12 मार्च 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मुफ्त योजनाओं की राजनीति: बढ़ता कर्ज बोझ और कुर्बान होते जंगल

चुनावों के ठीक पहले घोषित नकद सहायता योजनाएं शासन और चुनावी प्रलोभन के बीच की रेखा को धुंधला कर देती हैं। हाल में उच्चतम न्यायालय ने भी तीखा सवाल पूछा कि ऐसी योजनाएं चुनावों से ठीक पहले ही क्यों घोषित की जाती हैं? क्या बिना पात्र-अपात्र के भेदभाव के सबको लाभ बांटना 'तुष्टीकरण की नीति' नहीं है?

3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Mar 12, 2026

अजीत रानाडे - वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस),

लोकतांत्रिक जीवन में कभी-कभी कोई एक खबर पूरे राजनीतिक और आर्थिक तंत्र की दिशा और दुविधा को उजागर कर देती है। पिछले दिनों महाराष्ट्र के वन मंत्री का एक बयान चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि राज्य की 'लाड़की बहन' जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बढ़ते वित्तीय बोझ और कर्ज को चुकाने के लिए 12,000 करोड़ रुपए के सागौन के जंगल कटवाए जा सकते हैं। अकेले इस योजना का अनुमानित सालाना खर्च 36,000 से 46,000 करोड़ रुपए के बीच है, जो राज्य के पिछले बजट के कुल खर्च का पांच प्रतिशत से भी अधिक है।

जरा रुककर सोचें। जंगल कोई फालतू पड़ा सामान नहीं हैं, जिन्हें जब चाहा बेच दिया जाए। वे आने वाली पीढिय़ों की पारिस्थितिक धरोहर हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में वे कार्बन शोषक हैं, जल चक्र को संतुलित रखते हैं और जैव विविधता के रक्षक हैं। इन्हें काटना केवल एक बजटीय निर्णय नहीं, बल्कि भविष्य की संपदा की बलि चढ़ाना है। यदि इस वर्ष की रेवडिय़ों के लिए आज पेड़ काटे जा रहे हैं, तो अगले साल किसकी बारी होगी? भले ही इन पेड़ों को विभागीय संपत्ति बताकर बेचा जाए, लेकिन कड़वा सच यही है कि राज्य सरकार स्थायी पर्यावरणीय पूंजी को बेचकर तात्कालिक खर्च पूरे करने की राह पर है। पूरे भारत में तेज रफ्तार लोकलुभावन राजनीति का यह कोई अकेला मामला नहीं है। तकनीक ने इसे और आसान बना दिया है।

जनधन खातों, आधार और मोबाइल की जैम त्रयी ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर को बेहद सुगम बना दिया है। पचास करोड़ से अधिक बैंक खातों और आधार की मदद से सरकारें अब वस्तुएं बांटने के बजाय सीधे नकदी ट्रांसफर कर रही हैं। यह बदलाव राजनीतिक रूप से बहुत गहरा है। चुनावों के ठीक पहले घोषित नकद सहायता योजनाएं शासन और चुनावी प्रलोभन के बीच की रेखा को धुंधला कर देती हैं। हाल में उच्चतम न्यायालय ने भी तीखा सवाल पूछा कि ऐसी योजनाएं चुनावों से ठीक पहले ही क्यों घोषित की जाती हैं? क्या बिना पात्र-अपात्र के भेदभाव के सबको लाभ बांटना 'तुष्टीकरण की नीति' नहीं है? असली मुद्दा यह नहीं है कि जन-कल्याण पर खर्च जायज है या नहीं। खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अधिकार संवैधानिक प्रतिबद्धताएं हैं। गरीबों के लिए लक्षित सहायता नैतिक और आर्थिक दोनों रूप से सही है।

असली समस्या कहीं और है। समस्या उस फिसलन की है, जो धीरे-धीरे 'नागरिक' को 'लाभार्थी' में बदल रही है। भाषा भी बदल गई है- अधिकार संपन्न नागरिक अब सरकारी उदारता के प्राप्तकर्ता बन गए हैं। पर यह याद रखें कि ये संसाधन उसी जनता के टैक्स से आते हैं या फिर उस कर्ज से जिसे उनके बच्चे चुकाएंगे। इन मुफ्त योजनाओं में भुगतान की राशि लगातार बढ़ रही है। जो मदद कभी मात्र जरूरतमंदों के लिए थी, वह अब सबके लिए अधिकार बनती जा रही है। 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल बेसिक इनकम का विचार दिया गया था, ताकि सब्सिडियों को सुव्यवस्थित किया जा सके। इसके विपरीत आज हम चुनाव-केंद्रित और बिखरी हुई नकदी योजनाओं की ओर बढ़ रहे हैं। परिणामस्वरूप राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है और पूंजीगत निवेश घटाना पड़ रहा है। सार्वजनिक वित्त का नियम यह है कि कर्ज निवेश के लिए लिया जाना चाहिए, न कि रोजमर्रा के उपभोग के लिए।

इस पतन की दौड़ को रोकने के लिए राजनीतिक साहस और संस्थागत सुधार दोनों जरूरी हैं। पहला, हर चुनावी घोषणा पत्र के साथ उसके खर्च और फंड के स्रोत (टैक्स या कर्ज) का विवरण देना अनिवार्य हो। दूसरा, सार्वजनिक वित्त के 'स्वर्णिम नियम' को अपनाकर कानून बनाया जाए कि कर्ज केवल पूंजीगत व्यय के लिए लिया जाएगा, न कि मुफ्त उपहारों के लिए। तीसरा, एक स्वतंत्र निकाय चुनावों से पहले इन वादों के वित्तीय प्रभाव का आकलन सार्वजनिक करे। चौथा, अधिकार आधारित कल्याण योजनाओं (भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा) और चुनावी प्रलोभनों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जाए। मतदाताओं को नागरिक के रूप में अपनी भूमिका फिर से पहचाननी होगी। चरमराता बुनियादी ढांचा, प्रदूषित नदियां, बदहाल स्कूल और अब कटते जंगल, ये सब मुफ्त की राजनीति के ही दुष्परिणाम हैं। कल्याण अनिवार्य है, लेकिन तुष्टीकरण विनाशकारी। अगर हमने आज यह सीमा रेखा नहीं खींची, तो अगले साल के खर्च के लिए एक और जंगल काटना पड़ेगा।