शिक्षक दिवस पर विशेष: लोक शिक्षा का उद्देश्य यदि अपनी दुनिया को समझाना व सुधारना है तो परसाई का लेखन पढऩा अनिवार्य है। हमें पाठक के रूप में अपने कत्र्तव्यों का पालन करना होगा।
नवनीत शर्मा
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापनरत
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शिक्षा के अन्य सभी उद्देश्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य व्यक्ति को उसके समकालीन जीवन के लिए तैयार करना है। स्कूल केवल राज्य और राज्य के ज्ञान के निर्माता और वितरक के रूप में उभरा। औद्योगीकरण और फ्रांसीसी क्रांति के आगमन के साथ, यह सामाजिक दर्शन पैदा हुआ कि कोई भी पढ़ सकता है और हर कोई पढ़ सकता है। इस पृष्ठभूमि ने स्कूल को जन शिक्षा का केंद्र बना दिया और शिक्षक को सरकारी या राज्य कर्मचारी बना दिया। शिक्षा दुनिया के हर व्यक्ति को न्यूनतम ज्ञान देने का विषय है ताकि वह पढ़ सके और हिसाब-किताब कर सके, जबकि लोक शिक्षा उस लोक की शिक्षा है जहां व्यक्ति और वैयक्तिक्ता ही मुख्य केंद्र बिंदु है। लोक को समझने के लिए हम इसे परसर्ग में प्रयोग करके समझते हैं, जैसे इहलोक-परलोक, स्वर्ग-नर्क या पाताल-परीलोक। हर लोक की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं जैसे स्वर्ग की विशेषता मंद शीतल हवा और फलों से लदे वृक्षों में रहने वाली ‘पुण्यात्माएं’ हो सकती हैं, तो नर्क की विशेषता जलते अंगारे, मवाद से भरी नदी और पाप भोगने वाले ‘पापी’। लोक अपने देश-काल-इतिहास-संस्कृति-राजनीति-अर्थशास्त्र का प्रतिबिंब होता है। शिक्षा इसी लोक जीवन की तैयारी है और शायद इसी लोक के दर्पण को साहित्य कहते हैं और इस तरह लोक शिक्षक की भूमिका साहित्यकार पर आ गई है।
महान लेखकों की शृंखला में हरिशंकर परसाई एक प्रमुख लेखक हैं। इस वर्ष हम उनकी ‘जन्मशती’ मना रहे हैं। परसाई कहते हैं कि कमजोर का दिवस मनाया जाता है। हिंदी दिवस-मजदूर दिवस-शिक्षक दिवस, क्या कभी इंस्पेक्टर दिवस मनाया जाता है। परसाई दिवस सिर्फ इस कारण नहीं मनाया जाना चाहिए बल्कि हमें ऐसी सामयिकता विकसित करनी होगी जिसमें लोग और लोक परसाई को पढ़ें और उस समाज का निर्माण करें जिसमें वे विकृतियां और विसंगतियां कम हों, जिनके बारे में परसाई ने लिखकर हमें आगाह किया।
लोक शिक्षा के उदाहरण में, शायद शिक्षा का उद्देश्य ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसमें धर्म, जाति, लिंग, भाषा, वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। परसाई ने लिखा, ‘वैसे भाषा संवाद के काम आती है पर हमारे यहां दंगा कराने के काम आती है’ अथवा ‘क्या करें एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।’ इस एक वाक्य से अधिक योगदान स्त्री स्वतंत्रता के आंदोलन में किसी ने नहीं दिया। फिर भी कुछ सवाल झकझोरते हैं, जैसे कि परसाई साहित्य लेखन को रोजगार क्यों नहीं माना जाता है, कबीर ने चादरें क्यों बुनीं, रैदास ने जूते क्यों सिले?
जिस समाज में अध्ययन-अध्यापन की परंपरा नगण्य है, वहां ‘शिक्षक’ की सरकारी नौकरी छोडक़र लोक शिक्षक यानी साहित्यकार का दायित्व निभाना परसाई के साहसी होने की एकमात्र निशानी नहीं है। टैगोर, प्रेमचंद, अज्ञेय, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, हरिवंशराय बच्चन, दिनकर, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और हरिशंकर परसाई जैसे तमाम लेखक जो शिक्षक भी थे, अगर उन्हें कोई कोष्ठक घेर सकता है तो वह है उनका ‘लोक शिक्षक’ होना। परसाई लिखते हैं कि जो लेखक अपने देश और समय के प्रति वफादार नहीं हो सकता, वह अनंत काल के प्रति कैसे वफादार हो सकता है। अगर उद्देश्य स्वतंत्र भारत के निर्माण के समय को समझना है तो परसाई को पढ़े बिना यह पूरा नहीं हो सकता।
किसी भी ऐसी व्यवस्था में जहां अध्यापक एक वेतन भोगी कर्मचारी मात्र हो, वहां उसके सांस्कृतिक कर्मी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जिस समाज में स्कूल राज्य का उपकरण मात्र हो वहां लोक शिक्षा नहीं, बल्कि ज्ञान का पुनरुत्पादन और यथास्थिति बनाए रखने का उपक्रम हो सकता है। परसाई की रचना को यदि नैतिकता के ताबीज के रूपक के माध्यम से समझा जाए तो सदाचारी बनने और भ्रष्ट न होने की स्कूली शिक्षा हमें ईमानदार नहीं बनाती, पर ‘महा’जन (उधार देकर शोषण करने वाले) की लोक शिक्षा आपको तब तक बेईमान जरूर बनाती है, जब तक कि आप पकड़े न जाएं। हर समाज और व्यक्ति अपने समय के कथित ‘सत्य’ की समालोचना कर सके यही लोक शिक्षा है। परसाई ने हमारी ऐतिहासिक चेतना, राजनीतिक चेतना और सामाजिक दायित्व को बहुत अच्छे ढंग से इंगित किया है। वैष्णव के पतन से लेकर विकलांग श्रद्धा का दौर तक, यह भारतीयता और भारतीय समाज का निष्पक्ष चरित्र चित्रण है। ऐसा नहीं है कि हम अज्ञानी हैं लेकिन जैसा कि राही मासूम रजा ने लिखा है, हर गली में काबुलीवाला है लेकिन हर गली में टैगोर नहीं। इसी तरह हम सब दो नाक वाले लोग हैं लेकिन अब यह बताने वाला कोई परसाई नहीं है। दरअसल, लोक शिक्षा का उद्देश्य यदि अपनी दुनिया को समझाना और सुधारना है तो परसाई का लेखन पढ़ा जाना अनिवार्य है। हमें-आपको पाठक के रूप में अपने कत्र्तव्यों का पालन करना होगा। शिक्षण के पेशे से जुड़े लोगों को इसके लिए जुनून जगाना होगा और लोक शिक्षक होने की उत्कंठा निर्मित करनी होगी। यही उनकी पेशे के प्रति पारसाई (प्रतिबद्धता) होगी।