
बढ़ती आबादी को लेकर आजकल खूब चिंता होती दिखती है। आबादी पर अंकुश लगाने के सरकारी स्तर पर प्रयास भी कम नहीं होते। छोटा परिवार रखने के लिए प्रलोभन भी दिए जाते हैं। श्रद्धेय कुलिश जी ने अपने आलेख में यह सवाल उठाया कि आखिर धनवान देश गरीब देशों की चिंता क्यों कर रहे हैं? सारी दुनिया के साठ प्रतिशत साधनों का भोग ये उन्नत देश कर रहे हैं। वे कभी नहीं चाहेेंगे कि उनकी भोग्य सामग्री या रहन-सहन में कोई कटौती हो।
अमरीका से कोई नारा चलता है तो हम 'स्याल सीटी' बजाना शुरू कर देते हैं। सियार की आदत है कि कहीं एक ने चीखना शुरू किया, तो एक-एक कर आस-पास के सियार भी चीखना शुरू कर देते हैं। अमरीका में एक नारा लगा कि दुनिया की आबादी बढ़ रही है अत: उस पर रोक लगाई जाए क्योंकि आबादी बढ़ते रहने के कारण गरीब मुल्कों को विकास योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। जितना भी माल पैदा होता है, उसे बढ़ती हुई आबादी चट कर जाती है। कितने पते की बात है और कितनी अच्छी बात है। आबादी नहीं बढऩी चाहिए।
खाने वाले ज्यादा होंगे और खाने को कम होगा तो भुखमरी, गरीबी बढ़ेगी। इस विचारधारा का हमारे यहां भी हर कोई नेता, बुद्धिजीवी, राज दरबारी, सब लोग आबादी कम करने की बात जोर-शोर से कर रहे हैं। सरकारी नीतियों में आबादी कम करने पर जोर दिया जाता है। कुछ सालों पहले जो कार्यक्रम परिवार नियोजन के नाम से चलाया जाता था आज परिवार कल्याण के नाम से चलाया जाता है क्योंकि आपातकाल में नसबंदी अभियान के कारण परिवार नियोजन कार्यक्रम बदनाम हो गया था। आबादी को कम करने के नाम पर जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं उनमें नसबन्दी, गर्भनिरोधक गोलियां, कण्डोम और न जाने क्या-क्या उपाय काम में लाए जाते हैं।
परिवार कल्याण कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए प्रलोभन दिए जाते हैं। आबादी बढऩे के नारे के कई पहलू हैं जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। आबादी की बढ़ोतरी ज्यादातर गरीब मुल्कों में हैं और उसकी चिंता अमीर मुल्कों को सता रही है। आबादी बढ़ोतरी के साथ जनशक्ति भी तो बढ़ रही है, तो हम यह नहीं सोचते कि एक मनुष्य अपने खाने लायक पैदा कर सकता है या नहीं। एक सवाल यह है कि दुनिया में जो समस्या है वह रोटी की है या शान-शौकत की है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या बढ़ती हुई आबादी को हम धरती का भार समझ लें और इस भार को हल्का करने के लिए भगवान विष्णु को अवतार धारण करने की गुहार करें।
गरीब देशों में आबादी का बढऩा अच्छा नहीं है यह सही बात है। प्रश्न यह है कि क्या संख्या ही देश का मापदण्ड है या मानव जीवन का निचोड़ है। आबादी यदि बढ़ती भी है तो उसे किस तरह से रोका जाए यह मुख्य प्रश्न है। हमारे देश में जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय क्या हों और जनसंख्या का उपयोग किस तरह से हो यह भी एक सवाल है। देश के संपूर्ण इतिहास में कभी संतान को नहीं कोसा गया। संतान होना सदैव मंगल का सूचक माना गया। सारे संस्कारों में, मांगलिक गीतों में संतान वृद्धि ïकामना होती है और इसका मान किया जाता है।
मनुष्य की मानसिक रचना को किस तरह से नया मोड़ दिया जाए यह भी बड़ा टेढ़ा काम है। यदि विशिष्ट देश के मनुष्य की मानसिकता को ध्यान में रखकर कोई राष्ट्रीय योजना बनाई जाए तो वह निश्चिय ही कारगर साबित नहीं होगी। अच्छा तो यह हो कि आबादी पर अंकुश लगाने के साथ हम पुरुषार्थ प्रकट करें और ऐसी फिजां पैदा करें कि देश की पूरी जनशक्ति उत्पादन में रत हो। उसे अवसर और सुविधाएं प्रदान की जाएं।
(कुलिश जी के आलेखों पर आधारित पुस्तक 'दृष्टिकोण' से )
आबादी नै रो रह्या, रह्या गरीबी कोस।
हुआ फिरंगी भी बिदा, अब कुँण नै द्याँ दोस।।
('सात सैंकड़ा' से)
एक बात मेरी समझ में बिल्कुल ही नहीं आई कि अमरीका में बिजली की तेज रोशनी के नीचे अंधेरा क्यों है? हर बड़े शहर में भिखमंगे मौजूद है। भारत में तो हम इसलिए परेशान हैं कि कहीं भिखमंगों की भीड़ से विदेशी मेहमान परेशान न हो जाएं। भिखमंगी का कारण भी देशव्यापी गरीबी कहा जा सकता है, लेकिन न्यूयार्क और वाशिंगटन के पास इसकी कोई सफाई नहीं हो सकती। मैंने बहुत सुना है कि बेरोजगार को घर बैठे वेतन दिया जाता है। मैंने बहुत सुना है कि बड़ी उम्र के लोगों के लिए अलग से मकान बने हुए हैं, जहां उन्हें सारी सुविधाएं मिलती हैं। मैंने बहुत सुना है कि अमरीका में अवसर की समानता है लेकिन यह भिखमंगी क्यों?
(कुलिश जी की पुस्तक 'अमरीका एक विहंगम दृष्टि' से )
जारी… कुलिश जी का सृजन संसार पढ़ें आगामी गुरुवार को भी
Published on:
12 Mar 2026 02:56 pm
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