
चेहरे पर चमक लाने के लिए अब क्रीम और सीरम ही नहीं, नसों के रास्ते शरीर में विटामिन और दूसरे पदार्थ पहुंचाने का चलन भी बढ़ रहा है। अहमदाबाद में युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रही आइवी ड्रिप थेरेपी इसी बदलती प्रवृत्ति का संकेत है। ऊर्जा बढ़ाने, थकान दूर करने और त्वचा में निखार लाने के लिए युवा चार हजार से दस हजार रुपए तक खर्च कर रहे हैं। ऐसे में सवाल युवाओं के सौंदर्य पर खर्च करने का नहीं, उस सोच का है जिसमें चिकित्सा उपचारों को भी सौंदर्य प्रसाधनों की तरह अपनाया जाने लगा है। जब किसी प्रक्रिया के लाभों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध न हों, तब उसके आकर्षक दावों पर भरोसा करना कितना उचित है?
चमकदार दिखने की बढ़ती चाहत स्वास्थ्य और सौंदर्य के बीच की उस सीमा को धुंधला कर रही है, जिसे समझना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी है। आइवी यानी इंट्रावीनस थेरेपी में तरल पदार्थों और कुछ दवाओं को सीधे नसों के माध्यम से रक्तप्रवाह में पहुंचाया जाता है। गंभीर निर्जलीकरण, कुछ पोषक तत्वों की कमी और विशिष्ट चिकित्सकीय परिस्थितियों में यह उपचार आवश्यक हो सकता है। चिकित्सा विज्ञान में इसकी उपयोगिता स्थापित है। सवाल तब उठता है, जब इसी प्रक्रिया को स्वस्थ व्यक्तियों में अतिरिक्त ऊर्जा, बेहतर त्वचा और आकर्षक रंगत पाने का साधन बताकर प्रचारित किया जाता है। किसी उपचार का बीमारी की स्थिति में उपयोगी होना इस बात की गारंटी नहीं कि स्वस्थ व्यक्ति को भी उससे अतिरिक्त लाभ मिलेगा। चिकित्सा की आवश्यकता और सौंदर्य बाजार के दावों के बीच का यह अंतर समझना आवश्यक है। भारतीय त्वचा विशेषज्ञों ने भी इस विषय पर चिंता जताई है। एसोसिएशन ऑफ क्यूटेनियस सर्जन्स ऑफ इंडिया की टास्क फोर्स के वर्ष 2025 में प्रकाशित सहमति-पत्र में सौंदर्य संबंधी आइवी ड्रिप के लाभों को प्रमाणित करने वाले उच्च गुणवत्ता के वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी की ओर ध्यान दिलाया गया। स्वस्थ व्यक्तियों में त्वचा का निखार बढ़ाने के उद्देश्य से विटामिन सी और ग्लूटाथियोन जैसी ड्रिप के नियमित इस्तेमाल की अनुशंसा नहीं की गई।
यह निष्कर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाजार में जिन उपचारों को तेजी से परिणाम देने वाला बताया जा रहा है, उनके प्रभाव और सुरक्षा को लेकर चिकित्सा विज्ञान के पास अभी पर्याप्त ठोस प्रमाण नहीं हैं। ऐसे में प्रचार की चमक और वैज्ञानिक प्रमाणों की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर करना उपभोक्ता के हित में है। ग्लूटाथियोन इसका प्रमुख उदाहरण है। शरीर में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला यह एंटीऑक्सिडेंट त्वचा की रंगत हल्की करने के दावों के साथ सौंदर्य बाजार का हिस्सा बन चुका है। यहां एक बुनियादी वैज्ञानिक तथ्य समझना जरूरी है। किसी पदार्थ का शरीर में स्वाभाविक रूप से मौजूद होना और उसे बाहरी स्रोत से इंजेक्शन के जरिये देने पर मनचाहा सौंदर्य परिणाम प्राप्त होना दो अलग बातें हैं। उपलब्ध शोध में ग्लूटाथियोन के प्रभाव की अवधि, परिणामों की निरंतरता और लंबे समय तक इस्तेमाल की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। इसके बावजूद जब इसे त्वचा की रंगत बदलने और त्वरित निखार पाने के साधन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब वैज्ञानिक प्रमाणों की सीमाएं प्रचार के शोर में दब जाती हैं।
इसका जोखिम केवल अपेक्षित परिणाम न मिलने या हजारों रुपए खर्च हो जाने तक सीमित नहीं है। नसों के माध्यम से शरीर में पहुंचाए जाने वाले पदार्थों की गुणवत्ता, उनकी मात्रा, व्यक्ति की चिकित्सकीय स्थिति और प्रक्रिया के दौरान स्वच्छता जैसे पहलू सीधे स्वास्थ्य से जुड़े हैं। अगस्त 2026 में अमरीकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने इंजेक्शन के माध्यम से दिए गए ग्लूटाथियोन से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं पर चेतावनी दी थी। एजेंसी के अनुसार, उसे कम-से-कम 30 मरीजों में प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्ट मिली थी। इनमें बुखार, ठंड लगना, दर्द, चक्कर और गंभीर प्रतिक्रियाएं शामिल थीं। कुछ मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता पड़ी। संबंधित मामलों में ऐसे ग्लूटाथियोन उत्पादों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई गई, जिन्हें आहार पूरक के रूप में तैयार किया गया था, इंजेक्शन के लिए नहीं। इन घटनाओं को भारत में इस्तेमाल होने वाली सभी आइवी ड्रिप के जोखिम की दर नहीं माना जा सकता। फिर भी वे एक बुनियादी चेतावनी अवश्य देती हैं कि किसी पदार्थ की गुणवत्ता और उसे शरीर में पहुंचाने के तरीके को लेकर लापरवाही गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
किसी पदार्थ का सेवन के लिए सुरक्षित होना उसे इंजेक्शन के जरिये देने की सुरक्षा का प्रमाण नहीं है। इंजेक्शन में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों के लिए शुद्धता, गुणवत्ता और संदूषण से सुरक्षा के अलग मानक आवश्यक होते हैं। इसलिए ऐसी प्रक्रियाओं में प्रशिक्षित चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी, उपयुक्त उत्पादों का चयन और निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य महत्व रखते हैं। जिस उपचार के लाभों की पुष्टि पर्याप्त शोध से नहीं हुई है, उसके प्रति सावधानी ही समझदारी है। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक जांच, पारदर्शिता और जिम्मेदार चिकित्सा व्यवहार की आवश्यकता प्रचार के आकर्षण से कहीं अधिक है। आखिर चमकती त्वचा की चाहत में सेहत को दांव पर लगाना किस समझदारी का परिचायक है? स्वास्थ्य कोई ऐसा उत्पाद नहीं, जिसे महंगे पैकेज में खरीदकर तुरंत हासिल किया जा सके।
सोनम लववंशी,(स्वतंत्र लेखिका एवं शोधार्थी)