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संक्रमण जटिल हो गए है, है, रोग बदल गए हैं, कैंसर अब रोजमर्रा की खबर है। लेकिन सरकारी अस्पताल अब भी पुराने जमाने की खांसी में ही अटके हुए हैं। यह स्थिति बताती है कि स्वास्थ सेवाएं सांठगांठ के संक्रमण से ग्रस्त हैं। राजस्थान की सरकारी दवा सूची बूढ़ी हो चुकी है।
जो दवा चाहिए, वह सूची में नहीं है। जो सूची में है, वह काम की नहीं है। डॉक्टर जानते हैं, पर लिख नहीं सकते। नियम आड़े आते हैं और मरीज बीच में पिसता है। अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोर क्यों फलते-फूलते हैं? क्योंकि अंदर व्यवस्था कुंद हो चुकी है। हजार करोड़ का निजी दवा कारोबार किसी व्यापार कौशल का परिणाम नहीं है, यह बीमार कर दी गई सरकारी दवा नीति का रिपोर्ट कार्ड है।
दवा खरीद की कहानी भी किसी असाध्य रोग जैसी ही है। कभी जरूरत से ज्यादा खरीदी जाती है, कभी घटिया दवा आती है। कभी सप्लाई देर से होती है, कभी दवा एक्सपायर हो जाती है। गोदाम भरे रहते हैं, मरीज खाली हाथ लौटते है। दवा कंपनियां और मेडिकल कारोबारी भी मौज में है और हों भी क्यों न! सिस्टम उनके हिसाब से चल रहा है। टेंडर निकलते हैं, नाम बदलते है, दवाएं वही रहती है।
मंत्री दावा करते हैं कि बाहर की दवा लिखना मना है। अफसर फाइलों में आंकड़े सजाते हैं, लेकिन मरीज की थैली खाली ही रहती है। नीति की नींद गहरी है और अस्पताल की फार्मेसी खाली। यह वही बीमारी है जो सिर्फ दवा से नहीं, सर्जरी से ही ठीक होगी। नीति की सर्जरी। आयुष की हालत भी अलग नहीं। पांच हजार तरह की दवाएं मौजूद हैं, मगर तमाम रोगों का उपचार कुछ पर टिका है। यह इलाज नहीं, मजाक है… मजाक ।
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Updated on:
17 Jan 2026, 1:29 PM IST
Published on:
17 Jan 2026, 1:15 PM IST
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