
सड़कों का बुनियादी ढांचा आला दर्जे का हो इसके लिए ही राष्ट्रीय व राज्य राजमार्गां पर टोल वसूली की जाती है। टोल वसूली की तकनीक भले ही बदल गई हो लेकिन सड़क निर्माण के ढीले दौर में बदलाव नहीं आया है। टोल चुकाने के बावजूद सड़कें क्षतिग्रस्त या आधी-अधूरी सड़केंï देशभर के दूसरी सड़कों की तरह राजस्थान में भी चिंता पैदा करती है। जयपुर को देश की राजधानी से जोडऩे वाले नेशनल हाइवे-४८ पर ही आधा दर्जन स्थानों पर निर्माण से जुड़े अवरोध वाहनों की आवाजाही में समस्याएं पैदा करने वाले हैं। कहीं अधूरे फ्लाइओवर के कारण तो कहीं सर्विस लेन से डायवर्जन तो कहीं ठेकदारों की सुस्ती इस संकट को बढ़ाने वाली है। हैरत की बात यह है कि इस हाईवे पर ज्यादातर काम में देरी हो रही है। ये काम पूरा करने की तय समयावधि तो कब के ही पार कर चुके हैं।
नेशनल हाइवे हो या फिर स्टेट हाईवे, चमचमाती सड़कें और जगह-जगह फ्लाई ओवर देखकर निश्चित ही विकास की दौड़ में कहीं आगे होने पर गर्व की अनुभूति होती है। लेकिन जब चमचमाती सड़कों को बनाने वाली कंपनियां टोल वसूली की रकम से मालामाल होती जाएं और इन सड़कों पर जगह-जगह अवरोध हादसों की वजह बन जाएं तो लोगों में गुस्सा होना स्वाभाविक है। आधी-अधूरी व खस्ताहाल सड़कें न केवल दुर्घटनाओं का सबब बनती जा रहीं है, बल्कि वाहनों के कलपुर्जों को भी नुकसान पहुंचा रही हैं।
पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम के बीच वाहन चालकों को यातायात जाम की वजह से ईंधन फूंकना पड़ता है सो अलग। ये सड़कें बेहतर हों तो समय व धन दोनों की बचत भी होती है लेकिन तय अवधि में फ्लाइओवर निर्माण नहीं होना या फिर निर्माण की शुरुआत ही नहीं होना घोर लापरवाही दर्शाता है। जब तक सड़कें पूरी तरह सुगम न हों, टोल वसूली में भी रियायत दी जानी चाहिए। सड़कों के समय पर निर्माण की व्यवस्था तो हो ही, देरी के लिए जिम्मेदारों पर भी सख्ती बरतना आवश्यक है।