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किराये के खातों से बढ़ता साइबर अपराध का जाल

डिजिटल केवाइसी ने बैंकिंग पहुंच बढ़ाई है, लेकिन यदि पहचान की जांच केवल औपचारिकता बन जाए, तो जाली दस्तावेज, गलत पता या किसी अन्य व्यक्ति के मोबाइल नंबर के सहारे खाते खोले जा सकते हैं। सबसे बड़ी चुनौती अवैध धन की बढ़ती रफ्तार है।
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जयपुर

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Opinion Desk

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सतीश सिंह

Sep 10, 2026

cyber

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डिजिटल भुगतान ने बैंङ्क्षकग को तेज, सुविधाजनक और सर्वसुलभ बनाया है, लेकिन इसके साथ वित्तीय अपराध के तरीके भी बदल गए हैं। साइबर अपराधी ठगी के लिए किराये के खाते का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उनकी पहचान छिपी रहे। ऐसे किराये के खातों को 'म्यूल खाता' कहा जाता है। आज निवेश, डिजिटल गिरफ्तारी, ऑनलाइन नौकरी, पार्सल, ऋण, गेमिंग और फर्जी कारोबारी योजनाओं से जुड़ी ठगी में म्यूल खाते अपराधियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हथियार होते हैं। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी आइ4सी के अनुसार 30 जून तक 32.08 लाख म्यूल खातों की जानकारी संबंधित संस्थाओं से साझा की गई और कई मामलों में समय पर सूचना मिलने के कारण 25,698 करोड़ रुपए के अवैध लेन-देन पर रोक लगाने में सफलता मिली।

'म्यूल' का सामान्य अर्थ भार उठाने वाले खच्चर से है। इसी से बना 'मनी म्यूल' शब्द उस व्यक्ति के लिए प्रयोग होता है, जो अपने बैंक खाते में जमा अवैध धन को देश और दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचाने का माध्यम बनता है। आमतौर पर ऐसे किराये के खाते में जमा अवैध पैसे दूसरे खाते या डिजिटल वॉलेट या आभासी मुद्रा के रूप (डिजिटल या क्रिप्टोकरेंसी) में परिवर्तित किए जाते हैं। दरअसल, कुछ लोग कमीशन या थोड़े से पैसे के लालच में अपना खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक, सिम कार्ड, यूपीआइ पहचान और इंटरनेट बैंकिंग संबंधी विवरण अपराधियों को सौंप देते हैं। वहीं, कुछ बेरोजगार युवाओं, विद्यार्थियों, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों और छोटे कारोबारियों को नौकरी, ऋण या निवेश का झांसा देकर फंसाया जाता है, जबकि कुछ व्यक्तियों के दस्तावेज चोरी कर या गलत तरीके से हासिल करके उनके नाम से खाते खोल दिए जाते हैं। यानी कि कोई जानबूझकर अपराध में सहयोग करता है, तो कोई अनजाने में उसका हिस्सा बन जाता है। म्यूल खातों की बढ़ती संख्या का पहला कारण डिजिटल लेनदेन का अभूतपूर्व विस्तार है। तत्काल भुगतान की सुविधा से वैध कारोबार आसान हुआ है, लेकिन अपराधियों को भी कुछ ही मिनटों में रकम कई खातों में हस्तांतरित करने का अवसर मिल गया है। ठगी की रकम अक्सर एक खाते में लंबे समय तक नहीं रखी जाती। कई बार अवैध पैसे को हवाला के माध्यम से वैध बनाने के बाद कोई तीसरा या चौथा व्यक्ति अपने खाते से नकद निकासी भी करता है या फिर ऐसे अवैध पैसे को आभासी मुद्राओं में तब्दील कर दिया जाता है।

दूसरा कारण संगठित साइबर अपराध है। अब बैंक खातों को हड़पने, बेचने और किराए पर देने वाला पूरा अवैध तंत्र सक्रिय है। सोशल मीडिया पर 'घर बैठे कमाई', 'खाता उपलब्ध कराने पर कमीशन' और 'भुगतान संग्रह एजेंट' जैसे प्रस्ताव देकर लोगों को आपराधिक गिरोह में जोड़ा जाता है। तीसरा कारण दूरस्थ और त्वरित खाता खोलने की सुविधा का दुरुपयोग है। डिजिटल केवाइसी ने बैंकिंग पहुंच बढ़ाई है, लेकिन यदि पहचान की जांच केवल औपचारिकता बन जाए, तो जाली दस्तावेज, गलत पता या किसी अन्य व्यक्ति के मोबाइल नंबर के सहारे खाते खोले जा सकते हैं। सबसे बड़ी चुनौती अवैध धन की बढ़ती रफ्तार है। शिकायत दर्ज होने तक रकम कई खातों में पहुंच चुकी होती है। प्रत्येक खाता अलग बैंक, राज्य या क्षेत्राधिकार में हो सकता है। ऐसे में बैंक, पुलिस, भुगतान मंच और दूरसंचार कंपनियों के बीच समन्वय में थोड़ी-सी देरी भी अपराधियों के लिए लाभकारी सिद्ध होती है।

दूसरी चुनौती यह है कि हर असामान्य लेनदेन अपराध नहीं होता। किसी छोटे व्यापारी, विवाह आयोजक या मौसमी कारोबारी के खाते में अचानक अधिक लेनदेन होना स्वाभाविक भी हो सकता है। केवल लेनदेन की संख्या या राशि के आधार पर खाता रोकने से निर्दोष ग्राहक परेशान हो सकते हैं। इसलिए, मामले में तकनीकी संकेतों के साथ मानवीय जांच भी जरूरी है। तीसरी चुनौती गलत तरीके से बंद या फ्रीज किए गए खातों की है। यदि किसी निर्दोष खाताधारक के खाते में अनजाने में संदिग्ध रकम आ जाए और उसका पूरा खाता लंबे समय के लिए फ्रीज दिया जाए, तो उसकी आजीविका प्रभावित हो सकती है। अपराध पर कार्रवाई और ईमानदार ग्राहक के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

रोकथाम के लिए केवल दस्तावेज प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। मोबाइल नंबर, पता, पेशा, आय के स्रोत और खाते के घोषित उद्देश्य में सामंजस्य भी देखा जाना चाहिए। एक ही पते, उपकरण या मोबाइल नंबर से अखातों के खुलने पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। खाते के व्यवहार की निरंतर निगरानी आवश्यक है। म्यूल खातों की रोकथाम में बैंक पहली रक्षा-पंक्ति हैं। उन्हें केवाईसी को एक बार की प्रक्रिया मानने के बजाय ग्राहक की जोखिम-स्थिति के अनुरूप समय-समय पर अद्यतन करना चाहिए। रिजर्व बैंक के नवोन्मेष केंद्र द्वारा विकसित 'म्यूलहंटर डॉट एआइ' संदिग्ध खातों की पहचान में उपयोगी पहल है। म्यूल खाता साइबर अपराध की कोई मामूली तकनीकी कड़ी नहीं, बल्कि वह सुरंग है जिसके माध्यम से अवैध धन अपराधियों और आतंकवादियों तक पहुंचता है और दोषियों के पहचान के बारे में पता नहीं चलता है। इस समस्या को सिर्फ खाता बंद करके समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए मजबूत केवाइसी, रियल टाइम निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विवेकपूर्ण उपयोग, त्वरित शिकायत निवारण प्रणाली और बैंक-पुलिस-सरकारी एजेंसियों के बीच निर्बाध व लगातार समन्वय आवश्यक है। साथ ही, आम लोगों को समझना होगा कि बैंक खाता निजी वित्तीय पहचान है, किराये पर देने वाली वस्तु नहीं। सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग का उत्तरदायित्व बैंक, सरकार और ग्राहक- तीनों की साझा जिम्मेदारी है।

(बैंकिंग एवं आर्थिक विषयों के जानकार)