भारत की आबादी ही भारत की वास्तविक शक्ति है, जिसके आधार पर आज विश्व के देश सम्मानपूर्वक भारत की ओर देख रहे हैं। ऐसे में, भारतीय जनसांख्यिकी के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए, जनसंख्या नियंत्रण कानून से अधिक महत्त्वपूर्ण है कि जनांकिकीय लाभांश को देशहित में करने के लिए समेकित प्रयास किए जाएं, इससे पहले कि ये जनांकिकीय त्रासदी में बदल जाए।

मोहम्मद जुबैर, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार
भारत में जनसंख्या का मुद्दा लंबे समय से बहस का विषय रहा है। हाल के दिनों में यह बहस तेज हो गई है। इसकी वजह एलन मस्क द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा की गई वह पोस्ट है, जिसमें भारत की घटती प्रजनन दर को लेकर चिंता जताई गई है। मस्क द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत के इतिहास में पहली बार देश की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) प्रतिस्थापन स्तर यानी 2.1 से नीचे गिरकर 1.9 पर पहुंच गई है। महज एक दशक पहले यह दर 2.3 थी। राजधानी दिल्ली की स्थिति और भी गंभीर बताई गई है, जहां प्रजनन दर लगभग 1.2 रह गई है, जो फिनलैंड जैसे कई विकसित देशों से भी कम है। आशंका व्यक्त की गई है कि आने वाले दशकों में भारत तेजी से वृद्ध होती आबादी वाले देशों की सूची में शामिल हो जाएगा। दरअसल, अब तक भारत में जनसंख्या संबंधी विमर्श मुख्यत: जनसंख्या नियंत्रण, सीमित संसाधनों पर बढ़ते दबाव और रोजगार जैसी चुनौतियों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। किंतु घटती प्रजनन दर के इन आंकड़ों ने बहस की दिशा बदल दी है। इस बीच पॉल एर्लिच बनाम जूलियन साइमन की जनसंख्या पर बहुचर्चित डिबेट फिर से प्रासंगिक हो गई है। एर्लिच ने बढ़ती जनसंख्या को ‘जनसंख्या बम’ बताकर इसे मानवता के लिए बड़ी चुनौती माना था, जबकि साइमन का तर्क था कि जनसंख्या स्वयं सबसे बड़ा संसाधन है और बढ़ती आबादी आर्थिक विकास, नवाचार तथा उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था की शक्ति बन सकती है। भारत के सामने बड़ा प्रश्न है कि यह जनसांख्यिकीय बदलाव उसके लिए शक्ति बनेगा या चुनौती? ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि इस दोराहे पर खड़ा भारत उन देशों से क्या सीख सकता है, जहां ऐसे बदलाव हुए हैं।
आने वाले दशकों में जनसंख्या दर पड़ सकती है धीमी
इस विमर्श को समझने के लिए भारत की जनसांख्यिकी को समझना जरूरी है। संयुक्तराष्ट्र और अमरीकी जनगणना ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार भारत वर्ष 2023 में चीन को पीछे छोडक़र विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। यही स्थिति वर्ष 2026 में भी बनी हुई है, जहां भारत की आबादी 144 करोड़ से अधिक है। भारत, आने वाले कई वर्षों तक सबसे अधिक आबादी वाला देश बने रहने की उम्मीद है। भारतीय जनसंख्या अध्ययन संघ की नवीनतम रिपोर्ट भी मस्क के पोस्ट की पुष्टि करती है। इसके अनुसार, भारत में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, वर्ष 2000 में जहां यह 3.5 थी, वहीं वर्तमान में यह घटकर 1.9 तक पहुंच गई है। कुल प्रजनन दर की अवधारणा यह बताती है कि एक महिला अपने प्रजनन काल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। प्रतिस्थापन स्तर 2.1 माना जाता है, इस स्थिति में न जनसंख्या बढ़ती है और न घटती है। लेकिन जब यह स्तर इससे नीचे चला जाता है, तो जनसंख्या धीरे-धीरे घटने लगती है; और वर्तमान प्रवृत्ति को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत इसी चरण की ओर अग्रसर है, जहां आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि और धीमी पड़ सकती है। इंडियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ पॉपुलेशन के अनुसार, भारत की जनसंख्या वर्ष 2080 तक लगभग 180 से 190 करोड़ के बीच पहुंचकर स्थिर हो सकती है।
छोटे परिवार’ की बढ़ती स्वीकृति ने जन्म दर को कम किया
भारत में प्रजनन दर में गिरावट कई सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों का परिणाम है। परिवार नियोजन के प्रसार और ‘छोटे परिवार’ की बढ़ती स्वीकृति ने जन्म दर को कम किया है। विवाह और मातृत्व के प्रति सोच भी बदल रही है, महिलाएं शिक्षा, कॅरियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता को अधिक महत्त्व दे रही हैं। महिलाओं की शिक्षा और लैंगिक समानता बढऩे से पुत्र-प्राथमिकता भी कमजोर हुई है। इसके साथ ही, अर्थशास्त्री गैरी बेकर द्वारा प्रतिपादित ‘चाइल्ड क्वांटिटी-क्वालिटी ट्रेड-ऑफ’ की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई है, जिसके तहत परिवार अधिक बच्चों के बजाय कम बच्चों की बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, घटती शिशु मृत्यु दर और गर्भनिरोधक साधनों की बढ़ती उपलब्धता ने भी जन्म दर में कमी को गति दी है। घटती प्रजनन दर भारत को किस तरह प्रभावित करेगी यह भविष्य की बात है, लेकिन कुछ अनुमान जरूर लगाए जा सकते हैं। एक ओर इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव पूंजी की गुणवत्ता में सुधार की संभावना है, वहीं दूसरी ओर दीर्घकाल में श्रमबल, उपभोक्ता आधार और आर्थिक वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
प्रजनन दर की गिरावट का असर स्थिरता पर
भारत जिस जनांकिकीय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में उन देशों से सबक ले सकता है, जो इससे गुजरे हैं। कई देशों में देखा गया है कि एक बार जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे चली जाए, तो उसे पुन: बढ़ाना अत्यंत कठिन हो जाता है। दक्षिण कोरिया इसका सटीक उदाहरण है, जहां जन्मदर वर्ष 2022 के 0.78 से घटकर वर्ष 2023 में 0.73 रह गई, जबकि सरकार परिवार बढ़ाने को प्रोत्साहित करने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर चुकी है। इसे समझते हुए चीन ने वन चाइल्ड पॉलिसी समाप्त कर 3 बच्चों तक की अनुमति दी, फिर भी उसकी प्रजनन दर 1.3 से ऊपर नहीं उठ पा रही है। वहीं जापान में कम प्रजनन दर ने श्रमबल को कमज़ोर किया है। नतीजतन वहा की अर्थव्यवस्था पिछले दशक की तुलना में लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर से गिरकर 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास सिमट कर रह गई है। ताइवान, सिंगापुर और इटली के अनुभव बताते हैं कि प्रजनन दर में तेज गिरावट किसी भी देश की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता, सामाजिक सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक स्थिरता को अस्थिर कर सकती है।
जनसंख्या चुनौती भी है और अवसर भी
जनसंख्या को लेकर अक्सर बहस होती है कि इसे चुनौती माना जाए या अवसर,पर सच यह है कि जनसंख्या चुनौती भी है और अवसर भी। यदि जनसंख्या ज़िम्मेदारी या बोझ बनने लगे तो चुनौती साबित होती है। यही जनसंख्या यदि साधन बन जाए तो एक देश के लिए इससे बड़ा अवसर और कोई नहीं। मानव भी तो संसाधन ही है। पोषण युक्त भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल, लैंगिक समानता, रोजगार आदि उपलब्ध कराकर जनसंख्या को अवसर में बदला जा सकता है। भारत में इन्हीं कुछ प्रयासों की अपर्याप्तता जनसंख्या को चुनौती मानने पर मजबूर करती है। अच्छी बात यह है कि वर्तमान भारत युवाओं का देश है, जहां बच्चों एवं वृद्धजनों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है। भारत में 15-64 वर्ष की आयु वर्ग की कामकाजी जनसंख्या काफी बड़ी है, जो कुल आबादी का लगभग 68 प्रतिशत है। वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 961 मिलियन लोग इस वर्ग में हैं। यानी वर्तमान में जनांकिकीय लाभांश भारत के पक्ष में है। लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं कि आगे भी रहे। आंकड़ों की माने तो भविष्य में ये ग्राफ बदलने की सम्भावना है। आज का युवा वर्ग आने वाले समय में वृद्धजनों के वर्ग में प्रवेश करेगा। जब वृद्धजनों की जनसंख्या युवाओं की तुलना में ज़्यादा होगी, चूंकि प्रजनन दर में कमी आ रही है। यह स्थिति अर्थव्यवस्था पर बड़ी जिम्मेदारी पैदा कर सकती है।
आबादी ही भारत की वास्तविक शक्ति
भारत के लिए आवश्यक है कि वह जनांकिकीय संक्रमण को अवसर में बदलने हेतु बहु-आयामी रणनीति अपनाए जिसके केंद्र में स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार हो, ताकि युवा आबादी उत्पादक श्रमबल में परिवर्तित हो सके। लैंगिक समानता के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए ताकि श्रमबल में महिलाओं की भी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। भविष्य के जोखिम को ध्यान में रखते हुए, वृद्धजनों के लिए आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पहल, उनके पुन: कौशल विकास और लचीले रोजगार विकल्पों को सुदृढ़ करना अनिवार्य है। बढ़ती इनफर्टिलिटी को देखते हुए प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। ध्यातव्य है कि भारत की आबादी ही भारत की वास्तविक शक्ति है, जिसके आधार पर आज विश्व के देश सम्मानपूर्वक भारत की ओर देख रहे हैं। ऐसे में, भारतीय जनसांख्यिकी के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए, जनसंख्या नियंत्रण कानून से अधिक महत्त्वपूर्ण है कि जनांकिकीय लाभांश को देशहित में करने के लिए समेकित प्रयास किए जाएं, इससे पहले कि ये जनांकिकीय त्रासदी में बदल जाए।