
बीते कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या पाकिस्तान एक बार फिर सैन्य शासन की तरफ कदम बढ़ा रहा है? हाल में वहां हुए संविधान संशोधनों में सेना प्रमुख आसिम मुनीर को अधिक अधिकार देने के बाद शुरू ये सवाल रह-रहकर उछलने लगा है। रविवार को शहबाज शरीफ ने खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान की पार्टी वाली सरकार को बर्खास्त कर प्रांत में इमरजेंसी की घोषणा की तो वहां टकराव बढऩे की आशंका बढ़ गई है।यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान में शरीफ सरकार मुनीर के इशारे पर चल रही है और विपक्ष वहां बेहद कमजोर है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं। मुख्य विपक्षी दल पीटीआइ इन दिनों अपने नेता की रिहाई के लिए मार्च निकाल रहा है और इसके चलते पाकिस्तान एक बार फिर आंतरिक संघर्ष की राह पर खड़ा नजर आ रहा है। ठीक वैसे, जैसे किसी दौर में अयूब खान, याह्या खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ जैसे सेना अफसरों की सरकारों के साथ टकराहट रही थी। इन चारों ने अपने-अपने दौर में तख्तापलट किया भी और सालों तक पाकिस्तान सरकार का नेतृत्व भी किया। जनरल मुनीर भी लगता है देर-सबेर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने को बेताब नजर आ रहे हैं। सेना प्रमुख मुनीर अपनी ताकत बढ़ाने के लिए इमरान को जेल भिजवाकर अब चार प्रांतों वाले पाकिस्तान के दस-बारह हिस्से करने की योजना पर अमल कर रहे हैं। ऐसा करके वे शरीफ परिवार और सिंध में भुट्टो परिवार के राजनीतिक वजूद को घटा सकते हैं।
यह नीति साफ दिखाती है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र केवल दिखावा है। चुनी हुई सरकारें सेना की कठपुतली बनकर रह जाती हैं। संविधान संशोधनों के जरिये सेना को और शक्तियां सौंपकर मुनीर ने पकड़ मजबूत कर ली है। खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी लगा पीटीआइ के आखिरी प्रांतीय गढ़ को भी ध्वस्त कर दिया गया। मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी समेत कई नेता गिरफ्तार हो गए। स्पष्ट है कि विपक्ष को कुचलने और सेना के वर्चस्व को कायम रखने की नीति पूरी ताकत से चल रही है।पाकिस्तान की यह पुरानी बीमारी है कि जब भी राजनीतिक संकट गहराता है, सेना आगे आकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुचल देती है। यह नीति न केवल उसके नागरिकों के लिए खतरा है बल्कि क्षेत्रीय अस्थिरता भी पैदा कर रही है। जेल में बंद इमरान खान और सड़कों पर उतरे युवाओं का गुस्सा अगर और भड़का तो आंतरिक संघर्ष और बढ़ेगा। मुनीर की महत्वाकांक्षा और प्रांतों को बांटने की चाल से साफ है कि पाकिस्तान सैन्य शासन की ओर तेजी से बढ़ रहा है। पाकिस्तान को अगर सचमुच स्थिरता चाहिए तो सेना को बैरक में लौटना होगा और असली लोकतंत्र को जगह देनी होगी। वरना यह चक्र बार-बार दोहराया जाता रहेगा और देश अस्थिरता के दलदल में धंसता रहेगा।