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घुमंतू समाज: केवल अतीत नहीं, भविष्य की एक वैकल्पिक दिशा

घुमंतू समाज में कला किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होती। वह वस्त्रों की कढ़ाई में है, शरीर की चाल में है, अस्थायी डेरों की संरचना में है और लोकगीतों की लय में सांस लेती है। कालबेलिया नृत्य इसका एक जीवंत उदाहरण है, जो सांप की गति, रेगिस्तानी हवा और शरीर की स्मृति का विस्तार है। घुमंतू समाज का ज्ञान लिखा नहीं जाता, वह गाया, सुनाया और जिया जाता है।

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भारत

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Opinion Desk

May 20, 2026

ghumantu samaj

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अश्विनी शर्मा
स्कॉलर, येल विश्वविद्यालय, अमरीका

आखिर ऐसा क्यों है कि जर्मनी का हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय और अमरीका का येल विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में घुमंतू समुदायों पर गहन शोध हो रहा है, जबकि भारत में हम अब भी उन्हें मुख्यत: कल्याण योजनाओं और प्रशासनिक फाइलों तक सीमित करके देख रहे हैं? क्या हम उस ज्ञान को पहचानने में देर कर रहे हैं, जिसे दुनिया अब गंभीरता से समझने लगी है? भारत के घुमंतू समुदायों को देखना मात्र किसी सामाजिक समूह का अवलोकन नहीं है, यह एक चलती हुई सभ्यता से साक्षात्कार है। उनके पैरों की लय, गहनों की झंकार, वस्त्रों की सूक्ष्म कढ़ाई, शरीर की भंगिमाएं और आंखों की मौन भाषा मिलकर एक ऐसे सौंदर्यबोध की रचना करते हैं, जो स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर गतिमान है। यही गति उनकी पहचान भी है और उनका सबसे समृद्ध ज्ञान-स्रोत भी। घुमंतू जीवन में सौंदर्य किसी संग्रहालय में सुरक्षित वस्तु नहीं, बल्कि हर कदम के साथ जन्म लेने वाला अनुभव है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में घुमंतू समुदायों को लेकर कुछ सकारात्मक पहलें अवश्य हुई हैं। पहचान, आवास, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं में उन्हें शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। यह एक स्वागतयोग्य परिवर्तन है। किंतु सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से यह यात्रा अभी अधूरी है। हमने उन्हें समस्या या कल्याण की इकाई के रूप में अधिक देखा है, ज्ञान-परंपरा के रूप में कम। इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों में घुमंतू समाज को एक वैकल्पिक ज्ञान-प्रणाली के रूप में पढ़ा जा रहा है। वहां उनके सौंदर्यबोध, मौखिक स्मृति, पारंपरिक चिकित्सा और पर्यावरणीय समझ को एक समग्र जीवन-दृष्टि के रूप में देखा जा रहा है। घुमंतू ज्ञान आधुनिक विज्ञान और मानविकी दोनों के सामने नए प्रश्न खड़े करता है।

भारत में बारह सौ से अधिक घुमंतू समुदाय
घुमंतू समाज में कला किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होती। वह वस्त्रों की कढ़ाई में है, शरीर की चाल में है, अस्थायी डेरों की संरचना में है और लोकगीतों की लय में सांस लेती है। कालबेलिया नृत्य इसका एक जीवंत उदाहरण है, जो सांप की गति, रेगिस्तानी हवा और शरीर की स्मृति का विस्तार है। घुमंतू समाज का ज्ञान लिखा नहीं जाता, वह गाया, सुनाया और जिया जाता है। जड़ी-बूटियों के नाम लोकगीतों में सुरक्षित हैं, उपचार की विधियां कथाओं में छिपी हैं और रोगों की व्याख्या रूपकों के माध्यम से होती है। यहां शरीर केवल रोगों का वाहक नहीं, बल्कि एक चलता हुआ ग्रंथ है, जहां चिकित्सा और संस्कृति के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं है। भारत में बारह सौ से अधिक घुमंतू समुदाय हैं, जिनकी अपनी अलग बोलियां, भाषाएं, ज्ञान-प्रणालियां और जीवन-दृष्टियां हैं। ये केवल सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि दुनिया को देखने और समझने की वैकल्पिक दृष्टियां प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक समुदाय अपने अनुभव और पर्यावरण के आधार पर एक विशिष्ट ज्ञान-संसार रचता है। यदि इन दृष्टियों को संरक्षित नहीं किया गया, तो हम केवल परंपराएं ही नहीं, बल्कि दुनिया को समझने के अनेक तरीके भी खो देंगे। पर्यावरण भी इनके लिए मात्र संसाधन नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक भू-दृश्य है। मौसम के साथ गीत बदलते हैं, वनस्पतियों की पहचान इंद्रियों से होती है और खुले आकाश के नीचे कथाएं जन्म लेती हैं। यही पर्यावरण उनकी चिकित्सा परंपराओं की आधारशिला है।

जलवायु संकट से निपटने में आदिवासी समुदायों की भूमिका महत्त्वपूर्ण
यह समझना आवश्यक है कि जैव विविधता और सांस्कृतिक विविधता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यदि घुमंतू जीवन-शैली कमजोर पड़ती है, तो उससे जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। इसलिए यह प्रश्न केवल संस्कृति के संरक्षण का नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का भी है। घुमंतू समुदाय प्राकृतिक संसाधनों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं, जिसमें दोहन के बजाय संतुलित उपयोग पर बल दिया जाता है। यह दृष्टिकोण आधुनिक सतत विकास की अवधारणा से मेल खाता है।
आज वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल जैसे संस्थान भी मानते हैं कि जलवायु संकट से निपटने में स्थानीय और आदिवासी समुदायों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। रेगिस्तान के घुमंतू समुदाय पहले से ही ऐसे जीवन-मॉडल का पालन करते हैं, जो जलवायु के अनुकूल और संसाधनों के प्रति संवेदनशील है। फिर भी भारत में यह ज्ञान अक्सर उपेक्षित रह जाता है। हम उन्हें योजनाओं और आंकड़ों तक सीमित कर देते हैं, जबकि उनकी वास्तविक शक्ति उनकी जीवित परंपराओं में है। अब आवश्यकता एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि की है। घुमंतू समुदायों को केवल संरक्षण की वस्तु नहीं, बल्कि ज्ञान-निर्माता के रूप में देखना होगा। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और नीतियों में उन्हें केंद्र में लाना होगा।


घुमंतू समुदायों पर व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करने की जरूरत
अंतत: प्रश्न केवल यह नहीं है कि दुनिया उन्हें क्यों पढ़ रही है, बल्कि यह है कि हम अब भी उन्हें क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। अब समय आ गया है कि भारत में घुमंतू समुदायों पर गंभीर और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए। यह कार्य केवल योजनाओं और लाभ वितरण तक सीमित न रहकर शोध, संवाद और सहभागिता पर आधारित होना चाहिए। इस क्षेत्र में योग्य और प्रतिबद्ध लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि यह प्रक्रिया रेवडिय़ां बांटने का माध्यम न बनकर ज्ञान-संरक्षण और समाज निर्माण का आधार बन सके। यदि हमने इस ज्ञान को समय रहते नहीं पहचाना, तो हम केवल अपनी सांस्कृतिक स्मृति ही नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाएं भी खो देंगे। घुमंतू समाज केवल अतीत नहीं है, वह भविष्य की एक वैकल्पिक दिशा है।