
indian rupee going down
वेद माथुर, (पूर्व बैंकर एवं आर्थिक विश्लेषक)
भारतीय रुपया पिछले कई वर्षों से लगातार दबाव में है। एक समय था जब एक अमरीकी डॉलर लगभग 45-50 रुपए में मिलता था, लेकिन आज यह 95-96 रुपए के स्तर तक पहुंच चुका है। इसका सीधा असर आम लोगों के खर्च पर पड़ता है, क्योंकि रुपया कमजोर होने से विदेश से आने वाली वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, मोबाइल फोन, लैपटॉप और दवाओं जैसी चीजों की कीमतें बढ़ जाती हैं। रुपए पर दबाव का सबसे बड़ा कारण भारत का बढ़ता व्यापार घाटा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल माल आयात लगभग 775 बिलियन डॉलर रहा, जबकि निर्यात करीब 442 बिलियन डॉलर तक ही सीमित रहा। यानी देश को लगातार अधिक डॉलर की जरूरत पड़ रही है, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ रहा है। जब किसी देश में डॉलर की मांग बढ़ती है और उसकी आपूर्ति सीमित रहती है, तब उसकी मुद्रा कमजोर होने लगती है। भारत के आयात बिल का सबसे बड़ा हिस्सा ऊर्जा पर निर्भर है। पेट्रोलियम, कच्चा तेल, गैस और कोयला जैसे ऊर्जा उत्पाद कुल आयात का लगभग 28-30 प्रतिशत हिस्सा हैं। इसके अलावा मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, मोबाइल फोन और सोने का आयात भी तेजी से बढ़ रहा है। इससे स्पष्ट है कि भारत अभी भी ऊर्जा और कई तकनीकी क्षेत्रों में आयात पर काफी निर्भर है। दूसरी ओर, निर्यात में इंजीनियरिंग गुड्स, रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाएं और जेम्स-ज्वेलरी प्रमुख हैं।
वैश्विक चुनौतियों के बीच बढ़ा भारत का निर्यात
सेवा निर्यात, खासकर आइटी और बीपीओ सेवाएं, भारत की बड़ी ताकत बनी हुई हैं। माल और सेवा मिलाकर भारत का कुल निर्यात 860 बिलियन डॉलर के रेकॉर्ड स्तर तक पहुंचा, लेकिन वैश्विक मंदी और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के कारण निर्यात की रफ्तार अब भी आयात से धीमी है। रुपए के अवमूल्यन से निर्यातकों को लाभ मिलता है, क्योंकि डॉलर में बिक्री करने पर उन्हें अधिक रुपए प्राप्त होते हैं। इससे उनका मुनाफा बढ़ता है और वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रह सकते हैं।
ब्रेन ड्रेन बन रहा अर्थव्यवस्था की चुनौती
वहीं दूसरी ओर, रुपए के कमजोर होने से आयातकों को विदेशी मुद्रा में भुगतान के लिए अधिक रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है। रुपए की कमजोरी के पीछे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक कारण भी हैं। विदेश में शिक्षा और बसने की बढ़ती प्रवृत्ति धीरे-धीरे 'ब्रेन ड्रेन' का रूप ले रही है। ऐसे में भारत को अपनी युवा प्रतिभाओं के लिए बेहतर घरेलू अवसर तैयार करने की जरूरत है। भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा भंडार को 696 बिलियन डॉलर के मजबूत स्तर तक पहुंचाकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दस वर्ष पहले, यानी 2016 में, यह भंडार लगभग 365 बिलियन डॉलर था।
विदेशी मुद्रा भंडार के साथ ठोस सुधार भी जरूरी
इस उल्लेखनीय वृद्धि ने देश को वैश्विक आर्थिक झटकों से कुछ हद तक सुरक्षा दी है, लेकिन केवल विदेशी मुद्रा भंडार के भरोसे लंबे समय तक नहीं चला जा सकता। रुपए को मजबूत बनाने के लिए आयात कम करने और निर्यात बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। ऊर्जा क्षेत्र में सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहनों और घरेलू तेल-गैस उत्पादन को बढ़ावा देकर कच्चे तेल और कोयले पर निर्भरता कम की जा सकती है।
वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और मशीनरी क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' को मजबूत करना जरूरी है, ताकि घरेलू उत्पादन बढ़े और आयात बिल घट सके। साथ ही, दवाओं के कच्चे माल और रक्षा उपकरणों के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। निर्यात बढ़ाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में उच्च मूल्य संवर्धन पर ध्यान देने के साथ उत्पाद गुणवत्ता, लॉजिस्टिक्स और वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जुड़ाव को मजबूत करना जरूरी है। भारत को अब केवल 'लो-कॉस्ट' अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि नवाचार का वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में आगे बढऩा होगा। किसी देश की मुद्रा केवल विनिमय दर नहीं होती, बल्कि उसकी आर्थिक क्षमता, उत्पादन शक्ति और वैश्विक साख का प्रतीक होती है।यदि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, उच्च मूल्य निर्यात और नवाचार पर लगातार काम किया जाए, तो आने वाले वर्षों में रुपया अधिक स्थिर और मजबूत बन सकता है।
Updated on:
22 May 2026, 5:16 PM IST
Published on:
22 May 2026, 5:16 PM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.