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नागरिक सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन

पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि खुले कूड़े के ढेर, अनियोजित शहरीकरण, फूड वेस्ट और प्रशासनिक लापरवाही ने आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ाई है।

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जयपुर

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Opinion Desk

May 21, 2026

dogs order'

dogs in india

गोपेश शर्मा, (स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार)
भारत के शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों की समस्या अब गंभीर संकट बन चुकी है। लंबे समय तक प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक भावुकता के बीच इसे नजरअंदाज किया गया, लेकिन अब यह केवल पशु-प्रेम या नगर निगम की व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया। यह नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सार्वजनिक स्थानों से हटाए गए आवारा कुत्तों को दोबारा वहीं नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उन्हें शेल्टर होम में रखा जाएगा। रेबीज संक्रमित, लाइलाज या अत्यधिक खतरनाक कुत्तों के मामलों में विशेषज्ञों की निगरानी में यूथेनेशिया की अनुमति भी दी गई है। साथ ही प्रत्येक जिले में 'एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर' और सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। यह फैसला नागरिक सुरक्षा और पशु संवेदना के बीच संतुलन बनाने की एक महत्त्वपूर्ण कोशिश है।

रेबीज के खतरे के बीच वैज्ञानिक प्रबंधन की मांग

हालांकि देश के कई शहरों में आवारा कुत्तों का आतंक आम नागरिकों के लिए भय का कारण बन चुका है। एंटी-रेबीज इंजेक्शन के लिए अस्पतालों में आए दिन लोग पहुंच रहे हैं। भारत विश्व में रेबीज से होने वाली मौतों के सबसे बड़े केंद्रों में शामिल है। विडंबना यह है कि नागरिकों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को अक्सर 'पशु-विरोधी मानसिकता' कहकर नजरअंदाज किया गया। जबकि लोग केवल सुरक्षित और भयमुक्त जीवन की मांग कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी पीड़ा की न्यायिक स्वीकार्यता माना जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच क्या केवल कुत्तों को ही दोषी माना जा सकता है? नहीं, इस समस्या के लिए केवल आवारा कुत्तों को दोष देना सही नहीं होगा। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि खुले कूड़े के ढेर, अनियोजित शहरीकरण, फूड वेस्ट और प्रशासनिक लापरवाही ने आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ाई है। कई लोग पालतू कुत्तों को भी सड़कों पर छोड़ देते हैं, जबकि नसबंदी और वैक्सीनेशन योजनाएं वर्षों तक प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो सकीं। इसलिए समाधान 'क्रूरता' नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मानवीय प्रबंधन होना चाहिए।

निर्देशों से आगे बढ़कर जमीनी कार्रवाई की जरूरत
इसी पक्ष को ध्यान में रखते सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नागरिक सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। अदालत ने किसी एक पक्ष को पूर्ण विजय नहीं दी। अदालत ने माना कि लोगों को सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए, लेकिन पशुओं के साथ अमानवीय व्यवहार भी स्वीकार्य नहीं है। यानी यह फैसला 'मानव बनाम पशु' नहीं, बल्कि 'व्यवस्थित सह-अस्तित्व' की दिशा में एक कोशिश है। दरअसल आवारा कुत्तों के मामले में सबसे बड़ी समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके कमजोर क्रियान्वयन की है। देश में नसबंदी और वैक्सीनेशन के नियम पहले से मौजूद हैं, लेकिन अधिकांश नगर निगमों के पास प्र्याप्त संसाधन नहीं हैं। परिणामस्वरूप वर्षों से चल रही 'पकड़ो, नसबंदी करो और छोड़ दो' नीति स्थायी समाधान नहीं बन सकी। यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश केवल कागजों तक सीमित रहे, तो यह फैसला भी प्रतीकात्मक बनकर रह जाएगा।

डर और दया के बीच संतुलित सोच जरूरी

अब सवाल यह भी है कि भारत के अधिकांश नगर निकाय पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में क्या वे इस जिम्मेदारी को प्रभावी ढंग से निभा पाएंगे? हर जिले में एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर और शेल्टर होम बनाने के लिए भारी निवेश, प्रशिक्षित स्टाफ और दीर्घकालिक नीति की जरूरत होगी। शेल्टर होम का संचालन भी आसान नहीं है, क्योंकि वहां भोजन, चिकित्सा और देखभाल की स्थायी व्यवस्था चाहिए। वित्तीय संकट से जूझ रहे नगर निकायों के लिए यह बड़ी चुनौती है। वहीं पर्याप्त तैयारी के बिना कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में भर देना पशु क्रूरता का नया रूप भी बन सकता है। ऐसे में समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है क्योंकि इस समस्या के लिए केवल सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। बिना जिम्मेदारी के कुत्तों को खाना खिलाना, सड़कों पर कचरा और फूड वेस्ट फेंकना तथा पालतू जानवरों को छोड़ देना भी समस्या बढ़ाते हैं। समाज को समझना होगा कि पशु-प्रेम केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि जिम्मेदार व्यवहार भी मांगता है। इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस समस्या बनी हुई है। एक पक्ष हर आवारा कुत्ते को 'खतरा' बताता है, जबकि दूसरा हर शिकायत को 'पशु-विरोधी नफरत' कहकर खारिज कर देता है। सच यह है कि सभी कुत्ते हिंसक नहीं होते, लेकिन लोगों का डर भी झूठा नहीं है। समाधान भावनात्मक बहसों में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक नीति और सामाजिक सहयोग में है।

मानव और पशु के बीच संतुलन की तलाश
यूरोप और कई एशियाई देशों में पालतू पंजीकरण, नसबंदी, शेल्टर नेटवर्क और वैक्सीनेशन की मजबूत व्यवस्था लागू है। वहां पशु अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा को विरोधी नहीं माना गया। भारत को भी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर दीर्घकालिक नीति अपनानी होगी। आवारा कुत्तों का मुद्दा भारत के बदलते शहरी समाज का आईना है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला नागरिक सुरक्षा और पशु संवेदना के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से एक महत्त्वपूर्ण संदेश दिया है कि सभ्यता का अर्थ केवल दया नहीं, व्यवस्था भी है और व्यवस्था का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, संवेदना भी है। भारत को यह तय करना है कि वह आवारा कुत्तों की समस्या को 'मानव बनाम पशु' की लड़ाई बनाएगा या 'सुरक्षित और संवेदनशील सह-अस्तित्व' का मॉडल विकसित करेगा। क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की असली पहचान यही होती है कि वहां इंसानों की सुरक्षा और पशुओं के प्रति करुणा दोनों साथ-साथ चल सकें।