मान्यता या प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि सेवा के लिए नेतृत्व करता है। उसके लिए पद से अधिक लक्ष्य महत्त्वपूर्ण होता है और स्वयं से अधिक अपनी टीम। यही अहंकार से उद्देश्य की ओर यात्रा विश्वास का निर्माण करती है।
प्रशंसा में संयम, आलोचना में आत्मचिंतन: विनम्र लीडर प्रशंसा को सहजता से स्वीकार करता है, उसमें गर्व नहीं अनुभव करता। वह आलोचना से रक्षात्मक नहीं होता, बल्कि उसे आत्मविकास का दर्पण मानता है। यह संतुलन सम्मान को जन्म देता है। यह दुर्बलता नहीं, बल्कि आंतरिक दृढ़ता का संकेत है। विनम्रता नेतृत्व को शक्ति के प्रदर्शन से सेवा की अवस्था में रूपांतरित कर देती है और वहीं उसकी सबसे गहरी सामर्थ्य निहित होती है।