
फोटो: पत्रिका
जयपुर अब सिर्फ गुलाबी शहर नहीं रहा। यह धीरे-धीरे एक ऐसे शहर में बदलता जा रहा है, जहां आम आदमी की जिंदगी ‘राजनीति’ की भेंट चढ गई है। सुबह-दोपहर निकलो तो जाम, शाम को लौटो तो भी जाम। ट्रैफिक जाम तो चलो व्यवस्थागत खामी का नतीजा है, लेकिन खास रास्तों पर राजनीतिक ‘नूराकुश्ती’ तो जाम को बिना बुलाए न्योता देने जैसा है। कितना बुरा लगता है कि जब जनता वक्त पर घर-दफ्तर पहुंचना चाहती है, लेकिन रास्ते में ‘नेता’ अपने समर्थकों के साथ आसान राह की बाधा बन खड़ा मिलता है। हां… वे ये दावा जरूर करते हैं कि जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं, मगर सवाल यह है कि किस जनता की? क्योंकि असली जनता तो उसी वक्त सड़क पर फंसी होती है। कोई एम्बुलेंस में तड़प रहा होता है, कोई व्यापारी अपने प्रतिष्ठान तक नहीं पहुंच पाता, कोई मजदूर अपनी आधी दिहाड़ी खो देता है, कोई बच्चा तेज गर्मी में स्कूल वैन में बैठा रो रहा होता है।
क्या लोकतंत्र का अर्थ अब सिर्फ यह रह गया है कि जिसके पास भीड़ और झंडा है, वह पूरे शहर को बंधक बना सकता है? विडंबना यह है कि यह अव्यवस्था अचानक नहीं होती। धरनों और प्रदर्शनों की अनुमति दी जाती है। पुलिस जानती है। प्रशासन जानता है। यातायात विभाग जानता है। फिर भी सड़कें और जनता बंधक बना दी जाती हैं।
नीट का पर्चा लीक होने से कांग्रेस नाराज है। भाजपा खफा है क्योंकि राहुल गांधी ने वैसा बयान दे दिया। हर दल के पास अपनी नाराजगी है, अपनी भीड़ है, अपना प्रदर्शन है। मगर उस आदमी की नाराजगी नजर नहीं आ रही, जो जाम में फंसा हुआ उसी राजनीति को कोस रहा है। लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर होनी चाहिए थी, मगर आज जनता सबसे नीचे दब गई है, नेताओं के भाषणों, पुलिस की बैरिकेडिंग और राजनीतिक अहंकार के तले।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार जरूरी है। मगर क्या लोकतंत्र का मतलब पूरे शहर को बंधक बनाना है? रामनिवास बाग, एसएमएस स्टेडियम, विद्याधर नगर स्टेडियम जैसे स्थान मौजूद हैं, जहां प्रदर्शन हो सकते हैं। फिर सड़कें ही क्यों चुनी जाती हैं? इतिहास गवाह है कि जनता हमेशा नहीं सहती। पड़ोसी बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे उदाहरण बताते हैं कि जब सत्ता जनता की तकलीफ सुनना बंद कर देती है, तब समाज में गुस्सा उबलने लगता है और उसी से समाज के अंधेरों में “कॉकरोच” पैदा होने लगते हैं। वे अचानक नहीं निकलते। वे रोज के अपमान, बेबसी, अव्यवस्था और जाम से पैदा होते हैं।
जयपुर की जनता भी रोज जाम में फंसकर इन्हीं सबसे दो-चार हो रही है। अब सवाल सिर्फ ट्रैफिक का नहीं रहा। सवाल यह है कि क्या शहर जनता के लिए चल रहा है या राजनीति के लिए? क्या प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह है या सिर्फ सत्ता के प्रति? क्या आम आदमी सिर्फ टैक्स देने और जाम झेलने के लिए बचा है? अब भी वक्त है। सत्ता समझ ले शहर की सड़कें किसी दल, किसी नेता, किसी संगठन की जागीर नहीं हैं। लोकतंत्र का अर्थ जनता को रोकना नहीं, जनता के लिए रास्ते खुले रखना होता है।
veejay.chaudhary@in.patrika.com
twitter/veejaypress

बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
