
हमारे लिए 14 अगस्त केवल भारत के स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या नहीं है। यह वह दिन है, जिसने स्वतंत्रता की खुशी के साथ करोड़ों भारतीयों के जीवन में ऐसा दर्द भर दिया, जिसकी टीस पीढिय़ों तक महसूस होती रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त 2021 को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा कर उन लाखों लोगों के संघर्ष, बलिदान और विस्थापन को राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बनाया है, जिन्होंने देश के विभाजन की कीमत अपने घर, परिवार और अपने प्राण देकर चुकाई। विभाजन को समझना यह समझना है कि स्वतंत्रता हमें कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी की कीमत चुकाने के बाद मिली है।
ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की विविधताओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के ढांचे में इस तरह इस्तेमाल किया कि हमारी सामुदायिक पहचाने धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनती गईं। 1940 के दशक में मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग अधिक मुखर हुई और 1946 के घटनाक्रमों, कैबिनेट मिशन योजना की विफलता और उसके बाद बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को अत्यंत जटिल बना दिया। अंतत: भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने, लेकिन इसके साथ ही वह मानवीय त्रासदी शुरू हुई, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत का विभाजन उनके शरीर को दो टुकड़ों में बांटने के समान होगा। लेकिन हिंसा की विकरालता और गृहयुद्ध की आशंका के सामने परिस्थितियां इतनी भयावह हो गईं कि कांग्रेस नेतृत्व ने अंतत: विभाजन की योजना स्वीकार कर ली। विभाजन के समय सिंध, पश्चिमी पंजाब, सीमांत प्रांत और पूर्वी बंगाल से भारत आने वाले परिवारों की पीड़ा को केवल आंकड़ों अथवा संख्या में नहीं समझा जा सकता। हिंसा, हत्या और विस्थापन की अवर्णनीय घटनाओं ने लाखों परिवारों को तहस-नहस कर दिया। विभाजन के दौरान 'ब्लड ट्रेन' की स्मृतियां आज भी अनेक परिवारों की मौखिक इतिहास परंपरा का हिस्सा हैं। सबसे अधिक मर्मांतक पीड़ा महिलाओं ने झेली। अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन, जबरन विवाह और परिवारों से बिछुडऩे जैसी अमानवीय घटनाएं हुईं।
करीब दो करोड़ लोग विस्थापित हुए और लगभग बीस लाख लोग मारे गए। विभाजन के बाद भारत आए विस्थापित परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, शून्य से अपना जीवन शुरू करना। जिनके पास बड़े मकान और कारोबार थे, उन्हेंं कभी शरणार्थी शिविरों में तो कभी खुले गगन के तले रातें बिताने को मजबूर होना पड़ा। किसी ने छोटी-सी दुकान से अपनी आजीविका के नए सफर की शुरुआत की तो किसी ने ठेला लगाया। लेकिन हाथ फैलाकर जीवन बिताने के बजाय मेहनत, आत्मसम्मान, उद्यमिता और शिक्षा को अपना हथियार बनाया। यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी। यह संघर्ष केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों विस्थापित परिवारों की कहानी है, जिन्होंने अपनी मेहनत, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति आस्था के बल पर अपना नया संसार खड़ा किया। उन्होंने विस्थापन को अपनी नियति मानकर जीवन से हार नहीं मानी। विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया, नए भारत में अपना स्थान बनाया और राष्ट्र निर्माण में योगदान
दिया। यही विभाजन पीडि़त परिवारों की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि संपत्ति छीनी जा सकती है, लेकिन परिश्रम, साहस और आत्मसम्मान नहीं छीना जा सकता। विभाजन की विभीषिका हमें संदेश देती है कि नफरत की राजनीति अंतत: समाज को बांटती है, जबकि संवाद, विश्वास और एकता राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यह स्मृतियां हमें बताती है कि आजादी का उत्सव जितना गौरव का विषय है, उतना ही विभाजन की पीड़ा को याद करना हमारी जिम्मेदारी भी है। इसलिए जब 15 अगस्त को जब तिरंगा फहराए तो उसे केवल इसे उत्सव नहीं, वरन् कृतज्ञता का पर्व भी समझना चाहिए। आइए, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर हम अपने उन पुरखों को नमन करें जिन्होंने सब कुछ खोकर भी भारत को अपना घर बनाया। इसलिए विभाजन की विभीषिका को याद रखें, लेकिन उससे घृणा नहीं बल्कि, राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और अखंड भारत एवं राष्ट्रीय चेतना की प्रेरणा लें।