झालावाड़ जिले के एक सरकारी स्कूल की छत गिरी, बच्चे उसके नीचे दब गए, सात मासूम जानें चली गईं। वह एक हादसा था, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ सरकार, शिक्षा विभाग और पूरी व्यवस्था का इम्तिहान जिसमें सिस्टम बुरी तरह फेल हो गया।
बात 25 जुलाई, 2025 की है। झालावाड़ जिले के एक सरकारी स्कूल की छत गिरी, बच्चे उसके नीचे दब गए, सात मासूम जानें चली गईं। वह एक हादसा था, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ सरकार, शिक्षा विभाग और पूरी व्यवस्था का इम्तिहान जिसमें सिस्टम बुरी तरह फेल हो गया। छह महीने गुजर गए। हाईकोर्ट ने बार बार निर्देश दिए, सख्त टिप्पणियां कीं, चेताया भी, मगर जमीन पर हालात जस के तस रहे। अगर व्यवस्था सचमुच जागी होती, तो 12 जनवरी को बूंदी जिले के एक स्कूल का बरामदा नहीं गिरता। गनीमत रही कि इस बार मौत नहीं हुई, लेकिन यह चेतावनी है… अगली बार किस्मत शायद इतनी मेहरबान न हो।
इन महीनों में सरकारी स्कूलों की तस्वीरें सिर्फ छपी नहीं, चीखती रहीं। टपकती छतें, झूलती दीवारें, टूटे फर्श, बिना पानी और शौचालय के स्कूल। शिक्षक पत्र लिखते रहे, प्रधानाचार्य गुहार लगाते रहे, अखबार लगातार चेताते रहे, लेकिन शिक्षा विभाग या तो आंख मूंदे बैठा रहा या फिर हर सवाल को एक और सरकारी फाइल में बदलता रहा। आज हालात यह हैं कि स्कूल पढ़ाई के नहीं, हादसे के स्थायी ठिकाने बनते जा रहे हैं।
सोमवार को हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी इसी सड़ी हुई व्यवस्था की पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। अदालत को कहना पड़ा कि अफसरों को शर्म आनीचाहिए। लेकिन जिस तंत्र में बच्चों की मौत भी कार्रवाई की वजह नहीं बनती, वहां लगता है कि शर्म भी अब अनुमोदन और प्रक्रिया का इंतजार कर रही है।
इस सामूहिक विफलता के बीच शिक्षा मंत्री बयान देने में पीछे नहीं रहे। फैसले अचानक होते रहे, तुगलकी फरमान जारी होते रहे। कभी स्कूल मर्जर, कभी नए प्रयोग, लेकिन बुनियादी सवालों पर रहस्यमयी चुप्पी छाई रही। स्कूल की इमारत सुरक्षित है या नहीं? निरीक्षण कब हुआ? जिम्मेदार कौन है? अदालत जब जवाब मांगती है, तो बजट, प्रक्रिया और भविष्य की योजनाओं की आड़ लेकर वर्तमान की जिम्मेदारी टाल दी जाती है।
अब दिखावटी जांच और कागजी खानापूर्ति नहीं चलनी चाहिए। सरकार को शिक्षा विभाग के लिए कम से कम दो समर्पित, जवाबदेह अधिकारियों की स्थायी टीम बनानी होगी, जो हर जिले के हर स्कूल की स्थिति की सीधी निगरानी करे। सुधार की समयबद्ध योजना बनाए और जिम्मेदारी तय करे। सरकार को अदालत और जनता के सामने साफ बताना होगा कि किस जिले में, किस स्कूल में और किस तारीख तक हालात सुधरेंगे। क्योंकि यह अब महज लापरवाही नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है और इसकी कीमत वे बच्चे चुका रहे हैं, जिनका कसूर सिर्फ इतना है कि वे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं।
veejay.chaudhary@in.patrika.com
twitter/veejaypress