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संपादकीयः मौसम की चेतावनी को समझना सबसे जरूरी

दुनियाभर में औद्योगिक विकास, बढ़ती ऊर्जा खपत, युद्ध और वनों की कटाई के कारण पृथ्वी की सतह गर्म होती जा रही है। चिंताजनक बात यह है कि तमाम प्रयासों के बाद इसमें वृद्धि जारी है, जिसका असर मौसम के चक्र पर साफ दिखाई देने लगा है।

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जयपुर

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ANUJ SHARMA

Mar 12, 2026

उत्तर भारत में मार्च का महीना आमतौर पर मौसम के सुखद बदलाव का समय माना जाता है। ठंड धीरे-धीरे विदा लेती है और गर्मी की आहट सुनाई देती है, लेकिन इस बार मार्च ने ही गर्मी के तेवर दिखा दिए हैं। देश के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक 2011 के बाद मार्च का महीना इतना गर्म कभी दर्ज नहीं किया गया। यह स्थिति एक असामान्य मौसम नहीं, बल्कि आने वाले समय की गंभीर चुनौती का संकेत है।

समय से पहले पड़ रही इस गर्मी का असर सबसे पहले खेतों में दिखाई देने लगता है। भारत की कृषि व्यवस्था मौसम पर निर्भर है और मार्च रबी की फसलों के लिए बेहद अहम होता है। इस समय तापमान अचानक बढ़ जाता है और धरती की नमी कम हो जाती है तो सरसों, चना, गेहूं, मूंगफली, तिल और ज्वार जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। खासतौर पर गेहूं की फसल को पकने के अंतिम चरण में अत्यधिक गर्मी नुकसान पहुंचा सकती है। इससे न केवल किसानों की मेहनत पर असर पड़ता है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है। मौसम का बदला हुआ मिजाज किसी एक वर्ष की घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि मौसम का पारंपरिक स्वरूप बदल रहा है। कभी कड़ाके की ठंड कम हो जाती है, कभी गर्मी असामान्य रूप से लंबी हो जाती है और कभी अत्यधिक बारिश हो जाती है।

यह सब जलवायु परिवर्तन के बड़े संकट की ओर इशारा करता है। दुनियाभर में औद्योगिक विकास, बढ़ती ऊर्जा खपत, युद्ध और वनों की कटाई के कारण पृथ्वी की सतह गर्म होती जा रही है। चिंताजनक बात यह है कि तमाम प्रयासों के बाद इसमें वृद्धि जारी है, जिसका असर मौसम के चक्र पर साफ दिखाई देने लगा है। हमारे देश के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है क्योंकि यहां बड़ी आबादी खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। अनियोजित शहरीकरण, कंक्रीट के फैलते शहर और हरित क्षेत्रों की कमी ने स्थानीय जलवायु को भी प्रभावित किया है। शहरों में 'हीट आइलैंड' प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, इससे हालात गंभीर होते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक मंचों पर लगातार चर्चा होती है, समझौते होते हैं और लक्ष्य तय किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में कार्बन उत्सर्जन की गति धीमी नहीं हो रही।

ऐसे में जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन को केवल वैज्ञानिक बहस का विषय न माना जाए, बल्कि इसे जीवन और विकास की प्राथमिक चुनौती के रूप में स्वीकार किया जाए। मार्च की यह असामान्य गर्मी प्रकृति का एक स्पष्ट संकेत है। यह बता रही है कि हमने समय रहते अपने विकास के तरीके और जीवनशैली में बदलाव नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में मौसम की यह अस्थिरता और अधिक गंभीर रूप ले सकती है। इसलिए इस चेतावनी को समझना और उस पर कार्रवाई करना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।