वैश्विक व्यवस्था बनाम ताकत: खतरनाक मोड़ पर दुनिया
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7 दिसंबर 1971 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित 'जहन्नुम में जाए डॉलर' आलेख
कुलिश जी के लेखन में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विश्लेषण केवल आर्थिक तथ्य नहीं, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी उपस्थित होता है। डॉलर आधारित सहायता व्यवस्था को वे एक ऐसे मायाजाल के रूप में देखते थे, जिसमें विकास के नाम पर निर्भरता और राजनीतिक दवाब छिपा रहता है। उनके मन में यह पीड़ा थी कि आर्थिक सहयोग की आड़ में शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर देशों की नीतियों को प्रभावित करने लगते हैं और स्वाभिमान पर आंच आती हैं। भारत-पाक संघर्ष की पृष्ठभूमि में उनका लेखन आत्मसम्मान की पुकार बन जाता है, यह संदेश देते हुए कि राष्ट्र की गरिमा किसी की आर्थिक प्रलोभन से बड़ी होती है।