
Warrant issued for attachment of Rs 67 crore against Katni Municipal Corporation
कटनी. रेलवे स्टेशन चौराहा समीप स्थित राजीव गांधी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अब नगर निगम कटनी के लिए गंभीर संकट बनकर सामने आया है। इस परियोजना से जुड़े विवाद में मध्यस्थ (आर्बिट्रेशन) ट्रिब्यूनल द्वारा वर्ष 2012 में ठेकेदार मेसर्स खुशीराम एंड कंपनी के पक्ष में 22.60 करोड़ रुपए का अवार्ड दिया गया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए नगर निगम ने जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय और अंतत: सुप्रीम कोर्ट तक अपील की, लेकिन हर स्तर पर निगम को हार का सामना करना पड़ा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी नगर निगम की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी, जिससे आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार रहा। इस मामले में जबलपुर कॉमर्शियल कोर्ट से कुर्की वारंट जारी हो चुकी है, जिसकी तामीली कराने बुधवार को टीम पहुंची, जिससे हडक़ंप मचा रहा। पूरे प्रकरण ने नगर निगम के पूर्व व कुछ वर्तमान अफसरों की गंभीर लापरवाही को उजागर कर दिया है, क्योंकि वर्षों से चल रहे इस मामले में समय रहते प्रभावी पैरवी और प्रशासनिक निर्णय नहीं लिए गए, जिसके कारण अब नगर निगम पर भारी आर्थिक बोझ और कुर्की की स्थिति बन गई है।
इस प्रकरण में बुधवार को जबलपुर कॉमर्शियल न्यायालय से जारी कुर्की वारंट के निष्पादन की प्रक्रिया शुरू हुई। कटनी और जबलपुर न्यायालय की संयुक्त टीम नगर निगम कार्यालय पहुंची और लगभग 22 करोड़ 60 लाख रुपए की मूल अवार्ड राशि के साथ ब्याज मिलाकर लगभग 67 करोड़ रुपए के कुर्की वारंट की तामील कराई। इस दौरान डिक्रीदार मेसर्स खुशीराम एंड कंपनी के पावर ऑफ अटॉर्नी किशोर वाधवानी भी मौजूद रहे। न्यायालय की टीम ने आयुक्त कार्यालय में अधिकारियों की उपस्थिति में वारंट सौंपते हुए नोटिस तामील कराया और स्पष्ट किया कि शीघ्र भुगतान नहीं होने पर आगे की प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। 2012 में एवार्ड हुआ था, इसके बाद भी राशि का भुगतान नहीं किया गया, कार्रवाई लेट होने के कारण ननि को मुंहकी खानी पड़ी।
इस मामले को लेकर नगर निगम के वरिष्ठ पार्षद मिथलेश जैन ने 15 अक्टूबर 2024 को मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को विस्तृत शिकायत भेजी थी, जिस पर राज्य शासन ने गंभीरता से संज्ञान लेते हुए नगरीय प्रशासन विभाग को उच्च स्तरीय जांच कराने के निर्देश दिए थे। शिकायत में कहा गया था कि नगर निगम ने प्रमोटर स्कीम के तहत रेलवे स्टेशन के बाहर पुराने रेस्ट हाउस की भूमि पीडब्ल्यूडी से लेकर वाणिज्यिक केंद्र विकसित करने का निर्णय लिया था। आरोप रहा कि तत्कालीन अधिकारियों ने नियमों को दरकिनार करते हुए जल्दबाजी में योजना लागू की और ठेकेदार खुशीराम एंड कंपनी के साथ मनमाने तरीके से अनुबंध कर लिया। बताया गया कि वर्ष 2000 में इस परियोजना का टेंडर हुआ, 2001 में ठेकेदार को कार्य दिया गया और वर्ष 2005 से विवाद शुरू हो गया। विवाद की मुख्य वजह यह बताई गई कि ठेकेदार को अनुबंध के अनुसार करीब 10 हजार वर्गफीट जमीन कम दी गई। बाद में वैकल्पिक जमीन देने की फाइल चली और मामला परिषद तक भी पहुंचा, लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई। इसी विवाद ने आगे चलकर कानूनी रूप ले लिया और मामला आर्बिट्रेशन तक पहुंच गया। एक माह पहले पार्षद व अधिवक्ता मिथलेश जैन ने नगर निगम को जिला न्यायालय से राहत दिलाई, लेकिन ऊपर के न्यायालयों में अपनी बात रखने के लिए दी गई सलाह को नहीं मनाया गया, जिससे यह नौबत आ गई।
जानकारी के अनुसार नगर निगम ने फैसले के बाद पुनर्विचार के लिए रिव्यू पिटीशन भी दायर की थी, लेकिन उस पर क्या स्थिति है, इसकी स्पष्ट जानकारी तक अधिकारियों के पास नहीं है। इस पूरे मामले में निगम की प्रशासनिक लापरवाही और कमजोर कानूनी पैरवी को मुख्य कारण माना जा रहा है। अब अदालत के आदेश के बाद ठेकेदार को भुगतान सुनिश्चित करने के लिए नगर निगम की संपत्तियों की कुर्की की प्रक्रिया शुरू करने की स्थिति बन गई है। इससे नगर निगम की वित्तीय स्थिति पर बड़ा संकट मंडराने लगा है। न्यायालय से आए पत्र के बाद नगर निगम के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों में भी हडक़ंप की स्थिति बन गई है।
पूरे प्रकरण में नगर निगम के तत्कालीन अधिकारियों और अधिवक्ताओं पर गंभीर लापरवाही, मिलीभगत के आरोप लगे हैं। विधिक पैरवी के नाम पर बिलों का जमकर खेल हुआ है। 90 लाख रुपए से अधिक फूंके गए, लेकिन राहत कुछ नहीं मिली। आरोप है कि निगम के अधिकारियों ने अदालतों में प्रभावी पैरवी नहीं कराई, जिसके कारण निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक नगर निगम को लगातार हार का सामना करना पड़ा।
परियोजना के निर्माण में भी कई अनियमितताओं और वित्तीय गड़बडिय़ों के आरोप सामने आए। नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से विकास अनुज्ञा नहीं ली गई। ठेकेदार को समय पर ड्रॉइंग और डिजाइन उपलब्ध नहीं कराई गई, अनुबंध की शर्तें भी स्पष्ट नहीं थीं। इतना ही नहीं, ठेकेदार द्वारा निर्धारित समय में प्रीमियम राशि जमा नहीं करने के बावजूद नगर निगम ने कोई वसूली कार्रवाई नहीं की। बाद में दुकानों के निर्माण के बाद ठेकेदार ने बिना अनुमति दुकानों को बेच दिया और किराए पर दे दिया, जिससे नगर निगम को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। स्थानीय लेखा परीक्षा अधिकारियों ने भी इस परियोजना में अवैध भुगतान और वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया था।
सप्तम जिला न्यायाधीश की अदालत ने लगभग पांच माह पहले नगर निगम आयुक्त से प्रकरण क्रमांक ईएक्स एबी 29/2019 के तहत निष्पादन कार्यवाही के संबंध में जानकारी मांगी थी। अदालत ने निर्देश दिया था कि नगर निगम अपनी चल-अचल संपत्तियों, बैंक खातों में जमा राशि और आय के स्रोतों का पूरा विवरण शपथ पत्र के साथ प्रस्तुत करे तथा यह स्पष्ट करे कि कौन-सी संपत्तियां लोकोपयोगी हैं और किन्हें कुर्क किया जा सकता है। साथ ही यह भी बताने को कहा गया कि कौन-सी संपत्तियां किस नियम या आदेश के तहत कुर्की से मुक्त हैं। इसका मुद्दा परिषद में भी उठा था, लेकिन अधिकारी सिर्फ गोलमोल ही जवाब देते रहे।
मेसर्स खुशीराम राम एंड संस प्रकरण में जो कुर्की वारंट जारी हुआ है उस संबंध में नियमानुसार कार्रवाई चल रही है। न्यायालय में हमारा केस लगा हुआ है, प्रकरण के निराकरण के लिए आवश्यक पहल की जा रही है।
Updated on:
12 Mar 2026 09:07 am
Published on:
12 Mar 2026 09:07 am
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