
ज्योतिका कालरा, (एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया)
भारत में विद्यार्थियों की आत्महत्या पर हमारी प्रतिक्रिया अब लगभग एक तयशुदा ढर्रे पर चलने लगी है। एक युवा जीवन समाप्त होता है, शोक की लहर उठती है, सवाल पूछे जाते हैं और जिम्मेदारी तय करने की मांग होती है। लेकिन जिस जरूरी सवाल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है, वह है- अगली मौत को कैसे रोका जाए? राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, यानी हर दिन करीब 40 युवा जिंदगियां खत्म हुईं। ये आंकड़े किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज संख्याएं नहीं, अपितु पूरे देश के लिए गंभीर चेतावनी है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था को त्रासदी के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय समय रहते विद्यार्थियों के संकट और मानसिक दबाव को पहचानना सीखना होगा। नीट से जुड़ी छात्र आत्महत्याओं ने इस कठिन बहस को फिर सामने ला दिया है।
असली सवाल यह है कि क्या हम विद्यार्थियों को निराशा और हताशा की ओर धकेलने वाली व्यवस्थागत खामियों की पड़ताल करने को तैयार हैं? छात्र आत्महत्याओं की समस्या केवल नीट तक सीमित नहीं है और न ही यह किसी एक परीक्षा, कोचिंग संस्थान, विश्वविद्यालय या परिवार की समस्या है। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की संरचना और संचालन में मौजूद गहरी खामी है। हम विद्यार्थियों से लगातार बेहतर प्रदर्शन की मांग करते हैं, लेकिन उनके प्रदर्शन और मानसिक स्थिति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं। अनुशासन और संस्थागत मजबूती के नाम पर नियम अक्सर इतनी कठोरता से लागू किए जाते हैं कि यह सवाल पीछे छूट जाता है कि वे वास्तव में शिक्षा, निष्पक्षता और छात्र हित में हैं भी या नहीं। हाजिरी की अनिवार्यता पर कानूनी विवाद इसी कठोरता का उदाहरण है। कम उपस्थिति के कारण परीक्षा से रोके गए एक विधि छात्र की आत्महत्या के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नियमों में बदलाव और केवल कम हाजिरी के आधार पर छात्रों को परीक्षा से न रोकने का निर्देश दिया। हालांकि, बार काउंसिल की चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्देशों के अमल पर रोक लगा दी। सवाल हाजिरी की अनिवार्यता खत्म करने का नहीं, बल्कि नियमों को तार्किक, न्यायसंगत और विद्यार्थी हित के प्रति संवेदनशील बनाने का है। यदि कोई विद्यार्थी विषय की समझ और परीक्षा उत्तीर्ण करने की क्षमता रखता है, तो क्या कक्षा में उसकी मौजूदगी को ही सीखने का एकमात्र प्रमाण माना जाना चाहिए?
जब भी किसी विद्यार्थी की आत्महत्या देश को झकझोरती है तो एक सिलसिला शुरू हो जाता है। सरकारों और परीक्षा प्रणाली को दोष दिया जाता है। शिक्षक, अभिभावक और शिक्षण संस्थान कठघरे में खड़े किए जाते हैं। लेकिन यह सिलसिला शायद ही कभी वास्तविक रोकथाम तक पहुंचता है, क्योंकि हम गंभीरता से यह नहीं देखते कि कहीं व्यवस्था स्वयं तो ऐसे दबाव-बिंदु पैदा नहीं कर रही, जहां विद्यार्थी खुद को असहाय महसूस करने लगे। यहीं शिक्षण संस्थानों को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। शिकायत निवारण की प्रक्रिया धीमी या विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर नहीं होनी चाहिए। अभिभावकों से संवाद केवल संकट पैदा होने के बाद शुरू नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी के पूरी तरह टूटने से पहले खतरे के संकेत पहचानने की व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षकों और प्रशासकों को मानसिक तनाव और संकट के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि संस्थागत सहायता जरूरी है, लेकिन विद्यार्थियों पर पडऩे वाले हर दबाव का स्रोत शिक्षण संस्थान ही नहीं होता। नीट का दबाव घरों और समाज में भी बनता है, जहां आज भी डॉक्टर और इंजीनियर बनने को सफलता, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा का सम्मानजनक रास्ता माना जाता है। परिवार की अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा और असफलता का भय कई विद्यार्थियों पर ऐसा बोझ डालते हैं, जिसे वे व्यक्त तक नहीं कर पाते।
शिक्षा व्यवस्था को अपने मानक बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन वह उन्हीं विद्यार्थियों के भय और दबाव के प्रति उदासीन नहीं रह सकती, जिनके लिए वह बनी है। वास्तविक शैक्षणिक उत्कृष्टता तभी संभव है, जब कठोरता और संवेदनशीलता साथ चलें। संस्थानों को याद रखना होगा कि विद्यार्थी भविष्य की चिंता और असफलता के भय से जूझते युवा हैं। नियम सीखने की प्रक्रिया को दिशा दें, बेबसी न बढ़ाएं। परीक्षाएं योग्यता परखें, किसी विद्यार्थी के पूरे जीवन और व्यक्तित्व का फैसला न सुनाएं। संस्थानों, शिक्षकों और व्यापक शिक्षा तंत्र की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े होते हैं, लेकिन सार्थक सुधार का विकल्प केवल सहानुभूति नहीं हो सकती।
नीट से जुड़ी बहस को व्यापक नजरिए से देखा जाना चाहिए। पारदर्शी और त्रुटिरहित परीक्षा व्यवस्था जरूरी है, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं। सीमित साधनों वाला विद्यार्थी बेहतर प्रदर्शन के बाद भी निजी मेडिकल कॉलेजों की भारी फीस के कारण प्रवेश से वंचित रह सकता है, जबकि कम अंकों वाले आर्थिक रूप से सक्षम अभ्यर्थियों के लिए निजी संस्थानों के रास्ते खुले रह सकते हैं। इसलिए असमानता परीक्षा के साथ समाप्त नहीं होती। विद्यार्थी आत्महत्याएं केवल परिवारों की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि संस्थागत और सामाजिक विफलता का भी संकेत है। इन्हें रोकने के लिए आक्रोश से आगे बढ़कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी होगी, जिसके केंद्र में सीखना, निष्पक्षता और मानवीय गरिमा हो। शैक्षणिक मानक जरूरी हैं, लेकिन किसी विद्यार्थी को केवल अंक, रैंक, रोल नंबर या उपस्थिति तक सीमित नहीं किया जा सकता। हर खोया हुआ विद्यार्थी हमें याद दिलाता है कि हमारा तंत्र समय रहते उसकी पीड़ा को पहचानने में विफल रहा। मानवीय शिक्षा व्यवस्था मानकों को कायम रखते हुए विद्यार्थियों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहती है। उसकी सफलता का असली पैमाना त्रासदी के बाद आक्रोश नहीं, बल्कि उसे होने से पहले रोक पाने की क्षमता है। भा रत में विद्यार्थियों की आत्महत्या पर हमारी प्रतिक्रिया अब लगभग एक तयशुदा ढर्रे पर चलने लगी है। एक युवा जीवन समाप्त होता है, शोक की लहर उठती है, सवाल पूछे जाते हैं और जिम्मेदारी तय करने की मांग होती है। लेकिन जिस जरूरी सवाल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है, वह है- अगली मौत को कैसे रोका जाए? राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, यानी हर दिन करीब 40 युवा जिंदगियां खत्म हुईं। ये आंकड़े किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज संख्याएं नहीं, अपितु पूरे देश के लिए गंभीर चेतावनी है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था को त्रासदी के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय समय रहते विद्यार्थियों के संकट और मानसिक दबाव को पहचानना सीखना होगा। नीट से जुड़ी छात्र आत्महत्याओं ने इस कठिन बहस को फिर सामने ला दिया है।
असली सवाल यह है कि क्या हम विद्यार्थियों को निराशा और हताशा की ओर धकेलने वाली व्यवस्थागत खामियों की पड़ताल करने को तैयार हैं? छात्र आत्महत्याओं की समस्या केवल नीट तक सीमित नहीं है और न ही यह किसी एक परीक्षा, कोचिंग संस्थान, विश्वविद्यालय या परिवार की समस्या है। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की संरचना और संचालन में मौजूद गहरी खामी है। हम विद्यार्थियों से लगातार बेहतर प्रदर्शन की मांग करते हैं, लेकिन उनके प्रदर्शन और मानसिक स्थिति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं। अनुशासन और संस्थागत मजबूती के नाम पर नियम अक्सर इतनी कठोरता से लागू किए जाते हैं कि यह सवाल पीछे छूट जाता है कि वे वास्तव में शिक्षा, निष्पक्षता और छात्र हित में हैं भी या नहीं। हाजिरी की अनिवार्यता पर कानूनी विवाद इसी कठोरता का उदाहरण है। कम उपस्थिति के कारण परीक्षा से रोके गए एक विधि छात्र की आत्महत्या के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नियमों में बदलाव और केवल कम हाजिरी के आधार पर छात्रों को परीक्षा से न रोकने का निर्देश दिया। हालांकि, बार काउंसिल की चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्देशों के अमल पर रोक लगा दी। सवाल हाजिरी की अनिवार्यता खत्म करने का नहीं, बल्कि नियमों को तार्किक, न्यायसंगत और विद्यार्थी हित के प्रति संवेदनशील बनाने का है। यदि कोई विद्यार्थी विषय की समझ और परीक्षा उत्तीर्ण करने की क्षमता रखता है, तो क्या कक्षा में उसकी मौजूदगी को ही सीखने का एकमात्र प्रमाण माना जाना चाहिए?
जब भी किसी विद्यार्थी की आत्महत्या देश को झकझोरती है तो एक सिलसिला शुरू हो जाता है। सरकारों और परीक्षा प्रणाली को दोष दिया जाता है। शिक्षक, अभिभावक और शिक्षण संस्थान कठघरे में खड़े किए जाते हैं। लेकिन यह सिलसिला शायद ही कभी वास्तविक रोकथाम तक पहुंचता है, क्योंकि हम गंभीरता से यह नहीं देखते कि कहीं व्यवस्था स्वयं तो ऐसे दबाव-बिंदु पैदा नहीं कर रही, जहां विद्यार्थी खुद को असहाय महसूस करने लगे। यहीं शिक्षण संस्थानों को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। शिकायत निवारण की प्रक्रिया धीमी या विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर नहीं होनी चाहिए। अभिभावकों से संवाद केवल संकट पैदा होने के बाद शुरू नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी के पूरी तरह टूटने से पहले खतरे के संकेत पहचानने की व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षकों और प्रशासकों को मानसिक तनाव और संकट के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि संस्थागत सहायता जरूरी है, लेकिन विद्यार्थियों पर पडऩे वाले हर दबाव का स्रोत शिक्षण संस्थान ही नहीं होता। नीट का दबाव घरों और समाज में भी बनता है, जहां आज भी डॉक्टर और इंजीनियर बनने को सफलता, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा का सम्मानजनक रास्ता माना जाता है। परिवार की अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा और असफलता का भय कई विद्यार्थियों पर ऐसा बोझ डालते हैं, जिसे वे व्यक्त तक नहीं कर पाते।
शिक्षा व्यवस्था को अपने मानक बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन वह उन्हीं विद्यार्थियों के भय और दबाव के प्रति उदासीन नहीं रह सकती, जिनके लिए वह बनी है। वास्तविक शैक्षणिक उत्कृष्टता तभी संभव है, जब कठोरता और संवेदनशीलता साथ चलें। संस्थानों को याद रखना होगा कि विद्यार्थी भविष्य की चिंता और असफलता के भय से जूझते युवा हैं। नियम सीखने की प्रक्रिया को दिशा दें, बेबसी न बढ़ाएं। परीक्षाएं योग्यता परखें, किसी विद्यार्थी के पूरे जीवन और व्यक्तित्व का फैसला न सुनाएं। संस्थानों, शिक्षकों और व्यापक शिक्षा तंत्र की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े होते हैं, लेकिन सार्थक सुधार का विकल्प केवल सहानुभूति नहीं हो सकती।
नीट से जुड़ी बहस को व्यापक नजरिए से देखा जाना चाहिए। पारदर्शी और त्रुटिरहित परीक्षा व्यवस्था जरूरी है, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं। सीमित साधनों वाला विद्यार्थी बेहतर प्रदर्शन के बाद भी निजी मेडिकल कॉलेजों की भारी फीस के कारण प्रवेश से वंचित रह सकता है, जबकि कम अंकों वाले आर्थिक रूप से सक्षम अभ्यर्थियों के लिए निजी संस्थानों के रास्ते खुले रह सकते हैं। इसलिए असमानता परीक्षा के साथ समाप्त नहीं होती। विद्यार्थी आत्महत्याएं केवल परिवारों की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि संस्थागत और सामाजिक विफलता का भी संकेत है। इन्हें रोकने के लिए आक्रोश से आगे बढ़कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी होगी, जिसके केंद्र में सीखना, निष्पक्षता और मानवीय गरिमा हो। शैक्षणिक मानक जरूरी हैं, लेकिन किसी विद्यार्थी को केवल अंक, रैंक, रोल नंबर या उपस्थिति तक सीमित नहीं किया जा सकता। हर खोया हुआ विद्यार्थी हमें याद दिलाता है कि हमारा तंत्र समय रहते उसकी पीड़ा को पहचानने में विफल रहा। मानवीय शिक्षा व्यवस्था मानकों को कायम रखते हुए विद्यार्थियों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहती है। उसकी सफलता का असली पैमाना त्रासदी के बाद आक्रोश नहीं, बल्कि उसे होने से पहले रोक पाने की क्षमता है।