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एआइ व एल्गोरिदम की जुगलबंदी से मानसिक विकार

उन्होंने अदालत में अपना पक्ष रखते कहा कि मेटा के टूल नाकामयाब होने के लिए ही निर्मित किए गए। उनकी दलील थी कि मेटा ने बच्चों की डिजिटल कंटेट सुरक्षा को दरकिनार कर यूजर्स को प्लेटफार्म पर अधिक समय तक बनाए रखने और मुनाफे को ही केंद्र में रखा।
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Aug 27, 2026
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पूरी दुनिया में एआइ की तेज रफ्तार के साथ विवादों की तकरार ने एक विवादास्पद मोड़ ले लिया है। दरअसल एआइ के एल्गोरिद्म ने सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों को एक पसंदीदा भ्रामक गुब्बारे यानी बबल में कैद करना शुरू कर दिया है। इसके चलते वैश्विक स्तर पर मेटा के मालिक व सीईओ मार्क जुकरबर्ग, चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज ही नहीं, अपनी असंतुलित पॉलिसी के चलते कठघरे में है। ऐसी ही अनगिनत आपत्तियों सहित भारत सरकार का अकाट्य तर्क है कि देश में किसी भी डिजिटल कंपनी को अमरीकी कानूनों से नहीं, बल्कि भारतीय कानून व नियमों का पालन करना होगा। मामला अब इतना तूल पकड़ चुका है कि मेटा के लिए पारदर्शिता, निष्पक्षता और एजेंडा सेटिंग के आरोपों से बरी होना बहुत मुश्किल लगता है।

गौरतलब है कि हमारे देश के आइटी मंत्रालय ने मेटा से उसके एल्गोरिद्म, कंटेंट मॉडरेशन सहित कई बिंदुओं पर संज्ञान लेकर नियमित और देश की पॉलिसी के मुताबिक दुरुस्त करने का निर्देश दिया है। मेटा के एआइ और एल्गोरिदम पर वैश्विक विवाद की शुरुआत पिछले साल इसी महीने में हुई थी। तब मेटा के एआइ बॉट्स पर जांच से आंच का आगाज करते हुए अमरीकी सीनेटर जोश हॉली ने अनुसंधान शुरू किया था। वह जांच इस बात पर केंद्रित थी कि क्या मेटा विकसित डिजिटल उत्पाद या प्लेटफार्म बच्चों के लिए खतरा हैं या नहीं? जिसमें एक रिपोर्ट में किए दावे का हवाला दिया गया था कि मेटा ने अपने एआइ बॉट्स को बच्चों व अवयस्कों के साथ रोमांटिक और संवेदनशील बात करने की अनुमति दी थी। हालांकि मेटा के मायावी आघात पर सवाल तो वर्ष 2023 में ही पनप गया था और फेसबुक व इंस्टाग्राम के मालिक व सीईओ मार्क जुकरबर्ग पर नाबालिग यूजर्स के लिए कंटेंट से समझौता करने का आरोप लगाते हुए अमरीका के लगभग चालीस राज्यों ने मुकदमा दाखिल कर दिया। यही नहीं, मेटा पर चल रहे इस मुकदमे पर आक्षेप करते हुए पूर्व इंजीनियरिंग डायरेक्टर आर्टुरो बेहार ने मॉडल के व्यावहारिक पक्ष पर संगीन आरोप लगाए। उन्होंने अदालत में अपना पक्ष रखते कहा कि मेटा के टूल नाकामयाब होने के लिए ही निर्मित किए गए। उनकी दलील थी कि मेटा ने बच्चों की डिजिटल कंटेट सुरक्षा को दरकिनार कर यूजर्स को प्लेटफार्म पर अधिक समय तक बनाए रखने और मुनाफे को ही केंद्र में रखा। उन्होंने नोटिफिकेशन के डिजाइन को भी व्यापारिक हित के मुताबिक विकसित करने का तर्क पेश किया।

सुलगता विषय बच्चों व अवयस्कों की मानसिक सेहत पर कुठाराघात होने का है। इसलिए हाल में अमरीका के न्यू मैक्सिको की अदालत ने खतरे व सुरक्षात्मक उपाय की जरूरी जानकारी न देने के आरोप में मेटा पर लगभग 53 अरब रुपए का अतिरिक्त जुर्माना लगाया है। बताया जाता है कि इस जुर्माने में से लगभग 40 अरब रुपए बच्चों को हुए नुकसान की भरपाई और इलाज में खर्च किए जाएंगे। अपने आदेश में जज ब्रायन बिडशेड ने मेटा को फैक्ट्री बताते हुए बच्चों के डिजिटल यौन शोषण पर लगाम लगाने की सख्त चेतावनी जारी की है। मेटा के दिए गए निर्देश में स्पष्ट कहा गया है कि 18 साल से कम उम्र के यूजर्स यानी नाबालिगों को कोई वयस्क मैसेज नहीं भेज सकेगा और न ही अवयस्क उसे प्राप्त कर पाएंगे। साथ ही कच्ची उम्र के यूजर्स के लाइक्स की संख्या भी बैन होगी। इस विवाद के समानांतर मेटा और अन्य डिजिटल प्लेटफॉम्र्स में एआइ से उपयोगकर्ताओं को डिजिटल मोहपाश में जकडऩे पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि यूजर्स की रोज-रोज की खोज के पैटर्न दर्ज कर उन पर डीप टेलरिंग से मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा हो रहा है, जिसमें कच्ची उम्र ही नहीं, वयस्कों को भी यह आभास ही नहीं होता कि उसके विचार डिजाइन किए जा रहे हैं और वह एआइ प्रोफाइलिंग का शिकार बन चुका है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि यूजर्स की सोच को मूल विश्वास और पसंद के लुभावने दायरे में कैद कर एकतरफा पक्ष उपलब्ध कराया जा रहा है, जो कि उन्हें विविधतापूर्ण व जांची परखी गई सच्चाई जानने ही नहीं देता। ऐसे गुप्त दखल के परिणामस्वरूप एकतरफा वैचारिक सोच निर्मित की जा रही है। जो समाज में अवयस्कों को आक्रामक बनाते हुए संवाद की सुविधाजनक शैली से अलग-थलग कर टकराव की प्रवृत्ति को जन्म दे रही है।

मनोरोग विशेषज्ञों के मुताबिक मेटा के एआइ और एल्गोरिद्म की असंयमित जुगलबंदी और उम्र की आचार संहिता का ध्यान रखे बगैर एक अश्लील डिजिटल मायावी संसार ने अवयस्कों को डिजिटल यौन शोषण का शिकार बना दिया है, जिसने संस्कार और ज्ञानार्जन करने वाली पीढ़ी के विकास में मनोवैज्ञानिक अवरोध और विकार पैदा कर दिए हैं। लंदन की प्रोफेसर सैंड्रा की मानें तो एआइ से लैस इस ताकत पर कानूनी लगाम इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि हम एक ऐसे भविष्य की ओर रुख कर जाएं, जहां हमारी सोच हमारी ही न रह पाए।

बहरहाल भारत सहित दुनिया के कई और देशों ने भी लामबंद होकर अब मेटा को नियम कायदों पर अमल करने की सख्त चेतावनी जारी करते हुए ठोस कदम उठाना शुरू कर दिया है। वहीं आम जनता ने भी दावा कर दिया है कि 'मेटा से बिगड़ रहा है बेटा'। लिहाजा कहा जा सकता है कि मेटा ही नहीं, कई और सोशल मीडिया प्लेटफार्म को अपने एआइ व एल्गोरिदम ही नहीं, कंटेंट की सीमाएं विभिन्न देशों के हिसाब से भी तय करनी ही होगी, जिसे अमल में लाना इतना आसान नहीं होने वाला।

Updated on:
27 Aug 2026 03:22 pm
Published on:
27 Aug 2026 03:22 pm