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कुलिश जन्मशती पर्व : काश! कुलिश जी की लिखी यह बात आज गलत साबित हो जाती!

कुलिश जी ने लिखा था कि राजनीति में नीति-अनीति एकदम गौण हो जाती है। आज भी स्थिति वही है।राजनीति में शुचिता की बातें तो आज भी होती हैं, लेकिन अमल न के बराबर है।

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Karpoor Chand Kulish on Nashabandi

राजस्थान में पूर्ण नशाबंदी को लेकर भैरों सिंह शेखावत सरकार में हुई राजनीति पर कुलिश जी ने जो लिखा था, आज की राजनीति भी उस सच से मुक्त नहीं हो पाई है।

राजनीति साफ-सुथरी हो, सैद्धांतिक रूप से इस पर सभी दल सहमत होते हैं। लेकिन, व्यवहार में इस ‘नारे’ से अक्सर लंबी दूरी बना कर रखते हैं। व्यवहार में यही दिखता है कि ‘नीति-अनीति’ गौण हो जाती है और ‘राज’ हवी हो जाता है। नीति-अनीति का विचार करके राजनीति की जाए तो इसमें काफी हद तक शुचिता लाई जा सकती है।

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश इसी विचार के समर्थक थे और उन्होंने अपनी कलम के जरिये इस विचार को प्रमुखता से दुनिया के सामने रखा। यह विचार आज भी उतना ही मौजूं बना हुआ है।

1979 में जब राजस्थान की सरकार में मद्य-निषेध की नीति को लेकर राजनीति तेज हो गई थी, तब भी उन्होंने इस पर राजनीति करने वालों को आड़े हाथों लिया था।

राजस्थान में पूर्ण नशाबंदी को लेकर तब की भैरोंसिंह शेखावत सरकार दो धड़ों में बंट गई थी। वित्त मंत्री मास्टर आदित्येंद्र 1 अप्रैल, 1979 से राज्य में पूर्ण नशाबंदी लागू करना चाहते थे, जबकि मुख्यमंत्री का कहना था कि जनता पार्टी की राष्ट्रीय नीति के अनुसार वह भी चार साल में पूर्ण नशाबंदी लागू कर देंगे।

कुलिश जी ने साफ लिखा, ‘वह केवल राजनीति ही है, जिसके कारण राजस्थान में नशाबंदी को जीने-मरने का सवाल बना लिया गया है। राजनीति इसी का नाम है जिसमें नीति-अनीति एकदम गौण हो जाती है और दूरगामी प्रश्नों को तात्कालिक मंसूबों के आगे गौण समझ लिया जाता है।' अफसोस है कि उनकी लिखी यह बात आज भी उतनी ही सच है। राजनीति में नीति का स्थान आज भी गौण ही बना हुआ

राजनीति में शुचिता का एक आधार यह भी है कि अगर कोई उसे आईना दिखाए तो दिखाने वाले पर टूट न पड़ा जाए। 1975 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का अवैध घोषित किया और उन पर छह साल के लिए चुनाव लड़ने की पाबंदी लगाई तो कांग्रेसियों का व्यवहार कुछ ऐसा ही था। इस पर 16 जून, 1975 को कुलिश जी लिखा, ‘वातावरण कुछ ऐसा बनाया जा रहा है जैसे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्याय का दरवाजा बंद कर दिया हो या श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व को मुद्दा बनाया हो। प्रधानमंत्री के सामने आज जो मुद्दा है, वह कानूनी है और उसका समाधान भी कानूनी है। जब तक देश में कानून का शासन कायम है, हमें उस मार्ग का अनुसरण करना ही होगा।’ उन्होंने दो टूक राय दी, ‘उचित यही है कि कानून के दायरे में लड़ाई जारी रखी जाय और उसके परिणामों का सम्मान किया जाय।'

कुलिश जी राजनीति में बढ़ती विसंगतियों से काफी चिंतित थे और चुनाव को इससे निपटने का सशक्त अवसर मानते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में पहले चरण के मतदान के दिन उन्होंने लिखा था, ‘देश के सामने आज जो सर्वाधिक महत्व का प्रश्न है, लोकतंत्रीय व्यवस्था को निखारना। पिछले एक दशक से हमारी शासकीय व्यवस्था में जो विकृति बढ़ती देखी जा रही है, वह यह कि शासन अपने दैनिक कार्यकलाप में आम सहमति के बजाय पुलिस और फौज पर अधिकाधिक निर्भर करता आ रहा है और देश की राजनीतिक जीवन में सभी प्रकार के अपराधियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। परिपाटियां और संस्थाएं छिन्न-भिन्न होती जा रही हैं। असहमति को सहन नहीं किया जा रहा है, बल्कि असहमति को पशुबल, प्रलोभन या छल-छद्म से दबाया जा रहा है। व्यक्ति पूजा का भाव बढ़ रहा है। मतदाता के सामने आज उपयुक्त अवसर है कि वह इन पहलुओं पर विचार करें।’

अफसोस यह कि इतने साल बाद आज भी इन पहलुओं पर विचार करने की जरूरत खत्म नहीं हुई है।

(यह आलेख श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)

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