
शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ही भारतीय जनजीवन में रामकथा का स्वर गूंजने लगता है। रामलीला भारतीय समाज में केवल रंगमंच की विधा नहीं बल्कि लोकजीवन, आस्था और नैतिक चेतना की ऐसी जीवंत परंपरा है, जो सदियों से पीढिय़ों को जोड़ती आई है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में राम केवल एक धार्मिक पात्र नहीं हैं, वे पुत्रधर्म, भ्रातृप्रेम, दांपत्य निष्ठा, मित्रता, त्याग, करुणा, कर्तव्य और आदर्श शासन के प्रतीक हैं। रामलीला इन्हीं मानवीय मूल्यों को मंच पर साकार करती है।इसकी वास्तविक शक्ति उसके भव्य मंच या तकनीकी चमत्कार में नहीं, बल्कि उन जीवन-मूल्यों में है, जिन्हें वह दर्शकों के भीतर रोपती है। रामलीला की उत्पत्ति के संबंध में निश्चित ऐतिहासिक तिथि निर्धारित करना कठिन है। इसके विकास से जुड़ी विभिन्न लोकमान्यताएं व परंपराएं प्रचलित हैं।
सामान्यत: उत्तर भारत में इसके संगठित स्वरूप के विकास को मध्यकाल से जोड़ा जाता है। रामचरितमानस ने इसके विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तुलसीदास ने रामकथा को लोकभाषा में जिस आत्मीयता के साथ प्रस्तुत किया, उसने उसे जन-जन की कथा बना दिया। उनके अनुयायियों द्वारा रामकथा के मंचन की परंपरा आगे बढ़ी और धीरे-धीरे रामलीला भारतीय लोकनाट्य की विशिष्ट पहचान बन गई।रामलीला की विविधता भी भारतीय संस्कृति की बहुरंगी प्रकृति का अद्भुत उदाहरण है। अयोध्या, वाराणसी का रामनगर, चित्रकूट, वृंदावन, अल्मोड़ा और देश के अनेक क्षेत्रों की रामलीलाओं में स्थानीय लोकपरंपराओं, संगीत, भाषा, वेशभूषा और अभिनय शैली का सुंदर समावेश दिखाई देता है। वाराणसी के रामनगर की रामलीला तो दुनिया की सबसे पुरानी, भव्य और प्रसिद्ध जीवित रामलीला तथा मुक्ताकाशीय नाट्य परंपराओं में से एक है, जो अपनी विशिष्ट परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां दर्शक केवल दर्शक नहीं रहते बल्कि कथा के साथ चलते हुए उसके सहभागी बन जाते हैं। यह आयोजन लगभग 31 दिनों तक चलता है और भाद्रपद शुक्ल अनंत चतुर्दशी से शुरू होकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के आसपास समाप्त होता है।
इसकी शुरुआत काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह के संरक्षण में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध या 19वीं शताब्दी के आरंभ में मानी जाती है, हालांकि कुछ स्रोत इसका आरंभ वर्ष 1783 बताते हैं। यह परंपरा आज भी रामचरितमानस के आधार पर जीवंत रूप में मंचित की जाती है। रामलीला की भौगोलिक सीमाएं भारत तक सीमित नहीं हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया और विश्व के अनेक हिस्सों में रामकथा ने स्थानीय संस्कृतियों के साथ संवाद स्थापित किया है। इंडोनेशिया, थाईलैंड, नेपाल, श्रीलंका, लाओस, फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम और अन्य देशों में रामायण की कथाएं अलग-अलग रूपों में जीवित हैं।
थाईलैंड में रामायण का लोकप्रिय रूप 'रामाकियन' कहलाता है। स्पष्ट है कि रामकथा किसी एक भूगोल की बंद विरासत नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की ऐसी सृजनात्मक धारा है, जिसने विभिन्न सभ्यताओं को प्रभावित किया है। रामलीला की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में उसकी सामाजिक समावेशिता भी रही है। समय के साथ इसके मंचन में विभिन्न समुदायों के लोगों की सहभागिता बढ़ी है। कहीं कलाकारों के रूप में तो कहीं मंच निर्माण, संगीत, वेशभूषा, सज्जा और आयोजन में विभिन्न धर्मों के लोग सहयोग करते दिखाई देते हैं। हालांकि बदलते समय के साथ रामलीला के स्वरूप में बड़ा परिवर्तन आया है। एलईडी स्क्रीन, डिजिटल प्रकाश व्यवस्था, अत्याधुनिक ध्वनि तकनीक, वीडियो प्रोजेक्शन और विशेष प्रभावों ने मंचन को अधिक आकर्षक बनाया है। आज कई स्थानों पर रामलीला समितियों के बीच प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है, प्रायोजन और व्यावसायिकता ने भी कई आयोजनों की प्रकृति बदल दी है।आवश्यकता रामलीला को आधुनिक बनाने की नहीं, आधुनिकता के बीच उसकी आत्मा को सुरक्षित रखने की है। तकनीक आए लेकिन कथा पर हावी न हो, मनोरंजन हो लेकिन मर्यादा भंग न हो, भव्यता हो लेकिन भक्ति पीछे न छूटे। रामलीला भारतीय संस्कृति की केवल स्मृति नहीं, उसकी जीवित धड़कन है।
योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार