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संपादकीय: आस्था का सम्मान और सांस लेने का अधिकार

यदि कोई परंपरा है भी, तो उसके स्वरूप और समय के साथ उसमें आए बदलाव पर समाज में संवाद हो सकता है। लेकिन आस्था को जनस्वास्थ्य के सामने ढाल बनाना उचित नहीं है।
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भारत

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Anil Karma

•

Oct 14, 2026

crackers

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण और पटाखों पर सुनवाई के दौरान ऐसा सवाल उठाया है, जो इस पूरे विवाद को सही दिशा दे सकता है। सवाल यह है कि पटाखों को धार्मिक परंपराओं से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है? यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पटाखों पर बहस जब पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से हटकर धर्म के दायरे में चली जाती है, तो असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। अक्सर बहस इस बात पर उलझ जाती है कि भारत-पाकिस्तान का मैच जीतने के बाद पटाखे छोडऩे पर सवाल कम उठते हैं, लेकिन दिवाली पर पटाखे छोड़े जाने पर बहस के लिए सब आगे आ जाते हैं। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है।

सवाल यह होना चाहिए कि उत्सव, शादी, पार्टी हो या कोई सार्वजनिक समारोह- कितने और किस तरह के पटाखे छोड़े जाने चाहिए? यदि प्रदूषण पटाखों से होता है तो उसका असर इस तथ्य से नहीं बदलता कि पटाखे किस खुशी में छोड़े जा रहे हैं। हवा के लिए दिवाली का पटाखा और किसी जीत के जश्न का पटाखा अलग नहीं होता। मूल प्रश्न यह है कि हमारी हवा कितने प्रदूषण का बोझ उठा सकती है? पटाखों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व हवा की गुणवत्ता को कितना प्रभावित करते हैं, इसका असर बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर कितना पड़ता है और पर्यावरण पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या है- नीति और नियमन का आधार यही तथ्य होने चाहिए। बहस का केंद्र यह भी नहीं होना चाहिए कि पटाखे किसी धार्मिक परंपरा का हिस्सा हैं या नहीं। यदि कोई परंपरा है भी, तो उसके स्वरूप और समय के साथ उसमें आए बदलाव पर समाज में संवाद हो सकता है। लेकिन आस्था को जनस्वास्थ्य के सामने ढाल बनाना उचित नहीं है। दूसरी तरफ, जनस्वास्थ्य की चिंता को आस्था के विरोध के रूप में पेश करना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दोनों को आमने-सामने खड़ा करने से समाधान नहीं निकलेगा। अदालत का यह संकेत महत्वपूर्ण है कि न तो हर तरह के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक समाधान है और न ही पूरी तरह खुली छूट। रास्ता बीच का है। ऐसा वैज्ञानिक और प्रभावी नियमन, जो प्रदूषण के स्तर, समय, स्थान और पटाखों की प्रकृति को ध्यान में रखे। यह नियमन हर तरह के उत्सव और जश्न पर समान रूप से लागू होना चाहिए। इसके साथ नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।सवाल यह है कि जश्न मनाने का ऐसा तरीका क्या हो सकता है, जिसमें किसी दूसरे की सांस न घुटे। आस्था का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन साफ हवा में सांस लेने का अधिकार भी उतना ही बुनियादी है। सुप्रीम कोर्ट ने बहस को धर्म की पिच से हटाकर जनस्वास्थ्य और पर्यावरण की जमीन पर लाने की कोशिश की है। अब समाज और सरकार, दोनों को इसी जमीन पर समाधान तलाशना चाहिए।