
हमारे देश में महिलाओं के लिए साफ व सुरक्षित सार्वजनिक शौचालयों का नहीं होना बड़ी व पुरानी समस्या है। इस समस्या की वजह से महिलाएं पानी पीना तक कम कर देती हैं, जिससे सेहत से जुड़े नए खतरों की आशंका बढ़ जाती है। शौचालय निर्माण की दिशा में काफी काम होने के बावजूद महिलाओं से जुड़ा यह संकट कम नहीं हुआ है। सरकारी शिक्षण संस्थाओं से लेकर अन्य महकमों तक में महिला शौचालय न होने की जानकारी सामने आती रहती है। लेकिन जब दूसरों को न्याय दिलाने वाली अदालतों में भी हालत कमोबेश ऐसी ही हो तो चिंता होना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने देशभर में जिला व निचली अदालतों में चार सप्ताह के भीतर जहां भी जरूरत हो वहां तुरंत शौचालय निर्माण शुरू कराने के निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कोई पहली बार अदालतों में महिला शौचालयों की कमी की ओर ध्यान दिलाया हो ऐसा नहीं है। सालभर पहले भी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया था कि वे शौचालयों के निर्माण व रखरखाव के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करें। तब भी ऐसे ही मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया था कि कई अदालतों में तो महिला जजों तक के लिए पृथक शौचालय नहीं है। ताजा मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि फंड की कमी की कोई दलील सुनी नहीं जाएगी। यदि ऐसा है भी तो शराब व सिगरेट पर अतिरिक्त टैक्स लगाएं, हम उसे सही ठहराएंगे। लेकिन यह विचारणीय विषय है कि हमारी बेटियों की कितनी खराब और दयनीय स्थिति है। बात सिर्फ अदालतों की ही नहीं। जब भी महिलाओं के लिए पृथक शौचालय नहीं होने की बात सामने आती है तो धन की कमी की आड़ ली जाती है। सरकारी दफ्तर हों या फिर सरकारी महकमे अथवा सरकारी स्कूल। सब जगह महिला शौचालयों की उपलब्धता जरूरी है। मुख्य बाजारों व दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर यह सुविधा न होने पर महिलाएं कितना असहज महसूस करती होंगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। महिलाओं की सुरक्षा, कार्यस्थल पर समान व्यवहार और समान वेतन तथा विधायिकाओं में भी उनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर तो बातें खूब होती हैं लेकिन उनकी गरिमा व सेहत से जुड़ी इस मूलभूत जरूरत की लगातार अनदेखी की जाती रही है। नीति आयोग की दो माह पहले जारी रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा किया गया था कि देश के 98552 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए पृथक शौचालय नहीं है। जबकि 61 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में जो शौचालय हैं, वे उपयोग योग्य नहीं है।
सार्वजनिक शौचालयों की कमी यों तो सभी से जुड़ी समस्या है लेकिन महिलाओं के लिए तो इनकी उपलब्धता को अनिवार्यता ही माना जाना चाहिए। आखिर हर बार अदालतों के निर्देश पर ही सरकारें क्यों हरकत में आती है?