
हवाई यात्रा को दुनिया में यातायात का सबसे सुरक्षित साधन माना जाता रहा है। सरकार व विमानन कंपनियां यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बातें भी खूब करती हैं। पिछले दिनों ही अलग-अलग विमानन कंपनियों की उड़ानों में कहीं तकनीकी खराबी की वजह से इंजन फेल होने, विमान का एसी खराब होने व कहीं पायलट के ही नशे में होने व कहीं कू्र मेंबर की लापरवाही से उड़ानों में देरी जैसी घटनाएं बता रही हैं कि विमानन कंपनियां सुरक्षा मानकों के अनुरूप सतर्कता बरतने को लेकर गंभीर नहीं हैं। इंडिगो की कोलकाता-चेन्नई फ्लाइट में दो दिन पहले उड़ान के दौरान इंजन फेल होने घटना ऐसी ही लापरवाही की ओर संकेत कर रही है। हाल ही थाईलैंड से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया की उड़ान में तो लापरवाही की हद दिखी, जब विमान के अचानक हवा में तीन सौ फीट नीचे आने की वजह पायलट के नशीले पदार्थ का सेवन सामने आई।
हवाई सफर के दौरान यात्रियों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच बड़ा सवाल यह है कि आखिर विमान हादसों से सबक क्यों नहीं लिए जाते? सवाल यह भी कि विमानन कंपनियों का ध्यान यात्री सुविधाओं की बजाय मनमाना किराया वसूलने में ही क्यों रहता है? एक तरफ विमानन सेवाओं के विस्तार की बातें की जाती हैं तो दूसरी ओर उड्डयन कंपनियों द्वारा मनचाहा किराया वसूलने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। अचानक किसी उड़ान के रद्द करने का ऐलान करना, निर्धारित समय से काफी विलंब से उड़ान भरना जैसी घटनाएं तो आम बात हो गई हंै। एक तथ्य यह भी है कि विमानन कंपनियों के पुराने विमानों की जगह नए विमान बेड़े में लाने की रफ्तार काफी कम है। सरकार ने लोकसभा में गत फरवरी में ही यह जानकारी दी कि देश की छह बड़ी एयरलाइंस के ७५४ विमानों में से ३७७ में बार-बार खराबी आने की बात जांच में सामने आई है। सरकार की ओर से कहा भी गया कि इस जानकारी के बाद नागरिक विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने विमानों पर निगरानी का दायरा बढ़ा दिया है। बड़ी समस्या यह भी है कि विमानन कंपनियों के ऐसे विमान उड़ान भर रहे हंै जिन्हें तकनीकी समस्याओं की वजह से रिटायर कर देना चाहिए था। वैश्विक बाजार में बोइंग व एयरबस जैसी बड़ी कंपनियां भी मांग के अनुरूप विमान तैयार नहीं कर पा रही हैं।
लेकिन विमानन कंपनियों को यह तो विचार करना ही होगा कि वे मुनाफे को प्राथमिकता देंगे या यात्रियों की सुरक्षा को। उड़ानों की संख्या कम भले ही हो जाए लेकिन विमानन कंपनियों को सुरक्षित उड़ानों की चिंता करनी ही होगी। पायलटों की कमी दूर करने के साथ उन्हें समुचित प्रशिक्षण भी मिले। उड़ान से पहले चालक दल के सदस्यों के परीक्षण के मापदंडों को सख्ती से लागू किया जाए। तकनीकी पक्ष की तरफ सर्वाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि जरा सी लापरवाही यात्रियों की जान जोखिम में डाल सकती है।