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ई-वेस्ट पर अंकुश के लिए ‘राइट टू रिपेयर’ पर हो जोर

भारत में भी वर्ष 2022 में उपभोक्ता मंत्रालय के तहत राइट टू रिपेयर पोर्टल बनाकर कृषि, ऑटोमोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत के लिए 65 से अधिक निर्माता कंपनियों से मरम्मत को सुलभ बनाने के लिए घोषणा करवाई है।
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भारत

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Opinion Desk

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डॉ. विवेक एस. अग्रवाल

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Oct 14, 2026

e waste

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भौतिकवादी युग में उपभोग की वस्तु का निरंतर बदलाव शान-शौकत के लिए तो अच्छा हो सकता है, किंतु यह प्रकृति को अपरिवर्तनीय नुकसान भी पहुंचाए जा रहा है। शायद यह अविश्वसनीय लगे, किंतु उपलब्ध तथ्यों के अनुसार यदि उपयोग में लाए जा रहे उपकरणों एवं मशीन की मरम्मत होकर उसके जीवनकाल को बढ़ा दिया जाए तो कार्बन उत्सर्जन नए उत्पादन की अपेक्षा 80 प्रतिशत तक कम हो सकता है। लेकिन नीतिगत स्तर पर कठोर कानून के अभाव में अब भी उपकरण एवं मशीन निर्माता अपनी मनमानी के चलते आवश्यक कलपुर्जों को अपने प्रतिष्ठानों के अतिरिक्त उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं। साथ ही, आमजन में यह भी दृढ़ता के साथ प्रत्यारोपित कर दिया गया है कि यदि किसी वस्तु की मरम्मत कंपनी प्रतिष्ठान के अतिरिक्त करवाई जाती है तो उसके साथ जुड़ी वारंटी और गारंटी स्वत: समाप्त मान ली जाएगी। हालांकि, उपभोक्ता कानून के तहत यह उचित नहीं है। निर्माताओं ने सोची समझी साजिश के तहत मरम्मत से जुड़ी अनौपचारिक उद्यमिता को हतोत्साहित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।

पूरी दुनिया में गत कुछ वर्षों से मरम्मत के अधिकार को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है और उसके तहत यूरोपियन यूनियन, ऑस्ट्रेलिया, अमरीका समेत कई राष्ट्रों ने व्यापक अथवा कुछ सीमित कानून भी बनाए हैं। भारत में भी वर्ष 2022 में उपभोक्ता मंत्रालय के तहत राइट टू रिपेयर पोर्टल बनाकर कृषि, ऑटोमोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत के लिए 65 से अधिक निर्माता कंपनियों से मरम्मत को सुलभ बनाने के लिए घोषणा करवाई है। इसके अतिरिक्त 112 अन्य बड़ी कंपनियों से इस बाबत संवाद चल रहा है। पोर्टल की लोकप्रियता और धरातल पर हकीकत कोसों दूर है। आलम यह है कि कंपनी अथवा अधिकृत कार्यशाला के अतिरिक्त कहीं पर मरम्मत के बाद किसी भी प्रकार के कार्य पर अग्रिम सेवाओं के लिए पाबंदी लगा दी जाती है।

मरम्मत आम आदमी का अधिकार बने इस दिशा में सर्वप्रथम फ्रांस ने अपने 'एंटी वेस्ट एवं सर्कुलर इकोनॉमी कानून' के तहत समस्त उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक व इलेक्ट्रिकल वस्तुओं के निर्माताओं को उत्पादन के साथ 'रिपेयरबिलिटी इंडेक्स' को प्रदर्शित करने एवं क्रेता को उस बाबत संपूर्ण जानकारी देने की वैधानिक बाध्यता लागू की है। शून्य से दस तक अंक वाली इस रिपेयरबिलिटी इंडेक्स के माध्यम से मरम्मत की सहजता एवं उपलब्धता के अनुसार अंक प्रदर्शित करना जरूरी है। परिणामस्वरूप उपभोक्ता किसी भी वस्तु के खरीदने से पहले विवेकपूर्ण निर्णय ले पाता है।

हाल ही यूरोपियन यूनियन ने अपने सदस्य देशों के लिए राइट टू रिपेयर दिशा निर्देश जारी किए हैं, जिसके जरिये प्रमुखता से यूरोपियन यूनियन में उत्पादित अथवा बेचे जाने वाले उत्पादों की मरम्मत को व्यापक बनाने के लिए निर्माताओं एवं विक्रेताओं को कानून के दायरे में लिया गया है। साथ ही, विशेषतौर पर समस्त निर्माताओं को हर उत्पाद को मरम्मत सम्मत डिजाइन के अनुसार परिवर्तित करने के लिए भी कहा गया है। मरम्मत पर एकाधिकार नहीं रहे और उत्पाद लंबी अवधि तक उपयोग में आ सके, इसके लिए कदम उठाने वाले निर्माताओं के लिए प्रोत्साहन का प्रावधान भी इन दिशा निर्देशों में है। वर्तमान युग में निरंतर बदलते उत्पादों के मॉडल्स के बीच यूरोपियन यूनियन ने 'नए की जगह मरम्मत' को बढ़ावा देने के लिए निर्माताओं से 'रिपेयर फस्र्ट' अभियान छेडऩे की भी हिदायत दी है।

इसी संदर्भ में मरम्मत किए गए उपकरण या मशीन की वारंटी को भी नियत अवधि से आगे तक बढ़ाना आवश्यक किया गया है। किसी भी खरीद से पहले यह गंभीरतापूर्वक सोचा जाना चाहिए कि इसके निर्माण में कितनी अमूल्य धातुओं जैसे लिथियम, कोबाल्ट, रेयर अर्थ मेटल्स के साथ अथाह ऊर्जा, मानव श्रम एवं कार्बन उत्सर्जन भी सम्मिलित होता है। छोटी-सी व्याधि के लिए अपने उपकरण को बदल देना ठीक उसी प्रकार है जैसे कि बिना आवश्यकता के शारीरिक अंगों को बदल देना। पूर्व में भारतवर्ष के लगभग हर शहर में मरम्मत के लिए निर्धारित स्थान हुआ करते थे। किंतु विदेशी कंपनियों के प्रादुर्भाव के चलते उनके उपकरण लॉक अवस्था में ही बेचे जाते हैं और मरम्मत के लिए निर्धारित स्थल पर भारी भरकम खर्च लिया जाता है। इस कारण ग्राहक की मानसिकता मरम्मत के लिए भारी खर्च देने की तुलना में नया खरीदने की हो जाती है। मरम्मत की सुविधाओं के अभाव में निरंतर ई-वेस्ट की बढ़ोतरी होती जा रही है। यह उचित समय है कि सरकार के स्तर पर प्रदूषण और आर्थिक बोझ को बढ़ावा देने वाले मरम्मत विरोधी निर्माण को हतोत्साहित करते हुए मरम्मत की अर्थव्यवस्था को वैधानिक कवच के साथ लागू किया जाना चाहिए। इससे अनेक रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। अंकुश तो उन उद्यमों पर भी लगना चाहिए, जो इंसान की मानसिकता से खेलते हुए निरंतर नए उत्पादों को जारी करते रहते हैं व पुराने मॉडल के लिए आवश्यक कलपुर्जों को बाजार से हटाते जाते हैं। इन्हीं सबकी परिणीति ई-वेस्ट की अभिवृद्धि है।

भारत 20-30 लाख टन प्रतिवर्ष के आंकड़े के साथ चीन व अमरीका के बाद सर्वाधिक ई-वेस्ट उत्पादनकर्ता देश है। ई-वेस्ट का कारक मुख्यत: विदेशी कंपनियां ही हैं, जो अपने उत्पाद सुरक्षा, साइबर सिक्योरिटी और इंटेलेक्चुुअल प्रॉपराइटरी की आड़ में बेचती हैं एवं लेशमात्र परिवर्तन कर उपभोक्ताओं को नए उत्पाद खरीदने को आकर्षित करती हैं। आमजन भी रिपेयर के स्थान पर नवीनता को प्राथमिकता दे देता है। यह मसला सिर्फ आर्थिक बोझ का न होकर प्रकृति के अनावश्यक दोहन का भी है। उचित होगा हम 'रिपेयर फस्र्ट' के साथ उत्तरदायी उपभोक्ता होने का दायित्व निभाएं।

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल, पर्यावरण विषयों के जानकार