16 फ़रवरी 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Student Mental Health: उपस्थिति नियमों को लचीला बनाने की आवश्यकता

उच्च शिक्षा संस्थानों में कठोर उपस्थिति नियम छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं। निलंबन और परीक्षा से वंचित करना संवेदनहीनता को दर्शाता है। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा मौलिक अधिकार है और संस्थानों को दंडात्मक नहीं, बल्कि छात्र-हितैषी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

4 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Feb 16, 2026

Delhi High Court Education Order

कॅरियर में एक या दो वर्ष की देरी केवल समय की बर्बादी नहीं है।

प्रो. देविंदर सिंह,

आज जब हम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास की बात करते हैं, तब हमें उन युवा प्रतिभाओं की याद आती है, जिन्होंने शैक्षणिक संस्थानों के कठोर निर्णयों के कारण अपना जीवन समाप्त कर लिया। इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के एक विधि विद्यार्थी ने उपस्थिति संबंधी नियमों के उल्लंघन पर लगाए गए निलंबन के परिणामस्वरूप आत्महत्या कर ली। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी शैक्षणिक व्यवस्था में व्याप्त संवेदनहीनता का प्रतीक है। जब एक छात्र को उसके शैक्षणिक संस्थान से निष्कासित किया जाता है या निलंबित किया जाता है, तो वह केवल एक सेमेस्टर नहीं खोता - वह अपना बहुमूल्य समय, अपना आत्मसम्मान, अपने परिवार का विश्वास, अपने साथियों के बीच प्रतिष्ठा और सबसे महत्वपूर्ण, अपने सपनों को साकार करने की क्षमता खो देता है।

निलंबन, पुन:नामांकन या प्रतिबंध का सामना करने वाले छात्र गंभीर मानसिक आघात से गुजरते हैं। वे अवसाद, चिंता और सामाजिक अलगाव के शिकार हो जाते हैं। उनके कॅरियर में एक या दो वर्ष की देरी केवल समय की बर्बादी नहीं है - यह उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कमजोर करती है, उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ डालती है और उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ देती है। ऐसे छात्रों के पास सम्मानजनक जीवन और रोजगार प्राप्त करने के विकल्प सीमित हो जाते हैं। जब एक युवा व्यक्ति अपने साथियों को आगे बढ़ते देखता है जबकि वह स्वयं प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फंसा रहता है, तो यह निराशा उसे आत्मघाती विचारों की ओर धकेल सकती है। यह शैक्षणिक विफलता से परे, संवैधानिक अनुच्छेद 21 में सुनिश्चित गरिमामय जीवन के मौलिक अधिकार का हनन तथा अस्तित्व का संकट है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अमित कुमार और अन्य बनाम भारत संघ के मामले में 17 जनवरी 2025 को न्यायाधीश जे.बी. पारदीवाला और न्यायाधीश आर. महादेवन की पीठ द्वारा पारित आदेश में शैक्षणिक संस्थानों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। यह निर्णय छात्रों के अधिकारों की रक्षा और शैक्षणिक संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि केवल उपस्थिति की कमी के आधार पर छात्रों को परीक्षा में बैठने से वंचित करना उचित नहीं है। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि शैक्षणिक संस्थानों को छात्रों की शिक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, न कि उन्हें दंडित करने की। यह निर्णय इस सिद्धांत पर आधारित है कि शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार है और इसे मनमाने तरीके से नहीं छीना जा सकता।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी यह स्पष्ट किया है कि शैक्षणिक संस्थान छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। उपस्थिति नियम महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि वे छात्रों के शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य को नष्ट कर दें। न्यायिक विधिशास्त्र में यह सिद्धांत स्थापित है कि किसी भी नियम का उद्देश्य छात्रों की बेहतरी होना चाहिए, न कि उन्हें दंडित करना। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार शामिल है और शिक्षा इस गरिमापूर्ण जीवन का अभिन्न अंग है। जब हम छात्रों को शिक्षा से वंचित करते हैं, तो हम वास्तव में उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

अब समय आ गया है कि शैक्षणिक संस्थान यह समझें कि छात्रों की उपस्थिति, निलंबन, पुन:नामांकन और प्रतिबंध से संबंधित निर्णयों की जिम्मेदारी पूरी तरह से उन पर है। यह केवल नियमों का पालन करने का मामला नहीं है- यह मानव जीवन और भविष्य की रक्षा करने का मामला है। हमें यह याद रखना चाहिए कि प्रत्येक छात्र जो हमारे संस्थान में प्रवेश लेता है, वह हमारी जिम्मेदारी बन जाता है। यदि कोई छात्र उपस्थिति में कमी या अन्य शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहता है, तो हमारा पहला उत्तरदायित्व यह पता लगाना है कि क्यों। क्या वह स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है? क्या उसे वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है? क्या वह मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों से गुजर रहा है? या वह केवल लापरवाही कर रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर खोजे बिना, हम किसी भी छात्र को दंडित नहीं कर सकते।

शैक्षणिक संस्थानों को समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। न्यायालय ने क्रेडिट पाठ्यक्रमों में कमी का सुझाव दिया है, परंतु हमें ऐसे विकल्प तलाशने चाहिए जो छात्रों की सहायता करें और साथ ही हमारी डिग्रियों की गुणवत्ता एवं मूल्य को बनाए रखें। वैकल्पिक समाधान जैसे उपचारात्मक कक्षाएं और वैकल्पिक शिक्षण विधियां का विकल्प होना चाहिए। आवासीय विश्वविद्यालयों में, हम निर्धारित समय सारणी से परे कक्षाएं आयोजित कर सकते हैं। गैर-आवासीय संस्थानों में, हम छुट्टियों के दौरान कक्षाएं आयोजित कर सकते हैं, ऑनलाइन शिक्षण का उपयोग कर सकते हैं, या व्यावहारिक कार्य और क्लिनिकल प्रशिक्षण के माध्यम से छात्रों को संलग्न कर सकते हैं। वैकल्पिक समाधान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र अपनी आवश्यक शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करें। यह दृष्टिकोण न केवल छात्रों के जीवन की रक्षा करेगा, बल्कि उनके भविष्य को भी सुरक्षित करेगा।

विश्व में सबसे अधिक युवाओं की जनसंख्या भारत देश में है, लगभग 30 प्रतिशत। देश की नीतियां युवा-केंद्रित होनी चाहिए, ताकि विकसित भारत ञ्च2047 के लक्ष्य की प्राप्ति में युवा शक्ति का प्रभावी, सार्थक और सतत उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव हैं जिन्हें सभी शैक्षणिक संस्थानों को अपनाना चाहिए।

यूजीसी, एआइसीटीई, बीसीआइ, पीसीआइ जैसे सभी नियामक प्राधिकरणों को अपनी नीतियों का पुनरीक्षण राष्ट्रीय शिक्षा नीति और युवा-केंद्रित दृष्टिकोण के अनुरूप करना चाहिए। द्वितीय, संस्थानों को छात्रों के साथ सक्रिय संवाद स्थापित करना चाहिए और उनकी कठिनाइयों को गंभीरता से समझना चाहिए। तृतीय, उपस्थिति नियमों को लचीला बनाया जाना चाहिए, विशेष रूप से उन छात्रों के लिए जो चिकित्सीय, पारिवारिक या अन्य वैध कारणों से कक्षाओं में उपस्थित नहीं हो सकते। चतुर्थ, प्रत्येक छात्र को व्यक्तिगत मार्गदर्शन के लिए संरक्षक (मेंटर) आवंटित किए जाने चाहिए जो उनके शैक्षणिक और व्यक्तिगत विकास में सहायता करें। पंचम, उपचारात्मक उपाय प्रदान किए जाने चाहिए ताकि छात्र अपनी कमियों को पूरा कर सकें। षष्ठम, ऑनलाइन और हाइब्रिड शिक्षण मॉडल को अपनाया जाना चाहिए जो अधिक लचीलापन प्रदान करते हैं।

सप्तम, संस्थानों में प्रेरक पुस्तकें, उपन्यास और पुस्तकालय सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए तथा छात्रों की रुचि के अनुसार सांस्कृतिक, खेल और रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए। अष्टम, छात्रों को परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

नवम, किसी भी छात्र को निलंबित या प्रतिबंधित करने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। दशम, संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी नीतियां संवैधानिक और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप हों। हमें यह याद रखना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें सशक्त बनाना है। जब हम किसी छात्र का भविष्य बचाते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति को नहीं बचाते- हम एक परिवार, एक समुदाय और अंतत: पूरे राष्ट्र को लाभान्वित करते हैं। आइए हम सब मिलकर एक ऐसी शैक्षणिक प्रणाली बनाएं जो करुणा, समझ और मानवीय गरिमा पर आधारित हो।