
वासुदेव देवनानी
अध्यक्ष, राजस्थान विधानसभा
राजस्थान विधानसभा केवल एक विधायी संस्था नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना, जनभागीदारी और सुशासन की सात दशक लंबी यात्रा का जीवंत प्रतीक है। वर्ष 1952 में प्रथम निर्वाचित विधानसभा के गठन से लेकर आज तक इस सदन ने प्रदेश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास को दिशा देने में निर्णायक भूमिका निभाई है। विधानसभा के 75 वें वर्ष के उपलक्ष्य में 15 जुलाई से प्रारंभ हो रहे अमृत महोत्सव के शुभारम्भ अवसर पर यह गौरवशाली यात्रा ‘विधायी गौरव यात्रा वर्तमान एवं पूर्व विधायकों का समागम’ कार्यक्रम के साथ एक ही छत के नीचे साकार होने जा रही है, जहां अतीत की उपलब्धियां, वर्तमान के नवाचार और भविष्य के संकल्प एक साथ दिखाई देंगे।
रियासतों के एकीकरण से लोकतांत्रिक सदन तक
स्वतंत्रता के बाद राजस्थान का निर्माण अनेक रियासतों के क्रमिक एकीकरण से हुआ। 30 मार्च 1949 को वृहद राजस्थान की स्थापना हुई और बाद में 1 नवंबर 1956 को राज्य का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में आया। प्रथम आम चुनावों के बाद 23 फरवरी 1952 को राजस्थान विधानसभा का गठन हुआ तथा 29 मार्च 1952 को इसकी पहली बैठक आयोजित हुई। यही वह ऐतिहासिक क्षण था जिसने राज्य में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की मजबूत नींव रखी। प्रारंभ में विधानसभा में 160 सदस्य थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती हुई 1977 से वर्तमान में 200 सदस्यों तक पहुंची। आज सदन में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला एवं युवा प्रतिनिधियों की उल्लेखनीय भागीदारी राजस्थान के लोकतंत्र की व्यापक सामाजिक आधारभूमि को दर्शाती है।
पुराने टाउन हॉल से आधुनिक विधानसभा भवन तक
राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही 1952 से वर्ष 2000 तक जयपुर के जलेब चौक स्थित ऐतिहासिक सवाई मानसिंह टाउन हॉल से संचालित हुई । नवंबर 1994 में वर्तमान विधानसभा भवन का निर्माण प्रारंभ हुआ और मार्च 2001 में यह पूर्ण हुआ। 27 मार्च 2001 को नए भवन में पहला सत्र आयोजित हुआ। आधुनिक सुविधाओं से युक्त यह भवन आज देश की श्रेष्ठ विधानसभाओं में गिना जाता है और राजस्थान की लोकतांत्रिक गरिमा तथा स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रीय नेतृत्व देने वाली विधानसभा
राजस्थान विधानसभा ने देश को अनेक उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन नेता दिए हैं। पूर्व राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। राजस्थान में तीन बार मुख्यमंत्री रहे भैरोंसिंह शेखावत तथा विधायक रहें जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति बने। वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी राजस्थान विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। यह परंपरा बताती है कि राजस्थान विधानसभा केवल राज्य का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र रही है।
ऐतिहासिक कानूनों की आधारशिला
पिछले 75 वर्षों में इस सदन ने अनेक ऐसे कानून पारित किए जिनका प्रदेश के सामाजिक ढांचे पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनग्र्रहण अधिनियम, 1952 ने सामंती व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम रखा। राजस्थान पंचायत समिति एवं जिला परिषद अधिनियम, 1959 ने ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत किया। राजस्थान लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त अधिनियम, 1973 तथा राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2001 ने शासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को नई दिशा दी। इन्हीं विधायी निर्णयों ने भूमि सुधार, शिक्षा विस्तार, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तीकरण, कृषि विकास और ग्रामीण उन्नयन की मजबूत आधारशिला तैयार की।
डिजिटल और पेपरलेस विधानसभा
वर्तमान समय में राजस्थान विधानसभा ने तकनीकी आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दी है। विधानसभा में ई-विधान (नोवा) प्रणाली लागू की गई है। साथ ही ऑनलाइन प्रश्नोत्तर, डिजिटल दस्तावेजीकरण और इलेक्ट्रॉनिक सूचना व्यवस्था के माध्यम से सदन की कार्यवाही को अधिक पारदर्शी, त्वरित और पर्यावरण-अनुकूल बनाया गया है। सभी 200 विधायकों की सीटों पर कंप्यूटर टैबलेट लगाए गए हैं तथा समितियों की बैठकों में हस्ताक्षर की व्यवस्था प्रारंभ की गई है।यह परिवर्तन केवल तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास है।
नवाचारों से बदलता संसदीय परिवेश
विधानसभा में कई अभिनव पहलें की गई हैं। विधानसभा का विशेष प्रतीक चिन्ह (लोगो) तैयार किया गया है, प्रवेश द्वारों का नामकरण हुआ है और डिजिटल म्यूजियम का उन्नयन किया गया है। संविधान गैलरी और वंदे मातरम् गैलरी के माध्यम से लोकतांत्रिक इतिहास को जनसामान्य तक पहुंचाया जा रहा है। कारगिल स्मृति वाटिका, नक्षत्र वाटिका और हर्बल वाटिका जैसे प्रयासों ने विधानसभा परिसर को सांस्कृतिक एवं प्रेरणादायी स्वरूप प्रदान किया है।
युवा पीढ़ी को लोकतंत्र से जोडऩे की पहल
युवा संसद, मॉक विधानसभा और विद्यार्थियों के विधानसभा भ्रमण जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को संसदीय प्रक्रिया से परिचित कराया जा रहा है। प्रश्नकाल, बहस और निर्णय प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति विश्वास बढ़ा रहा है और भविष्य के जिम्मेदार नागरिक तैयार करने में सहायक साबित होगा।
भविष्य की दिशा
राजस्थान विधानसभा को आधुनिक, शोध-आधारित और जनसहभागी संस्था बनाने की दिशा में आगे भी कई योजनाएं प्रस्तावित हैं। संसद के केंद्रीय कक्ष की तर्ज पर आधुनिक सेंट्रल हॉल तथा प्रस्तावित विधान परिषद् के सभागार में अत्याधुनिक ऑडिटोरियम के निर्माण की पहल की गई है। ये सुविधाएं युवा संसद, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और संसदीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों का प्रमुख केंद्र बनेंगी।
राजस्थान विधानसभा की 75 वर्ष की यात्रा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प भी है। यह यात्रा बताती है कि लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनप्रतिनिधि, संस्थाएं और नागरिक मिलकर संवैधानिक मूल्यों को जीवन का आधार बनाते हैं। अमृत महोत्सव इसी विश्वास का उत्सव है-एक ऐसे लोकतांत्रिक राजस्थान का, जो अपनी परंपराओं पर गर्व करते हुए भविष्य की ओर आत्मविश्वास से बढ़ रहा है।