
नमामी शंकर बिस्सा
इक्कीसवीं सदी का वर्तमान समय तेजी से बदलते संचार माध्यमों का समय है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया माध्यमों ने संचार और संवाद को त्वरित बनाया है किंतु हाल के कुछ समय में इन माध्यमों पर भाषा का अनुशासन, अनुशीलन, तथा संयम बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। इस चुनौती का सर्वाधिक प्रभाव युवा पीढ़ी विशेषकर ‘जेन जी’ की सोशल मीडिया पोस्ट पर उसके शब्दों और भाषा में दिखाई देता है। इमोजी, स्लेंग, गाली-गलोच, अमर्यादित भाषा तथा सामाजिक सरोकारों से परे जाकर की गयी टिप्पणियां संवाद को हल्का और सतही बना देती है। विचारणीय प्रश्न यह है कि जिस देश में संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा केवल देव वाणी ही नहीं बल्कि भाषायी अनुशासन, शब्दानुशासन, संयम, श्रेष्ठ आचरण की शिक्षिका के रूप में हमारा मार्गदर्शन करती है वहां के युवाओं की पब्लिक डोमेन (सार्वजनिक मंच) की भाषा इतनी सतही और आक्रामक कैसे हो सकती है?
एक अन्य पहलू यह भी है कि आक्रोशित युवा सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की भाषा का उपयोग करते है वैसी भाषा वह अपने माता-पिता और परिवार के समक्ष निश्चित तौर पर नहीं करते हैं। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज में संस्कृत, संस्कृति और संस्कार रूपी वटवृक्ष की जड़ें बहुत गहरी हैं। आधुनिकता की हवा का झोंका शाखाओं को हिला सकता है किंतु जड़ों को नहीं ‘संस्कृति: संस्कृताश्रिता’ का ध्येय वाक्य हमें सिखाता है कि हमारी भारतीय संस्कृति और संस्कार तो संस्कृत पर ही आश्रित हैं।
संस्कृत भाषा का प्रत्येक शब्द व्याकरण के नियमों से बंधा होता है। इसलिए उसमे अनावश्यक शब्दों के आडंबर और आक्रामकता के लिए कोई स्थान नहीं होता है। यह भाषा मानवों के विचारों को व्यवस्थित कर उनमें संयम और संस्कारों का निर्माण करती है। ‘यादृशी भाषा तादृश: संस्कार:’ (जैसी भाषा वैसा संस्कार) का पाठ भी हमें संस्कृत ही पढ़ाती है।
आजकल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर डिजिटल संवाद की भाषा का गिरता स्तर चिंता का विषय बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर एक असंयमित टिप्पणी पलभर में आपसी बंधन तोड़ देती है। ‘भाषया धर्ममाप्नोति भाषया बन्धनं भवेत्’ (भाषा से ही धर्म मिलता है और भाषा से ही आपसी जुडाव होता है) का यह संदेश हमें यह सिखाता है कि भाषा का उदेश्य किसी को अपमानित या पराजित करना नहीं है बल्कि सत्य, सौहार्द ओर आपसी बंधन स्थापित करना है। पाणिनि के व्याकरण सूत्रों से ज्ञात होता है कि यदि भाषा में अनुशासन नहीं है तो विचार भी टूटकर बिखर जाते हैं। ऋग्वेद में तो वाणी को देवी शक्ति मानते हुए कहा गया है कि हमारी जीभ और शब्दों में लक्ष्मी है, मित्र है, बंधन है और विनाश भी है।
अब यक्ष प्रश्न यह है कि संस्कृत जैसी विकसित, समृद्ध, आधुनिक भाषाओं की जननी और संस्कार सिखाने वाली वैज्ञानिक भाषा को युवा पीढ़ी कैसे ग्रहण करे? सरकारी और निजी संस्कृत शिक्षण संस्थानों में घट रही छात्र संख्या युवा पीढ़ी की संस्कृत के प्रति अरुचि को दर्शाती है। यह भी कहा जाता है कि संस्कृत में रोजगार के अवसर नहीं हैं। वस्तुत: वेद विज्ञान, ज्योतिष, वास्तु, आयुर्वेद, पोरोहित्य, कर्मकांड आदि के क्षेत्र में एक बड़ा मार्केट खड़ा किया जा सकता है किंतु नीति निर्माताओं ने इस और कभी ध्यान नहीं दिया। बाबा रामदेव जब योग और आयुर्वेद से करोड़ों का कारोबार खड़ा कर सकते है तो देश का संस्कृत पढ़ा युवा ऐसा क्यों नहीं कर पा रहा है? इसके पीछे कारण है- निवेश, सरकारी प्रोत्साहन और प्रेरणा का अभाव। संस्कृत विधाओं में कारोबार के लिए बैंक भी लोन देने में आनाकानी करते हैं।
इजरायल सरकार ने मृत प्राय: भाषा हिब्रू को पुन: जनवाणी बनाकर अपने संकल्प का पूरी दुनिया में डंका बजाया है। हम विश्व गुरु तभी बन पाएंगे। जब वैश्विक भाषा संस्कृत को पुनर्जीवित कर इसे जनवाणी बनाएंगे। चीन ने अपनी मूल भाषा मंडारिन को नहीं छोड़ा। आज वह विश्व की एक बड़ी ताकत है। यह सुखद है कि नई शिक्षा नीति में युवा वर्ग को प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से अवगत कराने की विशेष व्यवस्था की गई है। संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है इसलिए कंप्यूटर के अलावा कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआइ) के वर्तमान दौर में इसकी प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। एआइ आधारित भाषा तकनीकों के विकास में संस्कृत शब्दावली और व्याकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। पाणिनी की व्याकरण के गूढ़ सूत्रों का उपयोग करके एआइ एल्गोरिदम द्वारा मशीनी अनुवाद को और अधिक परिष्कृत किया जा सकता है। एआइ टूल्स संस्कृत के गद्यों और पद्यों में उपलब्ध भावनात्मक अभिव्यक्तियों की नवीनताओं के उपयोग का एक मजबूत इमोशनल कोश्यंट विकसित कर सकते हैं। इससे युवा पीढ़ी लाभान्वित होगी। संस्कृत ग्रंथों के शास्त्रार्थ प्रसंगों के अध्यन से न केवल तार्किक क्षमता का विकास होता है बल्कि कम्युनिकेशन स्किल्स में भी अभिवृद्धि होती है।
संस्कृत का अध्ययन अतीत की और लौटना नहीं है बल्कि भविष्य की संवाद संस्कृति, तार्किक क्षमता, शब्दानुशासन, एआइ और मशीनी अनुवाद को विकसित करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। संस्कृत के सबसे बड़े आलोचक देश के नौकरशाह जब अपने नए घर में प्रवेश करते हैं तो वास्तु पूजन और हवन अवश्य करते है। यह तथ्य भी संस्कृत की कालजयी प्रासंगिकता का एक प्रमाण है।