यह लेख सार्वजनिक जीवन में संवाद की गिरती मर्यादा पर चिंता व्यक्त करता है। लेखक के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु असहमति को आरोप में बदलना चिंताजनक है। संयमित भाषा, सुनने की संस्कृति और परस्पर सम्मान से ही स्वस्थ, विश्वसनीय और सार्थक संवाद संभव है।
संध्या अग्रवाल,
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां संवाद के मंच पहले से कहीं अधिक विस्तृत और सुलभ हो गए हैं। सोशल मीडिया से लेकर टेलीविजन बहसों तक, सार्वजनिक सभाओं से लेकर संस्थागत बैठकों तक- हर जगह विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता लोकतांत्रिक समाज की शक्ति है। परंतु इसी के साथ एक चिंता भी उभर रही है कि सार्वजनिक जीवन में संवाद की मर्यादा धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। असहमति अब तर्क से अधिक आरोप में बदलती दिखाई देती है। मतभेद को विचारों की विविधता के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे व्यक्तिगत आक्षेप का रूप दे दिया जाता है। कई बार शब्दों की तीक्ष्णता विचारों की गंभीरता पर भारी पड़ जाती है।
संवाद का उद्देश्य समाधान या समझ की तलाश न रहकर तात्कालिक प्रभाव उत्पन्न करना बन जाता है। यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं है; सामाजिक और संस्थागत परिवेश में भी इसका असर देखा जा सकता है। इस परिवर्तन के पीछे त्वरित प्रतिक्रिया की संस्कृति एक बड़ा कारण है। डिजिटल माध्यमों ने प्रतिक्रिया को क्षणिक बना दिया है। बिना पूर्ण तथ्य जाने, बिना विचार को परिपक्व होने का समय दिए, प्रतिक्रिया देना सहज हो गया है। जब बोलना ही प्राथमिकता बन जाए और सुनना गौण हो जाए, तब संवाद स्वाभाविक रूप से संतुलन खो देता है। परंतु हर चुनौती अपने भीतर सुधार की संभावना भी लिए होती है।
संवाद की मर्यादा को पुनर्स्थापित करना असंभव नहीं है, बशर्ते हम इसे एक साझा जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करें। सबसे पहला कदम है- असहमति को सहज रूप से स्वीकार करना। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विचारों की विविधता स्वाभाविक है। मतभेद विघटन का संकेत नहीं, बल्कि बौद्धिक सक्रियता का प्रमाण हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि सामने वाले की राय हमसे भिन्न हो सकती है और फिर भी उसका सम्मान किया जाना चाहिए, तब संवाद स्वस्थ दिशा में बढ़ता है। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है- भाषा की शालीनता। सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्द केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं होते, वे सामाजिक चेतना को प्रभावित करते हैं। संयमित और सम्मानजनक भाषा असहमति को भी गरिमा प्रदान करती है। शब्दों की मर्यादा ही विचारों को विश्वसनीय बनाती है।
तीसरा आधार है- सुनने की संस्कृति का विकास। जब हम प्रतिक्रिया देने के बजाय समझने के लिए सुनते हैं, तब संवाद टकराव से विमर्श की ओर बढ़ता है। धैर्यपूर्वक सुनना हमें यह अवसर देता है कि हम किसी विचार के पीछे छिपे अनुभव और संदर्भ को समझ सकें। शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक मंचों पर स्वस्थ बहस की परंपरा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। नई पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि असहमति व्यक्त करना उनका अधिकार है, पर उसे सम्मानपूर्वक व्यक्त करना उनका दायित्व भी है। सार्वजनिक जीवन में संवाद की मर्यादा केवल नियमों से नहीं, बल्कि संस्कारों से निर्मित होती है। यह भीतर की सजगता से उपजती है कि विचारों का संघर्ष व्यक्ति की गरिमा पर आघात न बने।
संवाद की मर्यादा कोई औपचारिक प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का आधार है। यदि हम शब्दों में संयम, व्यवहार में धैर्य और दृष्टिकोण में व्यापकता लाएं, तो सार्वजनिक जीवन का स्वर स्वत: संतुलित और सार्थक हो सकता है। परिवर्तन की शुरुआत सदैव स्वयं से होती है और शायद संवाद की पुनर्स्थापना भी।