
फोटो: पत्रिका
Jaipur Literature Festival 2026: गुलाबी नगरी की ठंडी हवाओं में विचारों और शब्दों की गर्माहट लेकर आया जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का पहला दिन। सुबह से शाम तक अलग अलग मंचों पर साहित्य, समाज, इतिहास, कला और पत्रकारिता की परतें खुलती रहीं और हर सत्र ने दर्शकों को एक नई दृष्टि दी। 'ईरान टू इंडिया' सत्र में इतिहासकार अलका पटेल और लेखक सैम डेलरिम्पल ने बारहवीं शताब्दी के सांस्कृतिक संवादों को उजागर किया।
उन्होंने बताया कि ईरान, अफगानिस्तान और भारत के बीच का रिश्ता एकतरफा नहीं था, बल्कि साझा विरासत का पुल था जिसने आगे चलकर मुगल साम्राज्य की नींव तैयार की। फ्रंट लॉन में जावेद अख्तर ने अपनी जिंदगी और विचारों के अनुभव साझा करते हुए कहा कि सेक्युलरिज्म कोई क्रैश कोर्स नहीं, बल्कि इंसान होने का तरीका है। मां और नानी से मिली परवरिश, धर्म से दूरी और भाषा की साझी विरासत पर उनकी बातें तल्ख भी थीं और शायराना भी।
'घोस्टली टेल्स' सत्र ने भूत कथाओं को डर से परे समाज और स्मृति का दस्तावेज बताया। अरुंधति नाथ ने बंगाल की भूत परंपराओं का उल्लेख किया, वहीं एरिक चोपड़ा ने दिल्ली की मालचा महल की रहस्यमयी कहानियों को सामने रखा। फ्रंट लॉन में ही आयोजित एक और महत्वपूर्ण सत्र में वरिष्ठ राजनयिक गोपालकृष्ण गांधी ने अपने प्रशासनिक जीवन के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि सिविल सेवा व्यक्ति को नैतिक मजबूती सिखाती है।
उन्होंने कहा कि 'प्लीज', 'थैंक यू' और 'सॉरी' जैसे सरल शब्द सबसे कठिन होते है, लेकिन यही शब्द व्यक्ति को भीतर से ठीक करते हैं। वर्तमान हालात पर उन्होंने चिंता जताई कि नफरत और बदले की भावना समाज को भीतर से खोखला कर रही है। दरबार हॉल में 'द जियोग्राफी ऑफ बिलॉगिंग' सत्र ने स्मृति, प्रवासन और रचनात्मकता के रिश्ते को उजागर किया। आंद्रेयास उंटरवेगर और सरनाथ बनर्जी ने बताया कि साहित्य केवल सूचना नहीं, बल्कि भावनाओं और अनुभवों का दस्तावेज है। वहीं, 'कलर्स ऑफ द डेजर्टी सत्र में तृप्ति पांडे ने राजस्थान की संस्कृति में रंगों के महत्व को सहज और प्रभावी ढंग से सामने रखा।
शाम के सत्रों ने दिन को और गहराई दी। 'गोबर धनः रूरल एस्थेटिक्स' में रेखा भटनागर और रीमा हुजा ने ग्रामीण सौदर्यबोध और लोक कला पर केंद्रित पुस्तक का विमोचन किया। तकनीकी अव्यवस्थाओं के बावजूद इस सत्र ने यह दिखाया कि गोबर और लोक डिजाइन केवल सजावट नहीं, बल्कि पर्यावरण और आस्था का प्रतिबिंब है। सूर्या महल में 'एवरी लास्ट गर्ल' सत्र में सफीना हुसैन ने अपनी किताब और आंदोलन के जरिए बताया कि शिक्षा से वंचित लड़कियों का भविष्य बदला जा सकता है, बशर्ते समाज अपनी सोच और नजरिया बदल ले।
फ्रंट लॉन पर अमन नाथ की कविता पुस्तक 'ओल्डर बोल्डर' का विमोचन हुआ, जहां जीनत अमान और संजॉय के रॉय की मौजूदगी ने गरिमा बढ़ाई। अमन नाथ ने कविता को अपने भीतर का रोशन करने वाला निजी संवाद बताया। उनकी कविताएं खतों की तरह है, जिन्हें शायद कभी भेजा नहीं गया।
फ्रंट लॉन पर अमन नाथ की कविता पुस्तक 'ओल्डर बोल्डर' का विमोचन हुआ, जहां जीनत अमान और संजॉय के रॉय की मौजूदगी ने गरिमा बढ़ाई। अमन नाथ ने कविता को अपने भीतर का रोशन करने वाला निजी संवाद बताया। उनकी कविताएं खतों की तरह हैं, जिन्हें शायद कभी भेजा नहीं गया।
दिन का समापन पत्रकारिता पर केंद्रित सत्र 'हेडलाइंस दैट शेप्ड ए नेशन' से हुआ। ज्योत्सना मोहन, हरिंदर बावेजा और भावना सोमाया ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि पहले हेडलाइंस हालात को बयान करती थीं, अब हेडलाइंस के हालात ही खराब हो गए है। पहले दिन की इन चर्चाओं ने यह साबित किया कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल केवल साहित्य का उत्सव नहीं, बल्कि विचारों, संस्कृति और समाज का संगम है।
मंच पर कभी कविता खतों की तरह पढ़ी गई, कभी लोक कला और रंगों की परंपरा को जीवित किया गया, कभी शिक्षा और समानता की पुकार उठी, तो कभी पत्रकारिता और राजनीति की सच्चाई का आईना दिखाया गया। यह दिन इस बात का दस्तावेज बन गया कि साहित्य और संवाद आज भी हमारे समय की सबसे बड़ी रोशनी हैं।
Updated on:
17 Jan 2026 12:38 pm
Published on:
16 Jan 2026 12:33 pm
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