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शैक्षणिक संस्थानों को भी पेटेंट ऑडिट का महत्त्व समझना होगा

शोध को केवल लैब, एकेडमिक दायरे या पेटेंट तक सीमित रखने से समाज को नवाचार का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए विश्वविद्यालयों के लिए आवश्यक है कि वे उद्योगों के साथ मिलकर महत्त्वपूर्ण विषयों पर व्यावहारिक समाधान विकसित करें।
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Jul 14, 2026
PatentAudit
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विकास आसावत
आइपी अटॉर्नी एवं एडवोकेट

पेटेंट अधिकार किसी शोध या तकनीकी हस्तक्षेप द्वारा विकसित ऐसे नवीन उत्पाद या प्रक्रिया को दिया जाता है, जो ‘नॉन-ऑब्वियस’ एवं ‘आविष्कारशीलता’ के मानदंडों को पूरा करता हो। पेटेंट का मुख्य उद्देश्य इनोवेटर को उसके तकनीकी और शोध योगदान के लिए ‘20 वर्ष’ की सीमित अवधि तक व्यावसायिक अधिकार प्रदान करना है। शुरुआती दौर में पेटेंट आवेदन मुख्यत: बड़े उद्योगों तक सीमित थे लेकिन समय के साथ इस प्रणाली का उपयोग व्यक्ति, एमएसएमई, स्टार्टअप, शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों द्वारा भी किया जाने लगा है तथा आवेदनों में निरंतर वृद्धि देखने को मिल रही है।

विवि कर रहे पेटेंट
वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो विश्वविद्यालयों द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण शोध किए गए तथा उनके पेटेंट फाइल हुए, जिनका उपयोग आज मानव कल्याण के लिए हो रहा है। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा सीट बेल्ट का पहला आधुनिक संस्करण, सेंट पीटर्सबर्ग यूनिवर्सिटी में विकसित पीरियोडिक टेबल, क्लार्क विश्वविद्यालय में रॉकेट फ्यूल का विकास, येल विविविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा कीमोथेरेपी दवा का आविष्कार, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा पहली फुल-बॉडी सीटी स्कैन मशीन का विकास, वियना यूनिवर्सिटी में अल्ट्रासाउंड से संबंधित शुरुआती कार्य तथा इम्पीरियल कॉलेज में भारतीय मूल के वैज्ञानिक नरिंदर सिंह द्वारा फाइबर ऑप्टिक्स पर किया गया कार्य, जिसने आधुनिक संचार की नींव रखी। विश्वविद्यालयों के अपरिहार्य वैज्ञानिक योगदान के कुछ उदाहरण मात्र हैं।
‘2024.25’ में कुल पेटेंट आवेदनों में लगभग ‘35 प्रतिशत’ हिस्सा शैक्षणिक संस्थानों का रहा और इस अवधि में इनके द्वारा लगभग ‘38 हजार’पेटेंट आवेदन किए गए। आंकड़ों का सकारात्मक पहलू यह है कि पेटेंट आवेदन संबंधी जानकारी का व्यापक प्रसार हो रहा है और पेटेंट अधिक संख्या में फाइल हो रहे हैं। वहीं, इनके व्यावसायीकरण से संबंधित पहलू पर जागरूकता एवं इच्छाशक्ति का अभाव चिंता का विषय है। इसका एक प्रमुख कारण संस्थानों द्वारा ‘पेटेंट ऑडिट’ की अनदेखी करना है। पेटेंट ऑडिट किसी संस्था के पेटेंट पोर्टफोलियो की व्यवस्थित समीक्षा है, जिससे उसके पेटेंट की गुणवत्ता, कानूनी स्थिति, जोखिम तथा व्यावसायिक क्षमता का आकलन और प्रबंधन किया जा सके।

पेटेंट ऑडिट के लिए पारदर्शी एवं सुदृढ़ व्यवस्था की आवश्यकता
हालांकि उत्पाद एवं सेवा प्रदाता कंपनियां तथा रिसर्च सेंटर लंबे समय से पेटेंट ऑडिट के महत्त्व को समझते रहे हैं, लेकिन एकेडमिक संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में इस अवधारणा का क्रियान्वयन अभी भी सीमित है। इसके विपरीत, पेटेंट आवेदन प्रक्रिया तथा पेटेंट के नवीनीकरण आदि में होने वाले प्रशासनिक प्रयासों और लाखों रुपए की आर्थिक लागत को देखते हुए भारतीय एकेडमिक जगत में पेटेंट ऑडिट के लिए एक अनिवार्य, पारदर्शी एवं सुदृढ़ व्यवस्था की आवश्यकता है। पेटेंट ऑडिट से संस्थान और विश्वविद्यालय अपने शोध एवं नवाचार के व्यावसायिक मूल्य में वृद्धि कर सकेंगे तथा राष्ट्र के इनोवेशन इकोसिस्टम में व्यापक भूमिका निभा सकेंगे।
हाल ही में ‘नेचर’ के जर्नल ‘ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशन’ में प्रकाशित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, प्रयागराज के प्राध्यापक एवं शोधार्थी द्वारा किए गए शोध में भारत के प्रमुख 25 तकनीकी विश्वविद्यालयों का अध्ययन किया गया। इसमें आइआइटी, आइआइएससी तथा अन्य विश्वविद्यालयों के पेटेंट संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि सिस्टमैटिक पेटेंट ऑडिट के अभाव में संस्थान अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की व्यावसायिक और रणनीतिक क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। यह शोध भारत में पेटेंट पोर्टफोलियो को बेहतर बनाने, नवाचार को बढ़ावा देने तथा एकेडमिक रिसर्च के व्यावसायीकरण की क्षमता बढ़ाने के लिए पेटेंट ऑडिट के महत्त्व को रेखांकित करता है। पेटेंट ऑडिट से अनुपयोगी पेटेंट की फाइलिंग एवं नवीनीकरण पर होने वाले अनावश्यक खर्च में कमी आएगी, जबकि उपयोगी एवं व्यावहारिक रूप से महत्त्वपूर्ण पेटेंट पर निवेश को बढ़ावा मिलेगा और औद्योगिक साझेदारी के माध्यम से शोध का व्यावसायिक उपयोग भी बढ़ेगा।

शोध को जमीनी स्तर तक पहुंचाना नवाचार की उपयोगिता

इस दिशा में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल ने शोध व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण बदलाव किया है। संस्थान में अब पीएचडी के लिए शोध-पत्र प्रकाशित करने के साथ-साथ पेटेंट प्राप्त करना और उस तकनीक का व्यावसायिक हस्तांतरण भी डिग्री की पात्रता का आधार माना जाएगा। संस्थान की सीनेट ने यह भी तय किया है कि राष्ट्रीय महत्त्व के शोध विषयों को प्राथमिकता दी जाएगी तथा उत्कृष्ट कार्य होने पर तीन वर्ष से पहले भी थीसिस जमा की जा सकेगी।
वहीं, आइआइटी दिल्ली ने अपने पेटेंट एवं अन्य आइपी से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी संस्थान द्वारा गठित स्वायत्त निकाय फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को सौंप रखी है।जो नवाचारी विचारों के विकास के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने, प्रमाणित शोध आउटपुट से जुड़ी तकनीकों के हस्तांतरण तथा तकनीक के विकास एवं उसके व्यावसायिक उपयोग के लिए उद्योगों के साथ शोध साझेदारी से संबंधित गतिविधियों का संचालन करता है।
लैब में हुए शोध को जमीनी स्तर पर लागू करना और उसके लाभ को समाज तथा जनमानस तक पहुंचाना ही नवाचार की वास्तविक उपयोगिता है। यह वास्तविक जीवन की चुनौतियों के समाधान में शोध के महत्त्व को भी रेखांकित करता है। शोध को केवल लैब, एकेडमिक दायरे या पेटेंट तक सीमित रखने से समाज को नवाचार का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए विश्वविद्यालयों के लिए आवश्यक है कि वे उद्योगों के साथ मिलकर महत्त्वपूर्ण विषयों पर व्यावहारिक समाधान विकसित करें। विश्वविद्यालयों में पेटेंट ऑडिट को संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाकर इस दिशा में सार्थक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

Updated on:
14 Jul 2026 07:04 pm
Published on:
14 Jul 2026 06:43 pm