ओपिनियन

संपादकीय : दागदार जनप्रतिनिधियों की यह तस्वीर चिंताजनक

एडीआर के ताजा आंकड़ों में बताया गया है कि प. बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल में कुल 794 निर्वाचित सदस्यों में से 451 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें 322 के खिलाफ तो हत्या, हत्या का प्रयास और बलात्कार जैसे गंभीर मामले हैं।

2 min read
May 11, 2026
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स रिपोर्ट - फोटो:आईएएनएस

चुनाव सुधारों को लेकर हो रही तमाम चर्चाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच भारत में अब भी एक तथ्य पर उतनी चर्चा नहीं होती जितनी होनी चाहिए। यह तथ्य है चुने गए दागदार जनप्रतिनिधियों की लगातार बढ़ती संख्या का। पांच राज्यों के ताजा चुनावों में केंद्रशासित पुडुचेरी को अलग रखते हुए अन्य चार राज्यों में निर्वाचित हुए दागी विधायकों की संख्या लोकतंत्र पर सवालिया निशान खड़े करने वाली है। एडीआर के ताजा आंकड़ों में बताया गया है कि प. बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल में कुल 794 निर्वाचित सदस्यों में से 451 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें 322 के खिलाफ तो हत्या, हत्या का प्रयास और बलात्कार जैसे गंभीर मामले हैं।
केरल में तो चुने गए 140 में से 114 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होना भयावह तस्वीर की तरफ इशारा करता है। जिस राज्य में 80 प्रतिशत से अधिक विधायक आपराधिक मामलों में घिरे हों वहां कानून व्यवस्था बनाए रखने का भरोसा कैसे और किस पर किया जाए? प. बंगाल में 294 में से 190 पर आपराधिक मामले दर्ज है। खास बात ये कि पिछले चुनाव में यह संख्या 142 ही थी। ये आंकड़े इशारा करते है कि हर चुनाव में दागी विधायकों की संख्या बढ़ रही है। तमिलनाडु में 234 में 126 और असम में 126 में से 21 के खिलाफ आपराधिक मामलों का दर्ज होना ये संकेत भी कर रहा है कि इस मामले में हर राज्य और हर राजनीतिक दल बराबर का भागीदार है। राहत की बात ये है कि असम में पिछले चुनाव में 34 दागी विधायकों के मुकाबले इस बार संख्या कम होकर 21 रह गई है। सवाल ये महत्त्वपूर्ण नहीं कि किस राजनीतिक दल के कितने दागी विधायक है, सवाल ये महत्त्वपूर्ण है कि साफ-सुथरी राजनीति की बात करने वाले दल टिकट बांटते समय ये बात भूल क्यों जाते हैं? वहां तो राजनीतिक दलों को सिर्फ जीत की गारंटी चाहिए होती है। यही हाल रहा तो आने वाले समय में दागी विधायकों-सांसदों की बढ़ती संख्या पर लगाम लगाना मुश्किल हो जाएगा। देश में तमाम मुद्दों को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाने वाली सरकार और राजनीति दलों को क्या इतने महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर मुखर नहीं होना चाहिए? राजनीति में पनपी इस बुराई का खात्मा बिना आम सहमति के नहीं किया जा सकता।
दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर अदालतें समय-समय पर नसीहत देती रहती है। अदालतों की सख्ती और चुनाव आयोग की चेतावनियों के बावजूद यदि राजनीतिक दल दागी उम्मीदवारों को टिकट देना बंद नहीं करते, तो लोकतंत्र की साख पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है। जरूरी है कि सभी दल राजनीति को अपराधमुक्त बनाने के लिए ईमानदारी से पहल करें। मतदाताओं को भी स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनने की जिम्मेदारी निभानी होगी। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब संसद और विधानसभाओं में जनसेवा की भावना रखने वाले प्रतिनिधि पहुंचेंगे, न कि आपराधिक छवि वाले।

Published on:
11 May 2026 05:00 pm
Also Read
View All